यह सच नहीं है योगेंद्र जी !

योगेंद्र जी, नमस्कार !
आपका कॉलम पढ़ा. वध और बलि का उदाहरण अच्छा था पर सवाल उनसे बड़े थे, जिन्हें शायद आप भूल गए. हमारी संसदीय राजनीति में सिर्फ दो ही दल नहीं हैं और वो इंद्रधनुष के रंगों के समान राजनीतिक विचारधाराओं के छोरों को जोड़ते हैं. ये विचारधारा बड़ी अजीब सी चीज़ है, जो घटनाओं को अर्थ देती है, इतिहास से पहचान गढ़ती है और भविष्य पर विश्वास दिलाती है, सही और गलत की कसौटी बनती है. तो भारतीय राजनीति में व्याप्त सभी रंग किसी न किसी दल के रूप में स्थापित हैं और संविधान की रौशनी इसी प्रिज्म से छनकर यह इंद्रधनुष बनाती है. शायद इसीलिए और जैसा कि आपने भी लिखा है, चुनाव लोगों के भरोसे का सवाल है. मगर आपने तो विचारधारा उत्तर राजनीति की भविष्यवाणी बहुत पहले ही कर दी थी.

आपने हमे बीते दशकों में हुये राजनीतिक अपराधों के बारे में बताया कि कैसे कांग्रेस के काल में लोकतंत्र नहीं, लोक पर तंत्र की विजय हुई थी, पर यह लोक एक था, तंत्र ने इस पर अलग-अलग रंग नहीं चढ़ाये थे. पर मेरा प्रश्न अलग है. आगे बात बढ़ने से पहले वो प्रश्न पहले बता दूँ. पहला प्रश्न है कि क्या व्यक्ति की निजी चेतना के समान देश की भी राजनीतिक चेतना का विकास होता है और वो उसी के अनुसार सही और गलत तय करती है ? और यदि ऐसा है तो राजनीतिक विमर्श का मूल्यांकन क्या पुराने मूल्यों पर हो सकता है ? दूसरा प्रश्न है कि क्या राजनीतिक विकल्पों को वैकल्पिक राजनीति का भार सौंपा जा सकता है? और तीसरा और अंतिम प्रश्न यह है कि क्या विकल्प विचारधारहीन हो सकते हैं?


पहले सवाल का ताल्लुक है भारतीय लोकतंत्र के विकास से. यह सही है कि भारत में लोकतंत्र की कोई परंपरा नहीं थी पर यह भी सही है कि औपनिवेशिक शक्तियों से लड़ने के लिए जनशक्ति के आह्वान के गांधीजी के तरीकों ने जनभागीदारी को ऐसा माध्यम बनाया, जिनकी परिणति लोकतंत्र में ही संभव था. आज़ादी के बाद अचानक आये लोकतंत्र और बंटवारे के बाद के राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस एक मात्र दल था, जो एक नए देश की उभरती पहचान के भार का वहन कर सकती थी.

ऐसे में लोगों की अपेक्षाएं कितनी हो सकती थीं और उन सीमित अपेक्षाओं के साथ आयी सरकार को एक सर्वशक्तिशाली औपनिवेशिक राजतन्त्र मिला-अफसरशाही के रूप में. ऐसे में आप क्या उम्मीद करते हैं उस समय की सत्ता से? तो कांग्रेस यदि एक Hegemon बन कर उभरती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है. पर उस वर्चस्व से लड़कर आयी राजनीति को यदि एक दूसरी और उससे कहीं अधिक खतरनाक वर्चस्व की ओर खींचा जा रहा है तो यह सहज प्रक्रिया नहीं हो सकती. इसमें खतरनाक साजिशें दिखाई दे रही हैं. ये उसी चेतना के विकास को रोकना चाहते हैं, इतिहास के क्रम में कुछ छूट गया था जिसे वो फिर उठाने के लिए लौटना चाहते हैं, जिसके लिए समय यानि हमारी इस चेतना को वहीँ लौटना होगा जहाँ सत्ता इनके हाथ से छिटकी थी.

आपने कहा है कि वर्तमान विपक्ष जो पहले लम्बे समय तक शासन कर चुका है और जिसका कार्यकाल अच्छी यादों से भरा हुआ नहीं है, वो यदि एकजुट होकर वर्तमान सत्ता को चुनौती देता है तो वो कोई नया विकल्प पेश नहीं कर पायेगा और ऐसे में लोकतंत्र और जनहित रुपी अश्व या तो बलि चढ़ा दिया जायेगा या फिर उसका वध कर दिया जायेगा. पर विकल्प हमेशा कोई नहीं कहानी नहीं होती, वो कहानी के बरक्श हकीकत की चेतावनी भी हो सकती है, वो साझी विचार का आमंत्रण भी हो सकता है. दूसरी तरफ जिस वैकल्पिक राजनीति की आप बात कर रहे हैं, क्या उसकी आशा आपको वर्तमान राजनीति में कार्यरत दलों से करनी चाहिए?

यह गलती आप लोगों ने आम आदमी पार्टी के रूप में भी की थी और उसका नतीजा आप सबके सामने है. राजनीति एक व्यवस्था है और वो किसी एक के विचार को विकल्प नहीं बना सकती. यह काम राजनीतिक, विशेषकर चुनावी एवं प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति के व्यवसायियों का नहीं है, यह आप जैसे बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों का उत्तरदायित्व है. आप लोगों को इस मंथन से गुजरना होगा और एक वैकल्पिक व्यवस्था का ढांचा बनाकर पेश करना होगा और उसकी उपयोगिता को लोगों तक पहुँचाना होगा. तब वर्तमान खिलाड़ी या तो स्वयं को बदलेंगे या फिर अप्रासंगिक हो जायेंगे. आप यह भार विपक्ष पर डाल कर उसके साथ अन्याय कर रहे हैं, बल्कि आप को तो यह भार वर्तमान सत्ता के ऊपर डालना चाहिए क्योंकि ये सरकार पिछले लगभग सौ वर्षों की व्यवस्था और विकास, जिसमें मूल्य व्यवस्था भी शामिल है; को सिरे से नकारती हुई आयी थी.

इसी प्रश्न के साथ एक बात और जुड़ा हुआ है. जब आप व्यक्तियों को और राजनीतिक स्थितियों को एक ही समान तौलते हैं. वर्तमान विपक्ष के नेताओं के बारे में आप के विचार कुछ भी हों परन्तु क्या आप उनके साथ उन सभी राजनीतिक स्थितियों को भी नकार देंगे, जिनमें देश का बहुमत अभी भी बनता हुआ है. आज के विषम परिस्थितियों में यह बात या तो शरारती हो सकती है या फिर एक ऐसा अमूर्त विचार, जिसे अपने अमरत्व का ज्ञान है और उसे इस समयबाधित नश्वर समाज से कोई सरोकार नहीं है.

तीसरा प्रश्न है कि क्या बिना विचारधारा के किसी भी विकल्प का कोई औचित्य है क्योंकि उसके बिना यह बगैर शब्दों के अर्थ की तलाश करना जैसा होगा. हमारी राय है कि राजनीतिक विमर्श के लिए विचारधारा भाषा के समान है और उससे बनने वाले राजनीतिक दल उस विमर्श में भाग लेने के माध्यम या मंच. यह तो कुछ कुछ विश्व बैंक की विकास की परिभाषा जैसा है, जहाँ वो कहता है कि विकास का अर्थ है लोगों के सामने चुनाव के लिए अधिक विकल्पों का होना. उस सोच में लोगों का कोई भविष्य नहीं है और वर्तमान एक निर्णय या चुनाव तक सीमित है. यहाँ लोग समाज और व्यवस्था, दोनों में अप्रासंगिक हो जाते हैं. समाजवादी चिंतन में तो ऐसा नहीं सोचा जा सकता.

इसके अलावा इस विचार के अनुसार राजनीतिक लोगों को अलग-अलग सपनों का विकल्प लेकर आना चाहिए कि मतदाता चुनाव कर सके, यह विशुद्ध बाज़ारवाद की सोच है कि मतदाता एक उपभोक्ता है और राजनेता व्यवसायी, जिन्हें अपने ग्राहक को खुश करना है और उसकी इच्छाओं और आकर्षणों की पूर्ति के माध्यम खोज कर लाभ कमा सके. यह सोच जनता को राजनीति के विमर्श से बाहर कर देती है और शायद इसीलिए बाजार हमेशा से एक अराजनैतिक नागरिक की वकालत करता आया है.
लेखक पेशे से चिकित्सक और स्वतंत्र विचारक हैं.

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