पीके कांग्रेस को जिता पायेंगे?

नई दिल्ली | बीबीसी: यूपी चुनाव में इस बात का लिटमस टेस्ट हो जायेगा कि क्या प्रशांत किशोर किंग मेकर हैं. इससे पहले चुनावी प्रबंधन का काम देखने वाले प्रशांत किशोर ने 2014 के लोकसभा चुनाव के समय नरेन्द्र मोदी का तथा बाद में बिहार विधानसभा चुनाव के समय नीतीश कुमार के चुनावी प्रबंधन का काम देखा था. मोदी के प्रधानमंत्री बनने तथा नीतीश कुमार के फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रशांत किशोर की ब्रांड वैल्यू बढ़ गई है. यह माना जाने लगा कि प्रशांत किशोर के चुनावी प्रबंधन ने ही मानो मोदी को प्रधानमंत्री तथा नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया है. अब कांग्रेस ने 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव के लिये प्रशांत किशोर की सेवायें ली है. इससे नामचीन चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर उर्फ पीके का ऊंट यूपी में कांग्रेस के पहाड़ के नीचे आ फंसा है. इस बार तय होना है कि क्या सिर्फ नेताओं की छवि का प्रबंधन, बंद कमरे में बैठकर बनाए गए कुछ नारों और कागज पर जातीय गुणा गणित से ऐसी पार्टी को भी चुनाव जिताया जा सकता है जिसमें नेता ज्यादा हैं और कार्यकर्ता कम. ऐसी पार्टी जो पिछले चार सालों में राज्य के बड़े मुद्दों पर हस्तक्षेप करने में नाकाम रही है और गुटबाजी जिसकी प्रमुख गतिविधि है.

संक्षेप में मसला ये है कि क्या यूपी के वोटर को कंज़्यूमर आइटम की तरह अगले दस महीनों में ब्रांडिंग के जरिए ‘नेता भी खरीदने’ के लिए मजबूर किया जा सकता है. पीके के खाते में अनुकूल परिस्थितियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की छवियों का प्रबंधन करके चुनाव जिताने वाली दो सफलताएं दर्ज हैं जिसके आधार पर मीडिया ने उनके चुनाव जिताने वाले जादूगर होने का मिथक रच डाला है.


लेकिन यूपी में हालात अलग हैं जहां सत्ताधारी समाजवादी पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनाव में डमी उम्मीदवार खड़े कर कांग्रेस की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी और राहुल गांधी को संसद में पहुंचाने का इंतजाम किया था.

खुद कांग्रेस के पुराने नेता कह रहे हैं कि फीस के लालच में पीके ने गलत बयाना ले लिया है. यूपी के विधानसभा चुनाव के बाद उन्हें खुद अपनी छवि का प्रबंधन करना पड़ेगा, ताकि नए क्लाइंट मिल सकें.

मुश्किलों की शुरुआत हो चुकी है. पीके ने कांग्रेस नेताओं के साथ बैठक करके 31 मार्च तक हर विधानसभा क्षेत्र से बीस होलटाइमर कार्यकर्ताओं की सूची, टेलीफोन नंबर देने को कहा है लेकिन ऐसे कार्यकर्ता खोजे नहीं मिल रहे हैं जो खुद चुनाव न लड़ना चाहें और पार्टी के लिए चुपचाप काम करें.

इस किल्लत से निपटने के लिए नया प्रस्ताव आया है कि हर महीने वेतन देकर बाहर से होलटाइमर भर्ती किए जाएं.

इसमें भी पेंच है क्योंकि आशंका जताई जा रही है कि पीके इन कार्यकर्ताओं के सीधे संपर्क में रहेंगे, नए कार्यकर्ताओं को चुनाव में ज्यादा महत्व मिलेगा जिससे हर विधानसभा क्षेत्र में एक नया समानांतर संगठन खड़ा हो जाएगा, नतीजे में गुटबाजी और बढ़ेगी. इसके अलावा हर विधानसभा सीट पर मतदाताओं की जातीवार संख्या और संभावित प्रत्याशियों के नाम एक फार्म में भर कर पीके को दिए जाने हैं.

एक बड़े कांग्रेस नेता ने कहा कि बिना जनाधार वाले जिन नेताओं को टिकट लेना है वे अपनी जाति के वोटरों की संख्या बढ़ा-चढ़ा कर बता रहे हैं ताकि उनका दावा मजबूत रहे लेकिन इससे दिक्कत यह होगी कि जातिगत समीकरणों का सही अंदाजा ही नहीं लग पाएगा. अगर समीकरण जान भी लिए जाएं तो भी कुछ खास फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि पिछले वर्षों में कांग्रेस का वोट आधार बसपा, सपा और भाजपा ने छीन लिया है और कांग्रेस के पास फिलहाल कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिससे वह जनता से कनेक्ट कर सके.

वोटरों तक पहुंचने के लिए पीके के सुझाव पर कांग्रेसी एक से पंद्रह अप्रैल तक हर जिले में संपर्क यात्रा शुरू करने वाले हैं. इस दौरान यूपीए की केंद्र में रही सरकार की मनरेगा और खाद्य सुरक्षा कानून जैसी उपलब्धियों की याद दिलाई जाएगी. कहना मुश्किल है कि यूपी के जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वाले माहौल में कोई इन पर कान धरेगा.

इसी दौरान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष निर्मल खत्री और प्रदेश प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री भी दौरा करके इस बात की पड़ताल करेंगे कि जो सूचनाएं विधानसभा क्षेत्रों से आ रही हैं क्या वे सही हैं.

पीके की सबसे बड़ी चूक यह है कि वे यह देख पाने में नाकाम हैं कि वे जो करने जा रहे हैं, कांग्रेस उसकी उस्ताद पार्टी रही है.

कांग्रेसी नेहरू-गांधी परिवार के किस्सों और सोनिया, राहुल, प्रियंका की फोटो पर ही चुनाव लड़ते आए हैं लेकिन वो पुराना वोट बेस बचा नहीं सके और कोई नया वोट बैंक जोड़ नहीं पाए इसलिए नाकाम रहे.

खुद राहुल गांधी ने कारपोरेट स्टाइल में टैलेन्ट हंट के जरिए ढेरों युवा नेता बनाए थे जिनमें से अब एक का पता नहीं है. संगठन चुनाव में कमेटियों में बड़े नेताओं के बेटे बेटियों और खानदान के पुराने वफादारों को भरना मजबूरी थी जिसका नतीजा यह हुआ कि लीडरशिप बनी ही नहीं.

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