Waiting : तीन औरतों का सिनेमाई जादू

दिनेश श्रीनेत
‘वेटिंग’ तीन स्त्रियों का सिनेमाई जादू है. अनु मेनन का सधा हुआ, सहज निर्देशन… जिसके कारण फिल्म धीरे-धीरे आपके भीतर उतरती है. कल्कि का खुद को चरित्र के भीतर समाहित कर लेना और सुहासिनी मणिरत्नम का प्रभावशाली तरीके से हिन्दी सिनेमा में कदम रखना. बाकी नसीरुद्दीन शाह के अभिनय पर कुछ अलग से कहने की जरूरत नहीं, वे तो जैसे इन तीन स्त्रियों के जादू को बैलेंस करने के लिए फिल्म में मजबूती के साथ खड़े हैं.

मृत्यु की प्रतीक्षा पर बहुत सी फिल्में बनीं हैं. हिन्दी सिनेमा में एक आइकॅनिक किरदार को जन्म दे चुकी ‘आनंद’ हो या उन्हीं राजेश खन्ना की ‘सफर’, मणि रत्नम की फिल्म ‘अंजलि’ हो या महेश भट्ट की तमाम शुरुआती फिल्में. मगर ये फिल्में मौत की प्रतीक्षा और अपने किसी प्रिय के बिछुड़ने के कष्टप्रद इंतजार को रूमानियन और मेलोड्रामा में डायल्यूट कर देती हैं. ‘वेटिंग’ इन फिल्मों से एक कदम आगे है. वह इस तकलीफदेह इंतजार के बीच प्रेम, धैर्य, उम्मीद जैसे शब्दों के मायने फिर से टटोलती है. बिना किसी बहस में गए… चुपके से.

कहानी बस इतनी सी है कि दो-तीन लाइनों में समाप्त हो जाए. एक हॉस्पिटल में पिछले आठ महीनों से अपनी पत्नी के कोमा से बाहर आने का इंतजार कर रहे प्रोफेसर शिव कुमार (नसीर) की मुलाकात तारा देशपांडे (कल्कि) से होती है, जिसका पति एक भीषण सड़क हादसे में घायल आइसीयू में भर्ती है. दोनों को नियति हर रोज इंतजार करना है- किसी बुरी खबर या फिर उम्मीद की एक किरण का. कल्कि एक आम नौजवान लड़की है, जो अचानक अपने जीवन में आए इस बदलाव से हैरान है. उसे हैरत है कि उसके 1400 से ज्यादा फेसबुक फ्रैंड्स और हजारों फॉलोअर्स होने के बावजूद वह अपने दुख में बिल्कुल अकेली है. उसे उम्मीद, धैर्य और पॉजीटिव थिंकिंग की बातें बेतुकी लगती हैं.

मगर प्रोफेसर के पास जीवन के देखने का एक नजरिया है. वह उनके शब्दों में नहीं उनके रोजमर्रा के जीवन और अपनी तकलीफ से हर रोज लड़ने के उनके जज्बे में नजर आता है. टूटे हुए वे भी हैं भीतर से… उन्हें इसका अहसास तब होता है जब अपनी तकलीफ से जूझ रही कल्कि उनके करीब आती जाती है. उम्र, अनुभव, सोच और पारिवारिक पृष्ठभूमि के फासलों के बावजूद दोनों एक-दूसरे की बात समझने लगते हैं क्योंकि उनका दुख एक है. दोनों चरित्रों के बीच दोस्ती या ऐसे ही किसी अनकहे रिश्ते को फिल्म बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत करती है. नसीर प्रोफेसर शिव के किरदार में अपने चरित्र को एक काव्यात्मक विस्तार देते हैं. कल्कि की बेचैनी और नसीर का धैर्य दोनों फिल्म में एक अनोखा सा संतुलन बनाते हैं और कहानी अपनी गति से आगे बढ़ती रहती है.

सुहासिनी की यह पहली हिन्दी फिल्म है. वे दक्षिण की एक बेहतरीन अभिनेत्री और निर्देशक होने के साथ-साथ जाने-माने निर्देशक मणि रत्नम की पत्नी भी हैं. ज्यादातर वक्त बिस्तर पर आंखें बंद किए नजर आती हैं. मगर कोमा के अलावा कुछेक दृश्यों के जरिए ही उन्होंने अपने चरित्र को कह दिया है. उनके छोटे-छोटे दृश्यों से नसीर का चरित्र और ज्यादा समझ में आता है. हालांकि इसे फिल्म की पटकथा की खूबी माननी चाहिए. छोटे-छोटे दृश्यों और संवादों के जरिए फिल्म अपनी बात को कहती आगे बढ़ती चलती है. कुछ लोगों को फिल्म धीमी लग सकती है. मगर यह उन फिल्मों में से है जहां कहानी सुनाने या कहने की हड़बड़ी नहीं है. ठीक वैसे जैसे जिंदगी की रफ्तार होती है, फिल्म भी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ती है. मिकी मैक्लेरी का संगीत सुखद है और फिल्म की टोन से मेल खाता है. खास तौर पर कविता सेठ की सुफियाना ‘ज़रा-ज़रा’ बेहतर खूबसूरत है.

‘वेटिंग’ किसी नतीजे की तरफ नहीं ले जाती. वह अपने दर्शकों को जिंदगी की एक सिचुएशन से रू-ब-रू कराती है. वह बारी-बारी से उन सब सवालों के पास जाती है, जो जिंदगी में हम सबके लिए अहम हैं. किसी को प्रेम करना क्या है? उसे हर स्थिति में स्वीकार करना? उम्मीद क्या है? खुद को हमेशा एक झूठे दिलासे में रखना या जिंदगी की तपती धूप में एक छांव… अनु मेनन इस फिल्म में किसी सवाल का जवाब नहीं देतीं, क्योंकि सवाल के जवाब हमारे भीतर ही मौजूद हैं. क्योंकि हमारा दुख और हमारा प्रेम हमारे भीतर ही मौजूद है. तो हमसे बेहतर जवाब किसके पास हो सकते हैं?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *