सहारनपुर में भीम सेना के उदय का मतलब

सहारनपुर में भीम सेना का उदय उत्तर प्रदेश में दलितों की नई आक्रामकता का संकेत दे रहा है. बीते दिनों सहारनपुर में ठाकुरों और दलितों के बीच में संघर्ष हुआ. यह संघर्ष उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद की सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति की ओर संकेत करता है. 15 सालों से बहुजन समाज पार्टी की मायावती और समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को लोकतांत्रिक बनाने का काम किया है और दलितों और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को आवाज दी है.

लेकिन भारतीय जनता पार्टी की हालिया जीतत और ठाकुर योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने से राज्य की राजनीतिक ताकत एक बार फिर से अगड़ी जाति के हाथों में आ गई है. इस वजह से ठाकुर समेत अन्य प्रभावशाली जातियों के लोग इस राजनीतिक स्थिति का फायदा उठाकर अपनी हनक बढ़ाना चाहते हैं.


पहला संघर्ष हुआ 20 अप्रैल, 2017 को. तब सहारनपुर के शबीरपुर गांव के जाटव और दलित अंबेडकर जयंती मनाने के लिए अंबेडकर की एक मूर्ति लगाने वाले थे. इस पर ठाकुरों ने दो आधार पर आपत्ति की. पहली आपत्ति यह थी कि आयोजन के लिए जरूरी प्रशासनिक अनुमति नहीं ली गई है और दूसरी यह कि मूर्ति की उंगली ठाकुरों के घरों की ओर क्यों रखी गई है.

दूसरा संघर्ष हुआ 5 मई, 2017 को. उस दिन ठाकुरों ने मध्यकालीन राजपूत शासक महाराणा प्रताप की जयंती मनाने के लिए एक जूलूस निकाला. जब यह यात्रा दलित बस्ती से होकर गुजरी ने दलितों ने प्रशासनिक मंजूरी नहीं होने के आधार पर यात्रा को रोक दिया. इस बार जो संघर्ष शुरू हुआ उसमें दोनों पक्षों के बीच न सिर्फ पत्थरबाजी हुई बल्कि गुस्साए ठाकुरों ने दलितों के कई घरों और दुकानों में आग लगा दी और उनके धार्मिक स्थानों को भी नुकसान पहुंचाया. एक ठाकुर नौजवान की जान चली गई. दोनों समुदायों के कई लोग घायल हुए. गांवों से भारी संख्या में दलितों को हिंसा के भय से भागने को मजबूर होना पड़ा.

सहारनपुर को सामाजिक तौर पर संवेदनशील जिला माना जाता है. यहां हिंदू-मुस्लिम संघर्ष कई बार हुए हैं. साथ ही ठाकुरों और दलितों के बीच भी कई बार टकराव हुए हैं. यह आंतरिक बिखराव राजनीतिक स्तर पर भी दिखता है. यहां सांसद भाजपा का है और विधानसभा सीटों पर कांग्रेस-सपा का कब्जा है. निगम चुनाव यहां अगले महीने होने वाले हैं. सहारनपुर जिले में 26 फीसदी दलित हैं और 10 प्रतिशत ठाकुर. लेकिन शबीरपुर में 60 फीसदी ठाकुर हैं और 15 प्रतिशत दलित.

बसपा और सपा के उभार से पिछड़ी जातियों में राजनीतिक एकजुटता आई है और इससे सामजिक तौर पर भी वे एकजुट हुई हैं. हालांकि, इन पार्टियों की स्थिति अभी ठीक नहीं है लेकिन जो परिस्थितियां पैदा हो रही हैं उसमें पिछले कुछ सालों में पैदा हुई राजनीतिक चेतना की वजह से सामजिक एकजुटता दिख रही है. जाटव पहले रविदास के प्रति श्रद्धा रखते थे. अब वे अंबेडकरवादी हो गए हैं. अब अंबेडकर जयंती गांव-गांव में मन रहा है और उनके पोस्टर हर जगह दिख रहे हैं. दलित हिंदू धर्म से धर्मांतरण भी कर रहे हैं.

इन सबके बीच भीम सेना का उदय सबसे अहम है. इसने दलितों के प्रति सरकार और मीडिया के भेदभावपूर्ण रवैये के बीच जाति आधारित हिंसा के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया है. सहारपुर के एक युवा वकील चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ ने इसकी शुरुआत की है. युवाओं के बीच में भीम सेना लोकप्रिय इसलिए हो रही है क्योंकि यह दलितों पर ज्यादती के मामलों में तुरंत हस्तक्षेप करती है और दोषियों व पुलिस का मुकाबला करती है.

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भीम सेना महाराष्ट्र में 1970 के दशक में सक्रिय दलित पैंथर्स की याद दिलाती है. भीम सेना बसपा की ताकत और सीमाओं को समझते हुए उसे हटाना नहीं चाहती बल्कि यह चाहती है कि दोनों बने रहें. उत्तर प्रदेश पुलिस इसे असामाजिक और यहां तक की राष्ट्र विरोधी भी कह रही है लेकिन इसके उभार के दलितों द्वारा रोज सामना किए जा रहे उत्पीड़न से जोड़कर देखा जाना चाहिए. प्रदेश में जिस तरह से सरकार और कुछ खास जातियों का गठजोड़ काम कर रहा है, वह भी इस सेना के उभार के लिए जिम्मेदार है.

उत्तर प्रदेश में अगड़ी जातियों के लिए सबसे मुफीद वक्त आ गया है. जिस तरह का नेता उत्तर प्रदेश में शीर्ष पर बैठा हुआ है, उसे देखते हुए ठाकुरों को लगता है कि यही वक्त है कि अपनी कम हुई ताकत को फिर से बढ़ाया जाए. महाराणा प्रताप को स्थानीय और सांस्कृतिक नायक के तौर पर उभारना जातीय गोलबंदी की कोशिश का हिस्सा है और इसे भाजपा का सह मिला हुआ है. पार्टी यह रणनीति पूरे देश में अपना रही है. वह उन सभी प्रभावशाली जातियों की गोलबंदी कराना चाहती है जो कृषि संकट के शिकार रहे हैं और छोटी जातियों के उभार से जिन्हें दिक्कत हुई है.

शबीरपुर की घटना यह दिखाती है. यहां हमले घरों और सांस्कृतिक प्रतीकों पर हुए. ये जाटवों की एकता के प्रतीक हैं. भीम सेना और शबीरपुर के दलितों ने तब तक गांव में वापस जाने से इनकार कर दिया जब तक उन्हें न्याय नहीं मिल जाता.

योगी आदित्यनाथ के मुस्लिम विरोधी रिकॉर्ड को देखते हुए उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की आशंका पहले से थी. लेकिन उनके कार्यकाल में इतनी जल्दी जाति आधारित धु्रवीकरण खतरनाक संकेत दे रहा है. यह सिर्फ उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए खतरनाक है बल्कि भाजपा के लिए भी यह खतरनाक है.

दीर्घकालिक तौर पर इन कोशिशों का क्या असर होगा, यह कहना अभी मुश्किल है. लेकिन चंद्रशेखर के बयान भाजपा के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं. उन्होंने कहा, ‘चुनावों के वक्त हम हिंदू हैं और उसके बाद हम दलित हो जाते हैं.’

1966 से प्रकाशित इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली के नये अंक के संपादकीय का अनुवाद

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