भाजपा के लिए जरूरी कुछ वामपंथी सबक

अजयभान सिंह
बंगाल में अपने ही ’रणभेद’ से चारों खाने चित, पराजय के घाव सहला रहे साम्यवादी मोर्चे से अभी कुछ दिन पूर्व बहुत अरसे बाद उम्मीद से परिपूर्ण एक अच्छी खबर आई. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने एक सांसद ऋतब्रत बनर्जी को उनकी तड़क-भड़क भरी विलासितापूर्ण जीवनशैली के लिए पार्टी से निलंबित कर दिया. इसके पूर्व अप्रैल में इसी पार्टी ने केरल में अपने एक मंत्री ई पी जयराजन के खिलाफ औपचारिक रूप से निंदा प्रस्ताव पारित किया था. वामपंथी विचार का सख्त मुखालिफ होने पर भी राजनीतिज्ञों से वैश्विक वितृष्णा के दौर में यह उदाहरण मुझ जैसे बहुत लोगों को दलालों-माफियाओं के कीट संक्रमण से मरणासन्न तंत्र के बचे रहने की उम्मीद बंधाता है.

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत के आधे से ज्यादा भूभाग में सत्ता का दिग्विजयी परचम फहरा चुकी भाजपा में इतना नैतिक संबल बचा है कि वह राजविलास और ऐश्वर्य के सुखसागर में गोते लगा रहे अपने भ्रष्ट, बेलगाम और उच्श्रृंखल मंत्रियों -विधायकों पर नकेल कसेगी. भारत विजय के अश्वमेध की पूर्णाहुति के लिए अनियंत्रित राजसत्ता पर संगठन के वैचारिक आचार की नकेल जरूरी है, वरना इंटरनेट की तरंगों पर सवार विश्वविजयी अस्त्र शस्त्रों से लैस ’वर्चुअल राष्ट्रवादी’ योद्धा बहुत समय तक भगवा गढ़ को बचाये नहीं रख पायेंगे.


दरअसल वृहत्तर संघ परिवार और मार्क्स-माओ के वैचारिक अनुचरों का राजनीतिक सफर एक ही कालखंड में प्रारंभ होता है और तीव्र मतभेदों के बावजूद दोनों विचारों के अगुवा अपनी अपनी परिधि में ईमानदारी से इन मूल्यों पर डटे रहे. फिर ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस ने सत्ता सुख-अर्जन और प्रदर्शन की जो विधियां सत्तर साल में थोड़े बहुत संकोच के साथ रोपी थी, उन्हें भाजपाई रणबांकुरों ने लपककर ऐसा उर्वरक डाला कि सिर्फ एक दशक में ही राजसुख-भोग की यह अमरबेल देश के चतुर्दिक और सर्व समावेशी विकास की सबसे बड़ी बाधा बन गई.

संघ की ’खड़ाउ-सत्ता’ चलाने की बदनामी झेल रही वाली भाजपा के नेताओं की जीवनशैली के सामने आज कांग्रेस-कॉरपोरेट-नौकरशाही और सिनेमा जगत का संयुक्त विलास और आमोद-प्रमोद भी फीका लगता है. देश की सबसे बदहाल और विपन्न जनता जिन तीन राज्यों में निवास करती है वह हैं मप्र, छत्तीसगढ़ और झारखंड. ताज्जुब है कि इन तीनों राज्यों में सत्ताधीशों की तो कौन कहे, जिन पर एक बार भी राजन्य वर्ग की कृपादृष्टि पड़ गई, ऐसे लोगों ने भी अपनी सात पुश्तों के लिए विपुल ऐश्वर्य अर्जित कर लिया.

कुछ वर्ष पूर्व मप्र के एक शक्तिशाली मंत्री के साहबजादे के विवाह में शरीक होने कुछ लाख लोग इस तरह पहुंचे जैसे सारी कायनात मंत्री पुत्र की शरीके हयात का इस्तकबाल करने के लिए तैनात कर दी गई हो. एकात्म मानववाद का यह कैसा शानदार मुजाहिरा है. ’मुक्त-भोग’ की नैगमिक संस्कृति के हाथों राष्ट्रवाद की, एक विचार, एक राजनीतिक प्रक्रिया के रूप में यह पहली और मुकम्मल पराजय है. वामपंथियों से लाख असहमति होने के बावजूद उनकी वैचारिक निष्ठा अनुपम है. शायद इसीलिए 25 साल तक सत्ता में रहे ज्योति बसु और त्रिपुरा के वर्तमान मुख्यमंत्री माणिक सरकार की जीवनशैली में सत्ता के साथ सहज सुलभ वैभव को तिल भर जगह नहीं मिल पाई.

छत्तीसगढ़ की 32 फीसद आबादी आदिवासियों की है, जिनके शोषण और पिछड़ेपन का दुनिया में कोई दूसरा उदाहरण नहीं है. सत्ता की दैत्याकार मशीनरी में एक प्यादे की हैसियत वाले छोटे-मोटे अफसरों से लेकर विधायकों-मंत्रियों तक की चमक दमक गहरा आघात पहुंचाती है. जिस शहर में कपडे़-लत्ते, वनोपज, होटल, शराब, चावल के व्यापार और थोड़े बहुत स्पांज आयरन के कारखानों को छोड़कर बहुत बड़े निजी उ़द्योगों का सर्वथा अभाव हो, उस रायपुर में मर्सडीज, ऑडी, बीएमडब्ल्यू, पजेरो, फार्च्यूनर से लेकर जगुआर जैसी अति मूल्यवान कारें गाजर-मूली की तरह खरीदी जा रही हों तो यह सिस्टम के सड़ गलकर विनाशकारी परजीवियों के हाथ में चले जाने के संकेत हैं. संपूर्ण राज्य व्यवस्था नौकरशाह-नेता-माफिया त्रयी के बीच नित नई दुरभिसंधियों के अमल में लगी है. चौथे खंभे की हनक भी ’लक्ष्मीनारायण’ की खनक के आगे साष्टांग हो चुकी है.

खुद संघ की हालत बहुत अच्छी नहीं है. बेसतर स्वयंसेवक-प्रचारक पांच सितारा विलास के बंधन में हैं. अनुशासन और संस्कार की फैक्ट्री रहीं ज्यादातर शाखाएं महज आंकड़ों और गुरूपूर्णिमा की दक्षिणा में जिंदा हैं. प्रचारकों में भाजपा में जाने की होड़ लगी है. नतीजतन हिंदुत्व और राष्ट्रनिर्माण नारों में सिमट रहे हैं. मसलन, मध्यभारत के ही एक अखिल भारतीय ’भाईसाहब’ के निज सहायक के परिणय प्रसंग को ही लीजिए. उसके विवाह का साक्षी बनने के लिए दो चार्टर्ड विमान रायपुर से उड़े जिनमें प्रदेश के तमाम शक्तिशाली लोग शामिल थे.

जब निज सहायक के यह ठाठ हैं तब ‘भाईसाहब’ और उनके समकक्षों के वैभव की महिमा का किस तरह बखान किया जाये. सत्ता आने तक खटारा स्कूटर की सवारी करने वाले छत्तीसगढ़ के एक बड़बोले मंत्री की आकाश चूमती संपदा के तमाम आंकड़ों से लैस किस्सागो से बाजार अटा पड़ा है. क्या गुरू एम एस गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय और श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने हुक्काम के इस मुकाम तक पहुंचने के लिए जनसंघ नाम का राजनीतिक प्रयोग किया था.

इस परजीवी-विषाणु पोषक तंत्र के प्रेतमोचन का यह सही समय है, बाद में तबाही चेतने का अवसर नहीं देगी. इसे समझने के लिए किसी कौटिल्य बुद्धि की भी आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह नंगी आंखों से दिखने वाला सच है.

यह भाजपा के वैचारिक अधिष्ठान के संक्रमणग्रस्त होने की शुरूआत भर है, अगर समय रहते संघ भाजपा ने धन-लंपट, सत्तालोलुप और आमोदाकांक्षी परजीवियों को पहचानकर उनका बधियाकरण नहीं किया तो एक राजनीतिक विकल्प के रूप में यह हिन्दू दक्षिणपंथ की निर्णायक पराजय साबित होगी. बौद्धिक विमर्श के स्तर पर पहले ही वामपंथी प्रभुत्व वाले अंगरेजीदां मीडिया और संभ्रांत वर्ग ने हिन्दू विचार को अनेक काल्पनिक वर्जनाओं से तिरस्कृत कर रखा है. हालांकि बहुसंख्यक जनमानस के अचेतन में बसी अडिग भारत निष्ठा की वजह से राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर हिन्दू राष्ट्रवाद के उभार को वे रोक नहीं पाये. ऐसे में क्या वर्तमान संघ-भाजपा नेतृत्व का यह गुरूतर दायित्व नहीं है कि वह महल-अट्टालिकाओं के लोभ का संवरण करके हिन्दू विचार को इतिहास के कूड़ेदान में जाने से बचाये .

यूं मार्क्सपुत्रों का ज्वार कुछेक ’सनकी’ टापुओं को छोड़कर दुनिया में सर्वत्र उतार पर है, लेकिन विषमताओं और विद्रूपताओं से भरे भारत जैसे मुल्कों में राज्य संचालन के लिए निहायत जरूरी कुछ सबक भाजपा को अपने इस विपरीत ध्रुव से सीखने की जरूरत है. कहना ना होगा कि वैचारिक रूप से परस्पर विरोधी कहलाये जाने वाले संघ और वामपंथी नेताओं के जीवन, आदर्शों और वैचारिकी में प्रबल विरोध के बावजूद सादगी पूर्ण जीवन की एक दुर्लभ समानता भी थी.

पी सी जोशी,एम एन राय, श्रीपद डांगे, ए के गोपालन, ई एम एस नंबूदरीपाद, ज्योति बसु जैसे धुरंधर साम्यवादियों ने कई बार सत्ता का स्वाद चखने या उसका कृपापात्र होने के बावजूद अपनी जीवनशैली को सादगी की पटरी से उतरने नहीं दिया. ठीक यही विशेषता संघ परिवार की पहली और दूसरी पीढ़ी के डा केशव बलिराम हेडगेवार, पी वी काने, गुरू गोलवलकर, देवरस बंधु, दीनदयाल उपाध्याय, दत्तोपंत ठेंगड़ी, कुशाभाउ ठाकरे, एच वी शेषाद्रि और नानाजी देशमुख जैसे नेताओं की रही. तब की सर्वशक्तिमान बाहुबली कांग्रेस की शोशेबाजी और भौंडेपन के सामने इन दोनों ही वैचारिक प्रतिस्पर्धियों ने सादगी और अनुशासन को ही अपना हथियार बनाया था.

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