उमेश मिश्र की कविताएं

सुबह-एक
रात पर जीत का विजेता सूरज,
कि खत्म हुआ अंधेरे का राज,
कि खुल गए अंधे इरादों के राज,
कि अब न गिरेगा कोई अंधेरी राह में,
कि अब न घिरेगा कोई अंधेरी चाह में

पर रोज शाम टूटता है तिलस्म यह
और बांह पसारती है काली रात
क्योंकि एक सूरज के भरोसे है
हर दिन उजाले का आना-जाना
तुम चाहो तो तोड़ दो सूरज का भरमाना

सुबह-दो
अभी तो उगा है सूरज,
उम्मीदों की आस लेकर
अभी तो खुले हैं पंख,
उड़ानों की सांस भरकर
गूंजने दो मेहनत के गान,
दोस्तों अभी कैसी थकान

सुबह-तीन
मुर्गों की बांग अब सुनाई नहीं देती
न बाकी रहा चिड़ियों का कलरव
बहुत छोटी हुई अरूणोदय की ठंडक
रसोई में खड़खड़ाते बर्तनों की गूंज या
सड़क पर एकदम से बढ़ी आमदरफ्त
चिल्लपों से खुली जलती आंखों में

न नींद के किसी सुख का अवशेष
न बीते कल के किसी दुःख की न्यूनता
फिर सुबह हुई जैसे किसी मधुमक्खी के
छत्ते को तोड़ने का बचा काम करना है

फिर सुबह हुई तो तुम्हारे माथे पर
लकीरों का जमघट बढ़ना है
उस रात के मुहाने तक
जिसकी सुबह की खबर
पढ़ने के लिए चाहिए कोई माथे की
सलवटों की लिखावट पढ़ने वाला.


3 thoughts on “उमेश मिश्र की कविताएं

  • March 14, 2013 at 21:32
    Permalink

    बहुत सी सहज लेकिन सुंदर कविताएं हैं. इन दिनों जबरदस्ती कुछ लोग ज्ञान बघारने के लिये कविताएं लिख रहे हैं. यही कारण है कि लोग कविता और साहित्य से दूर होते चले जा रहे हैं. आपकी कविताएं उस तरह से बोझिल नहीं हैं.

    Reply
  • March 15, 2013 at 19:01
    Permalink

    आपकी इन कविताओं में समय बोल रहा है.

    Reply
  • May 13, 2013 at 14:35
    Permalink

    निराशा के अंधेरे में आशा का सूर्य उगाती कविताएं। सूर्य बनने की प्रेरणा
    देते शब्द। हालात को खंगालते जज्बात। भीतर और बाहर के संघर्ष से उपजी रचना।
    दिल से निकलकर दिलों को स्पर्श करती हुई। दिमाग झकझोरती हुई। श्री उमेश
    मिश्रा को रचना के लिए बधाई , छत्तीसगढ़ खबर को प्रकाशन के लिए।

    Reply

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