बेकाबू कश्मीर घाटी

जम्मू एवं कश्मीर की हाल की स्थिति देखकर सवाल उठ रहा है कि क्या वहां हिंसा खुद अपनी मालिक बन बैठी है? क्या हालात पर किसी का अब कोई बस नहीं चल रहा है? हालात देखकर तो ऐसा ही लग रहा है. मुख्यधारा के नेता और अलगाववादी नेता, दोनों यह स्वीकार कर रहे हैं कि घाटी में हालात उनके नियंत्रण से बाहर चले गए हैं.

घाटी में आठ जुलाई को सुरक्षाबलों द्वारा हिजबुल कमांडर बुरहान वानी और उसके दो सहयोगियों को मार गिराए जाने के बाद प्रदर्शनों में लोगों की मौत हुई है और अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान उठाना पड़ा है. बुरहान वानी की मौत के बाद से हो रहे हिंसक प्रदर्शनों की गूंज घाटी में लंबे समय तक गूंजती रहेगी.

कश्मीर में वर्ष 2014 की बाढ़ के बाद इन गर्मियों में पर्यटन सीजन का आगाज शानदार रहा था. घाटी में होटल और हाउसबोट अच्छा कारोबार कर रहे थे और ये सितंबर तक पूरी तरह से बुक थे.

लेकिन, यह तस्वीर बदल गई. लद्दाख जाने वालों को छोड़कर सभी पर्यटक घाटी से रुखसत हो गए हैं.

एक शीर्ष होटल के मालिक ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया, “सभी बुकिंग रद्द कर दी गई है. इस साल पर्यटन उद्योग का शटर गिर गया है.”

कश्मीर में तीन प्रमुख पर्यटन स्थलों गुलमार्ग, पहलगाम और सोनमार्ग के अधिकतर होटलों ने फिलहाल अपना कारोबार बंद कर दिया है.

घाटी में कर्फ्यू और अलगाववादियों द्वारा आहूत बंद की वजह से पिछले 15 दिनों से व्यापार और उद्योग को झटका लगा है.

एक सामान्य अनुमान के मुताबिक, इस दौरान करीब 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है.

श्रीनगर-जम्मू राजमार्ग बाधित होने की वजह से जरूरी सामानों की आपूर्ति में बाधा हो रही है. यह राजमार्ग घाटी की लाइफलाइन है जो प्रदर्शनों की वजह से बंद है.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पेट्रोलियम और अन्य आवश्यक उत्पाद लिए ट्रक रात के समय घाटी में प्रवेश कर रहे हैं.

दक्षिण कश्मीर में अधिकतर प्रदर्शन होने की वजह से राजमार्ग सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं.

घाटी में शिक्षा क्षेत्र भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ है. स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय लगभग महीने भर से बंद हैं.

राज्य सरकार ने चार जिलों में स्कूल खोलने का फैसला लिया है लेकिन अभी भी यहां छात्रों और शिक्षकों की उपस्थिति उत्साहजनक नहीं है.

अमरनाथ यात्रा के लिए यहां पहुंच रही तीर्थयात्रियों की संख्या में भी गिरावट आई है.

इस वजह से श्री अमरनाथजी श्राइन बोर्ड को जम्मू क्षेत्र में चार में से दो पंजीकरण केंद्रों को बंद करना पड़ा है.

इन सबके बीच सर्वाधिक नुकसान कश्मीर को उठाना पड़ा है. उग्र भीड़ और सुरक्षाबलों के बीच संघर्षो के दौरान लोगों की मौत हुई है और बड़े पैमाने पर लोग घायल हुए हैं.

दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग, शोपियां, कुलगाम और पुलवामा जिलों में लगभग 45 लोगों की मौत हुई हैं जिनमें अधिकतर युवा हैं.

चिकित्सों को डर है कि सुरक्षाबलों द्वारा भीड़ पर चलाई गई पैलेट गोलियों में बड़ी संख्या में लोगों की आंखें जख्मी हुई हैं. आशंका है कि इनमें से लगभग 40 कभी देख नहीं पाएंगे.

यह दिल दहला देने वाला खुलासा यह समझने के लिए पर्याप्त है कि कश्मीर वस्तुत: एक अंधकार से गुजर रहा है.

कश्मीर में 1980 के दशक के आखिर से शुरू हुई बगावत के बाद से यही हालात रहे हैं.

यदि कश्मीर के नेता स्थिति पर काबू पाने की हैसियत खो चुके हैं तो फिर मौत और तबाही का यह खेल अंतहीन समय तक जारी रह सकता है.

अलगाववादी धड़ा प्रदर्शन कर रहा है और यह भी मान रहा है कि हालात उसके नियंत्रण में नहीं हैं. दूसरी तरफ, राज्य में मुख्यधारा के नेता सुरक्षाबलों और बुलेटप्रूफ वाहनों के पीछे छिपकर राजनीति कर रहे हैं.

यदि यही घाटी की गंभीर वास्तविकता है तो अलगाववादियों को प्रदर्शन करने और मुख्यधारा के नेताओं को स्वयं को जनता का प्रतिनिधि कहने का कोई अधिकार नहीं है.

अब यह समय कश्मीरियों के लिए आत्मविश्लेषण करने और यह समझने का है कि आखिर उनका प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है?

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