फिदेल के होने का मतलब…

बादल सरोज
फिदेल कास्त्रो का न रहना हमारे वक्त के सबसे बड़े कद के इंसान का चला जाना है. आज और अगले कुछ कल में अलग-अलग नंबरों और रंगों के चश्मों से उनकी शोकांतिकायें लिखी जायेंगी- मगर लाख कोशिशों के बाद भी शायद ही कोई इस शख्स की युगयुगीन शख्सियत को बौना करके दिखा पायेगा. फिदेल के व्यक्तित्व और उनकी राजनीतिक विवरणिका में जाने की बजाय फिलहाल उनके उन पहलुओं पर ही चंद शब्द, जो उन्हें एक सच्चा, विराट इंसान बनाती है.

अमरीका की नाक के नीचे 1959 से लेकर अब तक कम्युनिस्ट हुकूमत और समाजवाद को जिंदा रखना, हाल के राजनैतिक आश्चर्यों में से एक बड़ा अजूबा है. इन 57 वर्षों में एक भी पल ऐसा नहीं गुजरा है जब इस दुर्दांत महाशक्ति के सामने क्यूबा के पैर कभी भी कांपे हो या उसने किसी समझौते की कोई पतली गली तलाशी हो. जब कि खुद फिदेल कास्त्रो अपने रास्ते की मुश्किलों से बाख़बर थे और जानते थे कि “क्रान्ति कोई फूलों की सेज नहीं है – बीते कल और आने वाले कल के बीच का संघर्ष ही है क्रान्ति. ”


क्यूबा में हुयी 1959 की क्रान्ति अपने अनेक गुणधर्मों में तो मौलिक थी ही, पश्चिमी गोलार्ध में हुयी पहली क्रान्ति होने और अमरीका की नाक के नीचे घटित होने के नाते भी अनोखी थी. क्रान्ति के बाद के 57 साल की गैरकानूनी अमरीकी नाकाबंदी के कठिनतम दौर में जिसमें सोवियत संघ के पतन के बाद के 25 वर्ष भी शामिल है- सरासर विपरीत परिस्थितियों में भी बजाय क्यूबा के झुकने के, फिदेल कास्त्रों की अगुवाई में तकरीबन पूरा लैटिन अमरीका उठ खड़ा हुआ. एक को छोड़कर सभी 12 लातीनी अमरीकी देशों में साम्राज्यवाद विरोधी, वामपंथी सरकारें कायम हुई. कभी जिस लैटिन अमरीका को संयुक्त राज्य अमरीका का पिछवाड़ा कहा जाता था, वह इतना आत्मनिर्भर हो गया कि उसने विश्व बैंक के समानान्तर अपनी खुद की बैंक तक खोल ली.

संयुक्त राज्य अमरीका की जनता के लिए पेट्रोल के सस्ते पम्प खोल दिये. इस ‘ऑर्गेनाइजेशन ऑफ अमरीकन स्टेट्स’ का सदस्य बनने के लिए गिडगिड़ाने को मजबूर कर दिया. पांच सौ साल पहले के मुक्ति नायक साइमन द बोलीवर ने साम्राज्यवाद मुक्त अमरीका का जो सपना देखा था, फिदेल उसे अपने जीवन काल में मूर्तरूप देने में सफल रहे. इस घटनाविकास ने पूरी दुनिया को बताया कि साम्राज्यवाद के आगे समर्पण रास्ता नहीं है- उसके देशज विकल्प हैं, जो कारगर भी हैं.

यह फिदेल कास्त्रों थे जिनकी अगुवाई और सक्रिय भागीदारी के साथ कोई साढ़े तीन दशक तक चला गुटनिरपेक्ष आंदोलन, दुनियां के सवा सौ देशों को अमरीकी दरबार में घुटने के बल चलने की मजबूरी से बचाये रहा. महाशक्तियों को तीसरी दुनिया की ताकत का एहसास ही नहीं दिलाया बल्कि उन्हें विश्व मंचों पर बराबरी की पांतो में जगह दिलाई.

समाजवादी विचार और व्यवस्था नयी शासन प्रणाली ही नहीं रचती- नया मनुष्य भी गढ़ती है. फिदेल और क्यूबाई समाज ऐसे ही मनुष्यों का समाज है. सोवियत समाजवाद के विखंडन के बाद जब विकसित देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों तक का विश्वास डगमगाने लगा था तब फिदेल कास्त्रो ने “समाजवाद या मौत” का एलान करके इसी नये इंसान की संकल्प शक्ति को स्वर दिया था.

वर्ष 2005 में पाक अधिकृत कश्मीर में आये विध्वंसकारी भूकम्प के समय सबसे पहले, इस्लामाबाद से भी पहले, पहुंचने वाली चिकित्सा सहायता सैंकड़ों क्यूबाई डॉक्टर्स की टीम थी जो बिना बुलाये ही ऐसे देश में जा पहुंची थी जहां न उसका दूतावास था न कोई कूटनीतिक रिश्ता.

आज भी दुनियां के आधा सैंकड़ा जरूरतमंद देशों में हजारों क्यूबाई डॉक्टर्स तैनात है. क्यूबाई इंसान ने अपने ही देश के लिए नहीं किया बल्कि अपनी योग्यता का इस्तेमाल दुनिया के जरूरतमंद लोगों के लिए किया. एशियाई समाज के डॉक्टरों और इंजीनियरों की तरह खुद को सामराजी देशों में जाकर डॉलर छापने की टकसाल नहीं बनाया. वे ऐसा कर सकते थे- संयुक्त राज्य अमरीका उनसे महज 90 मील दूर है.

फिदेल दुनियां के एक मात्र ऐसे नेता थे जिन्होंने एक के बाद एक 10 अमरीकी राष्ट्रपतियों का दिलेरी के साथ सामना किया. क्यूबाई समाजवाद को बिखेरने की उनकी तिकड़मों को नाकाम किया. खुद सीआईए डायरैक्टर रिचर्ड हेल्म्स ने माना था कि अमरीकी एजेसियों ने फिदेल कास्त्रो को मारने की 638 बार साजिशें रची. उनके सिगार में जहर डालने से लेकर बिस्तर और रेडियो स्टेशन तक में विषाणु डाले गये. मगर तब वे फिदेल कास्त्रों को नहीं मार पाये- अब वे फिदेल के विचार को नहीं मार पायेंगे.

अंग्रेजी कवि शैली की कविता में…” हम वो है जो मौत से डरते नहीं / हम वो है जो मरके भी मरते नहीं..” जैसे फिदेल कास्त्रो के लिए ही लिखी गयी थी. ऐसा बहुत कम हुआ है जब कोई नायक जीवन पर्यन्त और जीवन के बाद भी, कई कई पीढिय़ों तक, युवाओं का आइकॉन बना रहा हो. दुनियां में ऐसे तीन ही नाम है फिदेल कास्त्रो, उनके साथी और सहयोगी चे ग्वेवारा और एशिया के सरदार भगतसिंह.

फिदेल का निधन भारत की जनता के अनन्य मित्र और नि:स्वार्थ शुभचिंतक का निधन है. जिन्हें अंतराष्ट्रीय राजनीति की जरा सी भी जानकारी है वे जानते है कि यह फिदेल कास्त्रो और उनका क्यूबा था जो भारत की हिमायत में संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर दुनिया के मंचों पर हमेशा और सबसे पहले खड़ा हुआ, आखिरी तक खड़ा रहा.

यह भारत की ही जनता थी जिसने अमरीकी नाकाबंदी के दौर में जहाजों में भरकर गेहूं और चांवल अपने क्यूबाई भाई-बहनों के लिए भेजा. भारत में हाल के ताजा इतिहास में अंतर्राष्ट्रीयतावादी भाईचारे की इससे बड़ी कोई और मिसाल नहीं है. हरकिशन सिंह सुरजीत जब भारतीय जनता की इस सौगात को लेकर हवाना पहुंचे थे, तब फिदेल खुद बंदरगाह तक आए थे और भावुक होकर कहा था कि “आज के बाद हर क्यूबाई की तीन में से एक रोटी भारतीय मिट्टी में पैदा हुए अनाज की होगी.”

दुश्मनों से गलबहियां बढ़ाने की शेक्सपीरियन ट्रेजडी और विदूषकों-खलनायकों के राज्यारोहणो के इस दौर में ऐसे समर्पित दोस्त का विछोह पीड़ा के साथ जिद भी देकर जाता है. पीड़ा उनके न रहने की. जिद, उन मूल्यों को धारण करने की जो फिदेल कास्त्रो की पहचान थे.

वे कहते थे..”क्या बहुत सारे लोग सिर्फ इसलिए नंगे पांव चले ताकि कुछ लोग लक्जरी कारों में चल सके? क्या कुछ लोग मात्र 35 साल तक इसलिए जीये, ताकि कुछ लोग 70 साल तक ऐश से जी सकें? क्या कुछ लोग अत्यंत दयनीय गरीब इसलिए बने रहे ताकि कुछ बेतहाशा रईस बन सके. नहीं !! मैं दुनियां के उन बच्चों की आवाज हूं जिनके पास रोटी का एक टुकड़ा तक नहीं है. उन बीमारों की आवाज हूं जिनके पास दवा नहीं है. उनकी आवाज हूँ जिनके जिंदा रहने के अधिकार और इंसानी गरिमा छीन ली गई है.”

जब तक विसंगति की यह सूरते हाल कायम है तब तक फिदेल कास्त्रो रहेंगे हमारे बीच-दुनियां की मानवता को आश्वस्ति और हौंसला देते हुए.

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