भाजपा पर भारी उत्तराखंड!

उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाना भाजपा पर भारी पड़ सकता है. उत्तराखंड में देश की सर्वोच्च न्यायालय के दखल के बाद, हरीश रावत सरकार का विधानसभा में बहुमत साबित कर, 33 मत हासिल करना, भाजपा के लिए बड़ा झटका है. लेकिन राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के तौर तरीकों पर एक बार फिर से बड़ी बहस शुरू हो गई है.

उत्तराखंड में मंगलवार को दो घंटे के लिए राष्ट्रपति शासन हटाने के बाद हुए शक्ति परीक्षण के बाद ही साफ हो गया था कि रावत सरकार ने बहुमत हासिल कर लिया है. लगता नहीं कि कहीं भाजपा खुद ही अपने बुने जाल में तो नहीं उलझ गई? बड़ा सवाल यह भी कि कितना वाजि़ब था राष्ट्रपति शासन का लगाया जाना? हो सकता है कि अब वहां पर हरीश रावत आनन-फानन में विधानसभा भंग करने का फैसला ले लें और चुनाव की ओर बढ़ जाएं क्योंकि उनको लग रहा है कि सहानुभूति का फायदा मिलना तय है और वह खुद को शहीद के रूप में पेश करने से नहीं चूकेंगे.

भाजपा ने यह सब इतनी जल्दबाजी में किया गया कि कांग्रेस से बागवत करने वाले 9 विधायकों का साथ लेते समय, एक तिहाई संख्या बल का भी ध्यान नहीं रखा. लगता है केंद्र में भाजपा की सरकार होने के उत्साह के चलते, उत्तराखंड में मौजूदा सरकार को धराशायी करते वक्त राज्यपाल की भूमिका को भी नजरअंदाज किया गया क्योंकि उनकी ऐसी कोई रिपोर्ट ही नहीं थी जिससे लगे कि वहां सरकार संविधान से इतर चल रही है.

बहरहाल सबसे बड़ी चूक कहें या कानूनी त्रुटि या केन्द्र में सत्तासीन होने का दंभ, वो ये कि भाजपा और कांग्रेस के बागी विधायकों की ओर से राज्यपाल को दिया गया एक ही पत्र, जो यह सिद्ध करने के लिए काफी था कि दोनों मिलकर सरकार को गिराने की वो खिचड़ी पका रहे हैं जो संवैधानिक दायरों की सीमा लांघती है. यदि यही पत्र अलग-अलग दिया गया होता तो हो सकता है कि बागी विधायकों को भी शक्ति परीक्षण में शामिल होने का मौका मिलता और परिदृश्य कुछ अलग हो सकता था.

उत्तराखंड के घटनाक्रम से देश में एक बार फिर राजनीति का पारा उछाल ले रहा है. इधर मोदी सरकार अपने दो वर्षो के कार्यकाल को पूरा करने जा रही है, उधर दिल्ली का इत्तेफाक, बिहार की हार के बाद 5 राज्यों के नतीजे आने से पहले उत्तराखंड की सियासत कितनी भारी पड़ेगी, कहने की जरूरत नहीं क्योंकि तीन राज्यों तमिलनाडु, केरल, और पुड्डुचेरी में एक ही चरण में 16 मई को मतदान होने वाले हैं.

उत्तराखण्ड में बागियों को दिखाए सब्जबाग से जहां कई बड़े राजनीतिक नामों के भविष्य पर गहरा धुंधलका छा गया है वहीं भाजपा खुद भी ऊहापोह की स्थिति में आ गई है. कहीं न कहीं रणनीति की कमी या जल्दबाजी जो भी हो, भाजपा अपने ही बुने जाल में खुद तो नहीं उलझ गई? उधर केरल में राजनीतिक बिसात बिछा रही भाजपा के लिए चुनावी दंगल में पूरी ताकत से जुटे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक बयान पर मुख्यमंत्री ओमान चांडी का पलटवार कितना असर डालेगा इसका इंतजार है. एक चुनावी सभा में कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री ने केरल की तुलना सोमालिया से की थी.

जवाब में चांडी ने कहा, “क्या केरल देश के बाहर है? जबकि केरल पिछले पांच सालों में आर्थिक और मानव संसाधन विकास की दर में राष्ट्रीय औसत में आगे है! ऐसे में केरल की तुलना सोमालिया जैसे देश से करना, जो जबरदस्त गरीबी और आंतरिक संघर्ष से जूझ रहा है, कितना उचित है.” कहीं न कहीं ओमान चांडी केरल के लोगों को भावनात्मक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं.

इन सबके बीच 26 मई को मोदी सरकार के कार्यकाल के दो वर्ष पूरे हो जाएंगे. सरकार की लोकप्रियता और कामकाज को लेकर बहुत से सर्वे कराए जा रहे हैं. कुछ के नतीजे सामने आ गए हैं, कुछ के आने वाले हैं. सभी अपने-अपने तरीके से विश्लेषण कर रहे हैं. मीडिया अध्ययन केन्द्र ‘सीएमएस’ ने 15 राज्यों के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 40,000 हजार प्रतिभागियों के बीच एक सर्वेक्षण कराया जिसका यह नतीजा सामने आया कि लगभग एक तिहाई से कम लोगों को लगता है कि प्रधानमंत्री ने वादे पूरे किए हैं जबकि 48 प्रतिशत का मानना है कि आंशिक रुप से पूरे किए गए हैं.

लोगों के जीवन स्तर को लेकर 49 प्रतिशत लोगों का मानना है कि कोई बदलाव नहीं हुआ है. जबकि 15 प्रतिशत का मानना है कि स्थितियां और भी बदतर हो गई हैं. 43 प्रतिशत लोग कहते हैं कि कार्यक्रमों और योजनाओं से गरीब लोगों को लाभ नहीं हो रहा है. लेकिन मोदी सरकार के कामकाज और प्रदर्शन को लेकर किए गए आकलन में बड़ी संख्या में लोगों ने नरेन्द्र मोदी के कामकाज को पसंद भी किया है जिसका प्रतिशत 62 है. इसमें भी 70 प्रतिशत लोग अब भी चाहते हैं वो अपना पहला 5 वर्षीय कार्यकाल तो पूरा करें ही लेकिन अगले कार्यकाल में भी प्रधानमंत्री बनें. इसका मतलब यह है कि व्यक्तिगत रूप से लोगों की पसंद अभी भी नरेन्द्र मोदी हैं. लेकिन यदि टीम वर्क का विश्लेषण किया जाए तो सबकी अपनी अलग राय है. इसके मायने ये लगाए जाएं कि कहीं न कहीं रणनीति की कमी या अति उत्साह, कहीं भाजपा के लिए मुश्किल तो नहीं बनने वाला है?

उत्तराखंड का हश्र, उत्तर प्रदेश में कितना असर डालेगा इसको लेकर भी भाजपा खेमे में गहन चिंता का दौर होगा जो स्वाभाविक है. उधर उत्तराखंड के बहाने बहुजन समाज पार्टी ने भी भाजपा से दूरी बनाकर दलितों और अल्पसंख्यकों को बहुत बड़ा संकेत देकर समाजवादी पार्टी के आरोपों को झुठला दिया है जिसमें कहा जा रहा था कि बसपा और भाजपा में गुप्त समझौता हो गया.

यहां पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और दिलचस्प बात यह है कि कभी नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार लिए ब्रांड वैल्यू रहे प्रशांत किशोर, बिहार में नीतिश कुमार के बाद अब उत्तर प्रदेश और पंजाब में कांग्रेस के साथ हैं. प्रशांत किशोर की अगुवाई वाली ‘सिटीजन फॉर एकाउंटेबल गवर्नेन्स’ ने ही 2014 के आम चुनावों में भाजपा के लिए रणनीति बनाई थी जिसका युवाओं को आकर्षित करने में जबरदस्त लाभ भी मिला. देखना होगा कि राजनीति में इस नए प्रयोग का अब वो उत्तर प्रदेश और पंजाब में अपने हुनर का कितना कमाल दिखा पाते हैं?

बहरहाल उत्तराखंड में लोकतंत्र के युद्ध की रणभेरी में भाजपा की रणनीतिक चूक, कहां कितना नफा-नुकसान पहुंचाएगी ये 19 मई को पता लग जाएगा जब 16 मई को हुए तमिलनाडु, केरल और पुड्डुचेरी के चुनाव परिणामों के नतीजे सामने होंगे और इसके बाद उत्तर प्रदेश व पंजाब के लिए कयास लगने शुरू हो जाएंगे.(एजेंसी इनपुट)

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