विचार, धारा और कांग्रेस

रायपुर | विचार डेस्क: आम आदमी पार्टी की विचारधारा क्या है, सवाल उठाया है जनार्दन द्विवेदी ने. जनार्दन द्विवेदी कांग्रेस के महासचिव हैं, वह कांग्रेस जो राजनीतिक रूप से लाचार होने के कारण आप को दिल्ली विधानसभा में समर्थन दे रही है. सवाल उस जनता ने नहीं उठाया है जिसने आम आदमी पार्टी को 28 सीटें दी है.

दिल्ली विधानसभा चुनाव के पूर्व आम आदमी पार्टी ने अपना संकल्प पत्र जनता के सम्मुख पेश किया था. जिसमें जनता के रोजमर्रा के तकलीफों का बखान तथा उस पर आम आदमी पीर्टी का उसकों हल करने का तरीका दिया गया था. जनता केवल घोषणा पत्र के आधार पर वोट नहीं देती है. जनता पूर्व का रिकार्ड भी खंगालती है. जनता भूतकाल का विश्लेषण कर वर्तमान में वोट देती है.

आम आदमी पार्टी की बुनियाद अन्ना हजारे के नेतृत्व में चलाये गये जनलोकपाल आंदोंलन के दौरान गढ़ी गई थी. आज आवाम त्रस्त है अपनी मौजूदा हालात से. बिजली के दिनों दिन बढ़ते बिल से, शिक्षा के लिये बच्चों पर मजबूरन किये जा रहे खर्च से. उसके बाद भी नौकरी मिल पाएगी कि नहीं, उसकी गारंटी नहीं है. नौकरी की गारंटी केजरीवेल या आम आदमी पार्टी ने भी नहीं दी है. परन्तु उन्होंने लोगों के मौजूदा दुश्वारियों में से कुछ का ईमानदार हल प्रस्तुत करने की कोशिश की है. जनता को खासकर दिल्ली की जनता को आम

आदमी पार्टी के रूप में एक यथास्थितिवाद का विरोधी तो मिला जो उसके साथ लड़ने को तैयार है.आम आदमी पार्टी जितना कह रही है, उतना शायद न कर पाये परन्तु एक ईमानदार शुरुआत तो उसने की ही है. आम आदमी पार्टी के संकल्प पत्र से यह साफ है कि आम आदमी पार्टी व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं करने जा रही है. उसने तो केवल मौजूदा व्यवस्था में जो कुछ देना या करना संभव है उसकी बात की है. वर्तमान में ठेकेदारों के अंतर्गत कार्य करने वाले कर्मचारियों को स्थाई किये जाने की बात से कुछ-कुछ लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को बल मिलता है.

लोक कल्याणकारी राज्य व्यवहारिक तौर पर उदारवादी व्यवस्था वाले राज्य से बेहतर होता है. उदारवादी व्यवस्था वाले राज्य से हमारा तात्पर्य विदेशी व्यापारियों को देश में आने की खुली छूट देने से है. गौर करने वाली बात यह है कि आम आदमी पार्टी ने खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का विरोध किया है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो जाता है कि आम आदमी पार्टी पूंजीपरस्त व्यवस्था का विरोध कर रही है. उनके घोषणा पत्र में कही भी यह नहीं कहा गया है कि पूंजी का समाजीकरण किया जायेगा. उन्होंने तो केवल उस व्यवस्था के नकारात्मक प्रभावों को कम करने की बात की है.

केजरीवाल तथा उनके साथी गैर सरकारी संगठनों में कार्य करते रहें हैं, जिन्हें एनजीओ कहा जाता है. इस प्रकार की संस्थाओं का काम है कि व्यवस्था से पीड़ित जनता के घावों पर मलहम लगाना. वे कभी भी व्यवस्था परिवर्तन की बात नहीं करते हैं. वास्तव में एनजीओ प्रेशर कुकर के सेफ्टी वाल्व की तरह है, जो व्यवस्था में विस्फोट होने से रोकते हैं. यदि विस्फोट हो गया तो वर्तमान व्यवस्था चरमरा कर गिर जायेगी. एनजीओ नयी व्यवस्था को जनम लेने से रोकती है. जाहिर है, आम आदमी पार्टी एनजीओ और राजनीतिक दल के बीच जैसी अवस्था से गुजर रही है.

लेकिन आम आदमी पार्टी को लेकर बिना किसी अतिरिक्त प्रेम के कांग्रेस से पलट कर पूछने का मन होता है कि कांग्रेस की विचारधारा क्या है? कांग्रेस ने इतने वर्षो से सत्ता में काबिज होने के बाद भी जनता के लिये क्या किया है, यह सवाल जनार्दन द्विवेदी से किया जाना चाहिये. मोंटेक सिंह और मनमोहन सिंह जिस बेशर्मी के साथ पूंजीवाद की गोद में बैठ कर किलकारियां भरते हैं, वह कम से कम गांधी-नेहरु की कांग्रेस पार्टी तो नहीं ही है. जनता को किनारे कर के एनरानों और वेदांताओं की चाकरी करना क्या कांग्रेस की विचारधारा का परिचायक है ?

बरसों पहले फूको ने कहा था कि इतिहास का अंत हो चुका है. फुको से तमाम असहमतियों के बाद भी यह तो कहा ही जा सकता है कि कांग्रेस में विचार का अंत हो चुका है. अगर ऐसा नहीं है तो जनार्दन द्विवेदी को यह सवाल सबसे पहले मनमोहन सिंह से पूछना चाहिये, मुक्तिबोध की तर्ज पर- पार्टनर, तुम्हारी विचारधारा क्या है?


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