अभिव्यक्ति की आजादी की जीत

नई दिल्ली | समाचार डेस्क: 24 मार्च. 2015 को अभिव्यक्ति की आजादी की जीत के दिवस के रूप में याद रखा जायेगा. सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2008 की धारा 66ए को संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का उल्लंघन करार देते हुए रद्द कर दिया. न्यायालय के दूरगामी निर्णय की पूरे देश में खूब प्रशंसा हुई है. न्यायालय ने इस दौरान अधिनियम के अनुच्छेद 79(3)बी को भी पढ़ा और उसे व्यर्थ बताया. इस अनुच्छेद में सरकार और सरकारी एजेंसियों द्वारा किसी सामग्री को आपत्तिजनक पाए जाने पर उसे शीघ्रता से न हटाने पर सेवा प्रदाता जैसे फेसबुक और ट्विटर को जिम्मेदार ठहराने का प्रावधान है.

कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने न्यायालय के इस फैसले का स्वागत किया है. अधिनियम आईटी एक्ट का अनुच्छेद 66ए कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल में जोड़ गया था.


केंद्र की सत्ता में आने के बाद भाजपा नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार न्यायालय में इस मामले की पैरवी कर रही थी.

न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर और न्यायमूर्ति रोहिंटन फली नरीमन की पीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा, “आईटी अधिनियम की धारा 66ए को पूरी तरह रद्द किया जाता है.”

पीठ ने कहा, “आईटी अधिनियम की धारा 66ए के तहत निर्धारित प्रतिबंध लोगों के जानने के अधिकार पर रोक लगाते हैं. हमारा संविधान विचार, अभिव्यक्ति एवं धर्म की आजादी प्रदान करता है. किसी भी लोकतंत्र में ये मूल्य संवैधानिक व्यवस्था के तहत मुहैया कराए जाते हैं. इस संबंध में धारा 66ए पूरी तरह अस्पष्ट है.”

संविधान का अनुच्छेद 19 (1)(ए) अभिव्यक्ति की आजादी को सुनिश्चित करता है.

धारा 66ए के मुताबिक, “यदि कोई व्यक्ति कंप्यूटर के किसी भी संसाधन का इस्तेमाल करते हुए कोई ऐसी बात कहता है, जिसकी प्रकृति धमकी भरी हो या जिसके बारे में उसे मालूम हो कि वह गलत साबित होगी, लेकिन दूसरों को खिझाने, उन्हें परेशान करने, उन्हें खतरे में डालने, बाधा उत्पन्न करने या अपमानित करने के लिए ऐसी बात कहता है, उसे तीन साल तक की कैद की सजा और जुर्माना हो सकता है.”

केंद्र सरकार ने धारा 66ए का बचाव किया था. उसने कहा कि इस प्रावधान का उद्देश्य संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिली अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाना नहीं है, लेकिन विशाल साइबर दुनिया को अनियंत्रित भी नहीं छोड़ा जा सकता.

न्यायालय के फैसले से कोट्टायम के ऑनलाइन मलयालम पोर्टल के संपादक शाजन सकरिया ने राहत की सांस ली है उनके खिलाफ 22 मामले दर्ज हैं. इसके अलावा पुडुचेरी के रवि श्रीनिवासन भी इस फैसले से काफी खुश हैं.

इधर, शाहीन ढाडा के पिता मोहम्मद फारूक ढाडा ने न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इसका पूरा श्रेय उनकी बेटी को दिया जाना चाहिए, जिसकी वर्ष 2012 की फेसबुक टिप्पणी के बाद हुई गिरफ्तारी से पूरे देश में इस अधिनियम को लेकर गुस्सा भड़क गया था. रेनू श्रीनिवासन ने भी इसी मुद्दे पर फेसबुक पर टिप्पणी की थी और उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया था.

शाहीन और रेनू उस वक्त पूरे देश में मशहूर हो गई थी, जब उसने 19 नवंबर, 2012 को शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार के दौरान मुंबई में बंद की स्थिति को लेकर फेसबुक पर सवाल उठाए थे.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी उनकी गिरफ्तारी को अवैध माना था और राज्य सरकार को आदेश दिया था कि वह प्रत्येक पीड़िता को 50,000 रुपये का मुआवजा दे.

न्यायालय ने आईटी अधिनियम की धारा 66ए को निरस्त कर दिया, लेकिन इसकी अन्य धाराओं को बरकरार रखा.

न्यायालय ने सरकार की यह दलील भी नहीं मानी कि भविष्य में इसका दुरुपयोग नहीं किया जाएगा. पीठ ने कहा, “सरकारें आती रहेंगी, सरकारें जाती रहेंगी, लेकिन धारा 66ए मौजूद रहेगा. हम सरकार के इस आश्वासन पर यकीन नहीं कर सकते कि कानून का दुरुपयोग नहीं होगा.”

न्यायालय का यह आदेश आईटी अधिनियम की धारा 66ए की वैधता को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आया है. याचिकाओं में दावा किया गया था कि यह पूरी तरह अस्पष्ट है, जिसके कारण प्रशासन इसका दुरुपयोग करता है.

कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा, “धारा 66ए ने प्रशासन के हाथों में अपार शक्तियां दे दी थी. यह फैसला स्वागत योग्य है.”

केंद्रीय सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सरकार सोशल मीडिया पर असहमति या सही आलोचना पर रोक लगाने के पक्ष में नहीं है, बल्कि इसका सम्मान करती है.

उन्होंने कहा, “हम सोशल मीडिया पर विचारों के आदान-प्रदान का सम्मान करते हैं. हम सोशल मीडिया पर सही आलोचना या असहमति पर रोक लगाने के पक्ष में नहीं हैं.”

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