ईमानदार नौकरशाहों को कौन बचाएगा?

नई दिल्ली | एजेंसी: देश में भ्रष्टाचार को लेकर चली जोरदार बहसों के बीच नौकरशाहों को प्रमुख गुनहगार के रूप में देखा जाने लगा है. लेकिन क्या सिर्फ संदेह के कारण सभी नौकरशाहों को एक नजरिए से देखा जाना चाहिए?

अन्ना हजारे के आंदोलन के कारण लोकपाल विधेयक के चर्चा के केंद्र में आने के बाद यह धारणा बनी है कि निगरानी और जांच एजेंसियों को अधिक मजबूत और स्वायत्त बनाने तथा नौकरशाहों का संरक्षण कम करने से देश में भ्रष्टाचार संबंधी सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा.

इस आंदोलन से जुड़े एक नेता के महत्वूपर्ण पद पर पहुंच जाने से लोगों को और भी विश्वास हो चला है कि अब नौकरशाही से संबंधित भ्रष्टाचार से छुटकारा मिलने वाला है. लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सिर्फ भ्रष्ट नौकरशाहों पर निगरानी बढ़ाने के मीठे खयालों की जगह हमें कुछ जमीनी हकीकत को भी समझना होगा.

जिन निगरानी और जांच एजेंसियों को अधिक मजबूत और अधिक स्वायत्त बनाने की बात की जा रही है, क्या यह मान लिया जाए कि उनमें नियुक्त होने वाले अधिकारी भ्रष्ट नहीं होंगे और उनमें कोई दोष नहीं होगा? आखिर उसमें भी तो नौकरशाहों की ही नियुक्ति होगी. आए दिन ईमानदार अधिकारियों को निहित स्वार्थ रखने वाले दूसरे अधिकारियों द्वारा सताए जाने की बातें सामने आती हैं. ऐसे में ईमानदा नौकरशाहों को कौन बचाएगा?

ऐसे दर्जनों उदाहरण दिए जा सकते हैं, जिसमें सिर्फ व्यवस्था में ऐसे सुधार किए गए कि उसमें भ्रष्टाचार की गुंजाइश नहीं रही और स्थिति में सकारात्मक बदलाव आ गया. इसके साथ ही ऐसे दर्जनों क्षेत्रों के नाम गिनाए जा सकते हैं, जहां इस तरह के सुधार किए जाने की जरूरत है. आप चाहे तो भ्रष्ट अधिकारियों की धड़पकड़ में वर्षो तक लगे रह सकते हैं, लेकिन यदि सुधार के लिए दूरगामी बदलाव चाहते हैं तो सरकार और आम आदमी के बीच संपर्क में सकारात्मक बदलाव करने होंगे. यानी, ऐसे सुधार जिससे पारदर्शिता बढ़े, भ्रष्टाचार की संभावना को दूर किया जाए, नौकरशाही के विशेषाधिकार को कम किया जाए और आम आदमी को ताकतवर बनाया जाए. इनमें से अधिकांश के लिए इलेक्ट्रॉनिक या मोबाइल गवर्नेस अपनाने की जरूरत है.

इसी तरह दूरसंचार स्पेक्ट्रम और कोयला ब्लॉक आवंटन जैसे सरकारी घोटालों से बचने के लिए नियामकीय सुधार करने होंगे. इसके लिए हर नीति और हर नीतिगत फैसले का सामाजिक आर्थिक विश्लेषण और प्रतिस्पर्धी लेखापरीक्षण कराया जा सकता है. इन सबको आम लोगों के अवलोकनार्थ रखा जा सकता है. इसके अलावा बोली लगाने और नीलामी जैसे साधनों से कार्यान्वयन प्रणाली को पारदर्शी बनाया जा सकता है और सुहृद पूंजीवाद से बचा जा सकता है. सरकारी फैसलों, प्रक्रियाओं और निष्कर्षो को खुद सरकार द्वारा विभागीय वेबसाइट पर डाला जा सकता है ताकि सूचना के अधिकार के तहत सवाल पूछने की जरूरत ही न रहे और जांच तभी हो जाए, जब घटना घट रही हो.

इसके अलावा, आम लोग संभव है यह न सोच पा रहे हों कि वे जिन अधिकारियों को भ्रष्ट बता रहे हैं, उन्हीं की नियुक्ति केंद्रीय सतर्कता आयोग , केंद्रीय जांच ब्यूरो और लोकपाल के रूप में भी होती है. ऐसा नहीं माना जा सकता कि इन पदों पर बैठने मात्र से वे ईमानदार हो जाएंगे.

खुद इन अधिकारियों का विवेकाधिकार भ्रष्टाचार का एक स्रोत हो जाएगा, इसलिए कानून और जवाबदेही के साथ उसे नियंत्रित करने की जरूरत है. यही नहीं किसी भी मामले की जांच को एक निश्चित समय सीमा में खत्म करने की बाध्यता न होने से किसी कर्मचारी के पेशेवर जीवन को गहरा नुकसान पहुंच सकता है. खासतौर से ईमानदार अधिकारियों के लिए यह घातक हो सकता है, जिनके लिए साख काफी महत्वपूर्ण होती है.

निगरानी और जांच एजेंसियों को भी अंदर से सुधार करने की जरूरत है. उन्हें अपने फैसले के लिए जवाबदेह बनाए जाने की जरूरत है. कानून में ऐसी व्यवस्था किए जाने की जरूरत है कि ये अधिकारी विवेकाधिकार का सही दिशा में उपयोग करें, और अधिकार का दुरुपयोग करने पर उन्हें सजा हो.

यही नहीं जांच अधिकारियों को सिर्फ प्रक्रिया पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि उन्हें नीति निर्माण और नीति की मंशा को भी समझना चाहिए. उन्हें यह भी समझने में सक्षम होना चाहिए कि यदि कोई अधिकारी के किसी फैसले का बुरा परिणाम आता है या उससे किसी अन्य कानून का अनचाहे में उल्लंघन होता है तो ऐसे में अधिकारी की मन:स्थिति आपराधिक है या वह निर्दोष है.

इसके लिए जांच अधिकारी को भी संबंधित क्षेत्र में काम का अनुभव होना चाहिए. यही नहीं इन जांच अधिकारियों की ईमानदारी और प्रवृत्तियों की गंभीरता से तहकीकात की जानी चाहिए.

निकम्मे और दंभी अधिकारी ऐसे पद का दुरुपयोग करने की सोच सकते हैं. इसलिए उनकी नियुक्ति प्रक्रिया त्रुटिरहित होनी चाहिए.

ये ऐसी बातें हैं, जिन पर आम तौर पर लोगों का ध्यान नहीं जाता, लेकिन ये काफी महत्वपूर्ण हैं.

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