डा. अंबेडकर एक ध्वनि नहीं हैं

अनिल चमड़िया
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा एक वाक्य को बार बार दोहराती थी-
आदिवासियों के बीच उसका सबसे ज्यादा आधार है क्योंकि उसने आदिवासियों के लिए सुरक्षित सभी सीटों पर जीत हासिल की है. मौजूदा संसदीय राजनीति में जोर ये दिया जाता है कि एक ऐसा वाक्य बनाया जाए जो कि तथ्य के आधार पर अकाट्य हो. आदिवासियों के लिए सुरक्षित सीटों पर किसी पार्टी की जीत का मतलब ये कतई नहीं होता है कि उस पार्टी का आधार आदिवासियों के बीच है. आदिवासी सुरक्षित सीट में केवल आदिवासी मतदाता नहीं होते हैं.

किसी भी समुदाय बाहुल्य क्षेत्र में उस समुदाय का वास्तविक प्रतिनिधि हार सकता है यदि उसके मुकाबले दूसरे सभी मतदाता गोलबंद हो जायें या उस समुदाय के वोट एक से ज्यादा हिस्सों में बंट जाए. लेकिन भाजपा ने इन तमाम तथ्यों और पहलूओं को अपनी वाक्य संरचना की चातुर्य शैली में दककिनार कर एक संदेश आदिवासियों के बीच अपने प्रभाव को दिखाने के लिए तैयार कर लिया. सचमुच इस वाक्य से यही ध्वनि निकलती है कि वही आदिवासियों की असली नेता है. इसका मतलब तथ्य को ध्वनि ने विस्थापित कर दिया है.


एक राजनीतिक संस्कृति होती है. हमारे मुल्क में राजनीतिक संस्कृति एक संदेश यानी एक ध्वनि विकसित करने पर जोर देती है. इसीलिए हम देखते हैं कि अब तक पूरी राजनीतिक व्यवस्था में सबसे ज्यादा शब्द जो इस्तेमाल किया गया, वह गरीबी है. वह गरीबी भी बनी हुई है और राजनीति को गरीबी की ध्वनि से जो हासिल करना था, वो कर लिया. हर नया नेतृत्व अपने तरीके का संदेश तैयार करता है और हर नेतृत्व नये भारत पर जोर देता है.

गुजरात में मुख्यमंत्री के रूप में रहकर नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल कर ली. उन्होंने भारत को गुजरात बनाने की एक ध्वनि विकसित की. ये तो सबसे उपर चमकती हुई लाइन थी. उसके नीचे की लाइन ये थी कि नरेन्द्र मोदी पिछड़े वर्ग के बीच से आते हैं. यानी एक ध्वनि के साथ-साथ कई-कई तरह की ध्वनियां तैयार की जाती हैं ताकि सबसे उपर की लाइन की ध्वनि का सामाजिक आधार बरकरार रहे.

जैसे नोटबंदी के फैसले के साथ ही उन्होंने उसके पक्ष में एक सामाजिक आधार तैयार कर लिया. ये कहकर कि इससे आतंकवाद खत्म होगा, इससे कालाधन वापस आएगा, गरीबों का भला होगा आदि आदि. फिर उन्होंने डिजीटल पेमेंट की नीति को लागू करते हुए मोबाइल के लिए एक ऐप बनाने का ऐलान किया और उसका संक्षिप्त नाम बीएचआईएम रखा जिसे पढ़ने में भीम की ध्वनि निकलती है. यानी उस ऐप का पूरा नाम कुछ और है और संक्षिप्त में वह ध्वनि भीम की है. भीम जो कि भारत की राजनीति में वंचित वर्गों के एक प्रतीक की तरह है. भीम का मतलब डा. भीम राव अम्बेडकर जिन्हें संविधान बनाने का श्रेय इस नाते दिया जाता है कि वे संविधान तैयार करने वाली समिति में प्रमुख थे.

भीम राव अम्बेडकर के कुछ वाक्यों को प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों में दोहराया. डा. अम्बेडकर के भाषणों को उनके संपूर्ण विचारों के आलोक में देखने वाले लोग भी हैं और उन्हें टुकड़े-टुकड़े में अपने हितों में इस्तेमाल करने वाले लोग भी हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई मौके पर डा. अम्बेडकर को याद करते हैं तो क्या वे अपने कार्यक्रमों के लिए एक सामाजिक आधार का समर्थन हासिल करने के लिए करते हैं या वास्तव में वे सामाजिक व आर्थिक स्तर पर वंचित वर्गों को हक हकूक मिल सके, इसकी कोशिश करते हैं. इस प्रश्न पर हमें विचार करना है. यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नये भारत की कल्पना करते हैं तो उसमें डा. अम्बेडकर की किस रूप में जगह होगी और होती दिख रही है. पहले तो न्यू भारत को स्पष्ट करना होगा. दोअर्थी ध्वनि वाले वाक्य में निश्चित कुछ भी नहीं होता है. भारत को गुजरात बनाना है, इसके दो अर्थ सुनाई दिए और वह एक अर्थ में ही आकार लेता दिख रहा है. इसी तरह न्यू इंडिया का अर्थ क्या सामाजिक और आर्थिक स्तर पर जो ढांचा बना हुआ है, वह टूट सकता है?

जिस भारत में डा. अम्बेडकर ने संविधान को लागू करने की अपेक्षा की है, उस भारत में लोगों के बीच आर्थिक और सामाजिक स्तर पर गहरी खाई थी. आज भी एक प्रतिशत चुनिंदा लोग देश के कुल धन का 53 प्रतिशत हिस्सा अपने कब्जे में कर चुके हैं. एक अमीर के बनने का मतलब कई दलितों का गरीबी की न्यूनतम अवस्था की तरफ बढ़ने की गारंटी करता है. डा. अम्बेडकर के कोटेशन को भाषणों में इस्तेमाल करना और वास्तव में आर्थिक सामाजिक ढांचे में परिवर्तन करना अलग-अलग बात है. नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद डा. अम्बेडकर से जुड़े स्थानों को एक प्रतीक स्थलों के रूप में विकसित करने पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया. डा. अम्बेडकर के नाम से कई प्रतीक स्थलों को बनाने में भाजपा बढ़त ले सकती है. यह संदेश भी दे सकती है कि वह डा. अम्बेडकर के विचारों का समर्थन करने वाली सबसे बड़ी पार्टी है. लेकिन उससे ये निश्चित नहीं हो सकता है कि भाजपा की सरकार द्वारा जो स्मार्ट सीटी, बुलेट ट्रेन, और बड़े-बड़े सपनों की ध्वनि के बीच उन हिस्सों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर हो सकती है, जो आर्थिक और सामाजिक स्तर पर गहरी असमानता के शिकार होते रहे हैं.

यह देखा जा सकता है कि डा. अम्बेडकर को प्रतीक की तरह इस्तेमाल करने के इस दौर में ही दलितों की पहली पीढ़ी बड़े शिक्षण संस्थानों में पहुंची है और वहां से उनकी आत्महत्याओं की खबरें आ रही हैं. रोहित वेमुला और मुथु कृष्णन की आत्महत्या डा. अम्बेडकर नाम का सबसे ज्यादा जाप करने के दौर में ही हुई. नया भारत यदि वास्तव में एक ठोस आर्थिक सामाजिक बदलाव की योजना का नाम है तो वह केवल भाषणों में दिख सकता है. उसकी एक योजना होगी और वह सबके सामने होगी. उसमें समाज का वंचित वर्ग पहले की तुलना में किस तरह से आर्थिक और सामाजिक दबावों को कम होते देख रहा है, इसकी तस्वीर उसमें दिखनी चाहिए. संभव है कि सरकार डा. अम्बेडकर की एक भव्य प्रतिमा, एक तीर्थ स्थल जैसे केन्द्र स्थापित कर दे. लेकिन डा. अम्बेडकर के विचार आकर्षित करने वाली किसी ध्वनि को पैदा करने के लिए नहीं है बल्कि उनके विचारों की ध्वनि वास्तव में आर्थिक व सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रेरित करती है.

परिवर्तन के लिए प्रेरित करना और पूजा के लिए प्रेरित करने की राजनीति के फर्क को समझने से ही यह समझा जा सकता है कि डा. अम्बेडकर के विचारों को अपने कार्यक्रमों की सफलता के लिए एक सामाजिक आधार तैयार करने के लिए किया जा रहा है या फिर सामाजिक आधार की सामाजिक व आर्थिक हालात को बदलने के लिए उपयोग में लाया जा रहा है. आधुनिकता मिथकों को इतिहास बनाने की कोशिश में नहीं होती है बल्कि आधुनिकता इतिहास के अनुभवों से सिखने की क्षमता में निहित होती है.

* लेखक वरिष्ठ पत्रकार और दिल्ली से पांच वर्षों से प्रकाशित मासिक शोध पत्रिका जन मीडिया के संपादक हैं.

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