आर्थिक आतंकियों से भी खतरा

देश को आज जितना खतरा विदेशी आतंकियों से है उससे ज्यादा खतरा देश के आर्थिक आतंकियों से भी है. आतंकवादी जहां जान-माल को नुकसान पहुंचाकर देश में भय का माहौल पैदा करना चाहते हैं वहीं देशी आर्थिक आतंकी व घोटालेबाज हमारी अर्थव्यवस्ता को खोखला करके रख देते हैं. हर हाल में नुकसान आम जनता को ही उठाना पड़ता है. एक हालात में उसकी जानें जाती है तो दूसरी हालात में उसके गाढ़ी कमाई के पैसे की बचत या उसके द्वारा दी गई करों की रकम को घोटालेबाज ले उड़ते हैं.

आर्थिक घोटाला या दिवालियापन बगैर आर्थिक समावेश के संभव नहीं है. आजादी के बाद घोटालों के चलते देश की अर्थव्यस्था का बड़ा जोखिम उठाना पड़ा है, लेकिन आर्थिक अपराध से जुड़े लचीले कानून के चलते यह अपराध बढ़ता गया और हमारी व्यवस्था मौनव्रत धारण किए रही. आर्थिक अपराध देश की अर्थव्यस्था की रीढ़ तोड़ देता है, लेकिन आज तक आर्थिक अपराध के दोषियों को कोई सजा नहीं मिल पाई. इससे इनका हौसला बढ़ता गया और राजनीतिज्ञ, उद्योगपति, एनजीओ और अर्थजगत से जुड़े लोग इसका बेजा लाभ उठाते रहे. मुकदमों का अंतहीन सिलसिला और जांच पर जांच चलती रही, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ऐसे अपराधों में किसी को सजा नहीं मिल सकी.

देश में घोटाले और कंपनियों के दिवाला होने की लंबी फेहरिश्त है. अर्थ व्यवस्था से जुड़ा अपराध किसी आतंकवाद से कम नहीं है. विजय माल्या उसी कड़ी का एक अंग है.

देश की व्यवस्था मे बच निकलने और अपराध करने के लिए न जाने कितने सुराग हैं. देश का किसान फसल बर्बाद होने और कर्ज में डूबने की वजह से आत्महत्या कर रहा है. अधिक कर्ज होने से उस पर बैंकों और साहूकारों का दबाब बढ़ रहा है, जबकि माल्या जैसे लोग हजारों करोड़ का आर्थिक अपराध कर लंदन में 30 एकड़ के आलीशान रायल पैलेस में आराम फरमा रहे हैं और देश की मीडिया को पोल खोलने की नसीहत दे रहे हैं.

माल्या अपनी फरारी के बाद से सुर्खियों में हैं, माल्या पर राजनीति का बाजार भाव चढ़ा हुआ है.

भाजपा और मोदी सरकार को घेरने का कांग्रेस और प्रतिपक्ष को एक और बेहतर मौका मिल गया है. हमारे लचीने कानूनों का लाभ उठाकर माल्या सीधे लंदन उड़ गए और हमारी देश की सुरक्षा एजेंसियां आर्थिक अपराध पर शिकंजा कसने वाला प्रवर्तन निदेशालय हाथ पर हाथ रखे बैठा रहा. हमारे लिए यह सबसे बड़ी चुनौती की बात है. देश के लिए राजनीतिक आवश्यक है लेकिन ऐसी राजनीति किस काम की जो देश की अर्थ व्यवस्था का बेड़ा गर्क कर डाले. माल्या और उसके आर्थिक अपराध को जिस तरह संरक्षण मिला यह देश और उसकी अर्थ व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है.

अगर इसी तरह उद्योगपति हजारों करोड़ रुपये का कर्ज लेकर दिवालिया होने के बाद विदेश भागते रहेंगे तो देश और उसकी अर्थव्यवस्था की ऐसी तैसी हो जाएगी. निश्चित तौर पर माल्या के संदर्भ में हमारी सरकार और संबंधित एजेंसियां ने लचीला रुख अपनाया जिसका फायदा उठाकर शराब उद्योग का शहंशाह माल्या विदेश भाग गया.

कंपनियों के डूबने और दिवालिया होने की तमाम कहानिया हैं, लेकिन आज तक उन पैसों की वसूली नहीं हो सकी है और ऐसे अपराध में संलिप्त लोगों को देश के कानून के तहत कोई सजा नहीं मिल सकी.

मालिकों की गलत नीतियों के कारण कंपनियां डूब गईं, कर्मचारी सड़क पर आए गए, कितने कामगारों ने कंपनियों के बंद या दिवालिया होने पर आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या तक कर लिया, लेकिन सरकार और मालिकों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा. कंपनियां तो डूब गईं, लेकिन मालिकों का कुछ नहीं बिगड़ा.

बैंकें वसूली के लिए नोटिस पर नोटिस जारी करते रहे, लेकिन क्या हुआ? मालिक जेलों में या विदेश में ऐश और आराम की जिंदगी गुजार रहे हैं, लेकिन निवेशकों की क्या स्थिति यह किसी से छुपा नहीं है.

आखिर क्यों विजय माल्या 9000 हजार करोड़ का कर्ज लेकर विदेश भाग निकले और देश और सुरक्षा एजेंसियां उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकी? उल्टे कानूनों को शिथिल कर विदेश भागने का मार्ग प्रशस्त किया गया. माल्या देश से कैसे भाग निकले यह सबसे बड़ा सवाल है.

देश की सबसे बड़ी जांच ऐजेंसी सीबीआई एक बार लुकआउट नोटिस जारी करती है, बाद में इसके लिए वह गलती भी मानती है कि यह नोटिस गलत जारी हुआ.

माल्या को एयरपोर्ट पर सुरक्षा एजेंसियां देखती हैं. इसकी जानकारी भी सीबीआई को उपलब्ध कराई जाती है, लेकिन इस सीबीआई की ओर से कोई पहल नहीं की जाती है.

जब मामला मीडिया की सुर्खियां बनता है, तो इस पर राजनीतिक बखेड़ा खड़ा होता है. देश में कोई भी बैंकों से कर्ज लेकर और घोटाला कर विदेश भाग सकता है. हमारा कानून उसे पूरी सुविधा मुहैया कराता है. देश के 17 बैंकों के कंससोर्टियम ने सुप्रीम कोर्ट से माल्या के देश छोड़कर जाने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी.

बैंकों की मांग पर अदालत ने माल्या को विदेश जाने पर प्रतिबंध लगाया था, लेकिन इसके बाद भी वह विदेश भागने में सफल रहे और हमारी सारी व्यवस्था हाथ बांधे खड़ी थी.

बैंकों की ओर से उन्हें कर्ज अदायगी के बढ़ते बोझ के बाद भी बैंकों की ओर से कर्ज पर कर्ज दिया गया आखिर क्यों? वर्ष 2010 के बाद भी उन्हें बैंक कर्ज मुहैया कराया गया, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था. बैंकों ने किस आधार पर कर्ज की इतनी बड़ी रकम माल्या की कंपनी को उपलब्ध करायी अपने आप में यह बड़ा सवाल है.

जब माल्या का समूह बैंकों की कर्ज की अदायगी नहीं कर रहा था उस स्थिति में उन्हें कैसे कर्ज दिए गए. माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस की विदेश उड़ान भी प्रतिबंधित कर दी गई थी. इसके लिए बैंकें भी कहीं न कहीं से जिम्मेदार हैं. संबंधित कर्मचारियों पर शिकंजा कसना चाहिए. देश में शराब उद्योग को कापोर्रेट का दर्जा दिलाने वाले माल्या ने शराब उद्योग की नई परिभाषा गढ़ी.

वर्ष 2008 में उनकी संपत्ति 1.2 अरब अमरीकी डालर थी. आज से आठ साल पहले वे दुनिया के धन्नासेठों में 962 वें और देश में 42वीं पायदान पर थे, लेकिन आज देश छोड़कर जाने से उनकी स्थिति बैंकों और उद्योग जगत में बैडमैन की हो गई है. कभी उन्हें किंग ऑफ गुड टाइम्स कहा जाता था. उन्हें बैंकों की तरफ से विलफुल डिफाल्टर घोषित किया गया है.

भारत में शराब उद्योग को बुरा कारोबार माना जाता था, जिस कारण माल्या ने इंजीनियरिंग, चार्टर, उर्वरक और दूसरे व्यवसाय में कदम रखा. आर्थिक अपराध और घोटाले आतंकवाद से भी खतरनाक हैं.

इस पर हर स्थिति में लगाम लगनी चाहिए. आर्थिक अपराध के शहंशाहों को राजनीतिक संरक्षण मिलना किसी देशद्रोह से कम नहीं है.

कन्हैया, वेमुला पर गला फाड़कर संसद में चिल्लाने वाले राजनेता माल्या पर चुप्पी न और मौनव्रत न रखें. आर्थिक अपराध देश की रीढ़ को खत्म कर देता है. अपने आप में यह सबसे बड़ा आतंकवाद और देशद्रोह है. ऐसी स्थिति में माल्या की सभी संपत्तियां जब्त कर बैंकों की निगरानी में नीलाम कर देनी चाहिए. देश में हुए अब तक के सभी आर्थिक अपराधों पर आयोग गठित कर दोबारा जांच होनी चाहिए. दोषी सभी लोगों सजा मिलनी चाहिए.

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