मोदी सरकार विपक्ष विहीन

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता: मोदी सरकार का संसद में विरोध कौन करेगा. जी हां, यह संविधान से जुड़ा हुआ मसला है. जनादेश 2014 ने देश को एक स्पष्ट बहुमत वाली सरकार तो जरूर दी है परन्तु किसी भी दल को 55 सीटें तक नहीं मिल पाई है. इससे सवाल उठना लाजिमी है कि लोकसभा में विपक्ष का नेता किस दल का होगा.

गौर करने वाली बात यह है कि सोमवार को संसदीय कार्यमंत्री एम वेंकैया नायडू ने कहा, “कांग्रेस को अपनी करारी हार का आत्मावलोकन करना चाहिए. लोगों ने किसी को विपक्ष का नेता नहीं चुना है और यही स्थिति है. लेकिन मैं इस मुद्दे को बंद नहीं कर रहा हूं. अगर किसी पार्टी को 55 सीटें नहीं मिली हैं तो इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं होनी चाहिए. यह स्पीकर का विशेषाधिकार है.”

लिहाजा, अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि विपक्ष का नेता भाजपा के रहमों-करम पर चुना जाने वाला है या कहा जाये कि नेता प्रतिपक्ष बनाया जाये या नहीं यह लोकसभा के स्पीकर पर निर्भर करता है. यह तथ्य सत्य है कि लोकसभा में विपक्ष का नेता बनने के लिये किसी भी राजनीतिक दल को आवश्यक संख्या में सीटें नहीं मिली है परन्तु संसदीय कार्यमंत्री के बातों से अहंकार की बू आती है.

राष्ट्रपति के अभिभाषण की सराहना करते हुए संसदीय कार्यमंत्री नायडू ने कहा कि इसने एक मजबूत और स्थिर भारत के लिए सही दिशा, सही प्राथमिकता और सही रुख दिखाया है. क्या आज के जमाने में स्थिरता का अर्थ इस बात से लगाया जाये कि सरकार को पांच वर्षों तक उसकी सत्ता को कोई चुनौती देने वाला न हो. यह तो निरंकुशता का आगाज़ होगा.

संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की एक महती भूमिका होती है. विरोध करने के लिये संख्या की नहीं मुद्दों पर पकड़ होनी चाहिये. हां, यह सत्य है कि कम संख्या के होने के कारण नीतियों को बदला नहीं जा सकता है जैसे पूर्व में होता आया है. अन्यथा मनमोहन सरकार देश में फंड-बैंक की नीतियों को अमली जामा पहनाने में पॉलिसी पैरालिसिस का शिकार न हुई होती.

जनादेश 2014 में लोकसभा में भाजपा को 282, कांग्रेस को 44, एआईडीएमके को 37, तृणमूल कांग्रेस को 34, बीजू जनता दल को 20 तथा शिवसेना को 18 सीटें मिली है. इस प्रकार से 5 राजनीतिक दलों ने लोकसभा में संख्या के मामलें में दहाई का आकड़ा पार किया है. इन सब का योग होता है 153 जिसमें से शिवसेना को 18 सीटें मिली है. इस प्रकार से देखा जाये तो 135 सांसदों का आकड़ा बनता है. इस पर भी सवाल उठता है कि इनमें से कितने मोदी सरकार के नीतियों का विरोध करेंगे.

मोदी सरकार से विरोध का हमारा अर्थ हरगिज भी अच्छे दिन लाने वाले कदमों का विरोध करने से नहीं है. यह भी अभी तक पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हुआ है मोदी की आर्थिक नीतियां क्या होंगी. हां, इस पर कयास जरूर लगाये जा रहें हैं कि मोदी की नीति फलां-फलां होगी.

इस बार के लोकसभा चुनाव में भारतीय नैगम घरानों से जिस तरह से खुलकर अपने पसंदीदा दल को समर्थन दिया उससे यह साफ है कि आगे भी नैगम घरानें सरकारी नीतियों को अपने हितों के मुताबिक मोड़ने के लिये दबाव बनायेंगे. ऐसे परिस्थिति में एक मजबूत विपक्ष की भारतीय लोकतंत्र को आवश्यकता जरूर महसूस होगी.

वैसे यह नहीं कहा जा सकता कि मोदी सरकार विपक्ष विहीन है परन्तु यह संसद के दीवारों पर लिखा हुआ है कि विपक्ष कमजोर तथा प्रभावहीन है.

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