किताबों के लिए उनका अपना एक घर होना

दिनेश श्रीनेत | फेसबुक
मैं 11वीं में था जब गोरखपुर के राजकीय जिला पुस्तकालय की सदस्यता ली थी. उन दिनों सिर्फ 200 रुपये में सदस्यता मिल जाती थी. एक हरे रंग का कार्ड जारी होता था, जिस पर दो किताबें 15 दिन के लिए इश्यू होती थीं. लाइब्रेरियन सख़्त मिज़ाज मगर अनुशासनप्रिय, 50 पार का व्यक्ति था.

इसके अलावा बहुत थोड़ा सा स्टाफ था. एक दुबला-पतला सा नवयुवक जो किताबें इश्यू करता था और उनकी बगल वाली सीट पर धोती-कुरते वाले एक बुजुर्ग, जिनकी आँखों पर मोटा सा चश्मा चढ़ा होता था. उनका काम था अलमारी से किताबें निकालकर देना, मगर इस काम को करने की उनकी कतई इच्छा नहीं रहती थी. सारी किताबें ताले में बंद रहती थीं. किताबें हमें बाहर से देखकर अंदाजा लगाना होता था कि क्या काम का है. जब हम उनसे अलमारी खुलवाने को कहते थे तो वे चाभी लेकर खड़े रहते थे. यानी उनके खड़े-खड़े ही हमें किताब देखनी, पसंद करनी और निकालनी होती थी. कई सिर्फ किताब का टाइटिल देखकर हमारा चयन गलत हो जाता था, ऐसे में उनसे किसी और अलमारी को खोलने के लिए अनुनय करना पड़ता था.


बहरहाल इस लाइब्रेरी ने मेरे सामने एक बहुत बड़ी दुनिया खोल दी. यहीं पर मैंने अदूर गोपालकृष्णन की फिल्म ‘मुखामुखम’ और ‘मतिलुकल’ की पटकथाएं पढ़ीं. एटनबरो की ‘गांधी’, बेनेगल की ‘मंथन’ और सेन की ‘खंडहर’ की पटकथा भी यहीं पढ़ने को मिली. सीगल बुक्स ने सिनेमा पर बहुत अच्छी किताबें प्रकाशित की हैं. हिंदी का सेक्शन भी बहुत बड़ा था और विपुल संख्या में कविता, उपन्यास तथा कहानियों की किताबें थीं. यहां पर कुछ दुर्लभ पुरानी किताबें भी थीं. जैसे हिंदी में आने वाले शुरुआती अनुवाद, जो किसी अंगरेजी पल्प फिक्शन के थे और ‘लंदन रहस्य’ के नाम से कई खंडों में छपे थे. हेनरी राइडर हैगार्ड की ‘शी’, ‘रिटर्न ऑफ शी’ और ‘किंग सोलोमन्स माइन्स’.

मुझे यहां पर ठीक-ठाक अमेरिकन साहित्य भी हिंदी में पढ़ने को मिल गया. इसमें जॉन स्टेनबेक, अर्नेस्ट हेमिंग्वे, मार्क ट्वेन शामिल थे. सचेतन कहानी आंदोलन की बहुत सी अचर्चित कहानियों के संकलन भी यहां मौजूद थे. जब कॉलेज गया तो मित्रों की वजह से हिंदी साहित्य में दिलचस्पी जगी. मैंने शमशेर बहादुर सिंह को इसी लाइब्रेरी से पढ़ा और वे मेरे प्रिय कवि बने. रंजना अरगड़े का उन पर लिखा बेहद ईमानदार शोध प्रबंध भी यहीं पढ़ने को मिला, जिससे कवि के बारे में बेहतर समझ बनी. नामवर सिंह की ‘छायावाद’, ‘कविता के नए प्रतिमान’ और ‘कहानी नई कहानी’ पढ़कर हिंदी साहित्य के प्रति नजरिया और स्पष्ट हुआ.

कई बार मैं और मेरा दोस्त जब लाइब्रेरी पहुँचते तो देखते-देखते बादल घिर आते, अंधेरा छा जाता और जोर से बारिश शुरू हो जाती. हम वहीं पर पत्रिकाएं या अखबार पलटते रहते. लाइब्रेरी में आने वाले लोग हमेशा ही बड़े दिलचस्प होते थे. कुछ बुजुर्ग टाइम पास करने आते थे और वे वहां मौजूद हर अखबार का प्रत्येक पन्ना पढ़ डालते. मुख्य पृष्ठ से लेकर बाजार भाव तक. दुबली-पतली, चश्मा चढ़ाए प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करती लड़कियां यदा-कदा दिख जातीं. वे एक मोटी सी नोटबुक लेकर अखबारों से कुछ-कुछ नोट करती रहतीं.

लकड़ी और लोहे की अलमारियों के पीछे विचारों की एक पूरी दुनिया थी. मेरी स्वतःस्फूर्त दिलचस्पी मलयज और विजयदेव नारायण साही जैसे कवि-आलोचकों में जगी. हालांकि इनका लिखा बहुत कुछ नहीं मिल पाया. उन्हीं दिनों में रघुवीर सहाय को भी इसी लाइब्रेरी से पढ़ा था और वे मुझे कुछ खास पसंद नहीं आए. करीब आठ साल तक मैं इस पुस्तकालय आता जाता रहा. इसके बाद शहर छोड़ दिया. कुछ साल पहले उधर से गुजरा था तो लाइब्रेरी बहुत जर्जर सी अवस्था में दिखी. ज्यादातर राजकीय पुस्तकालयों की तरह इसकी भी स्थिति खराब होती नजर आ रही थी.

मेरे बहुत सारे नायक, नायिकाएं आज भी उन पुरानी सीलन से खराब होती अलमारियों में कैद हैं. बहुत सारी यादें और विचार भी. किताबें आज भी छप रही हैं, लोग खरीद रहे हैं, पढ़ रहे हैं.

किताबों के लिए उनका अपना एक घर होना निरंतर मुश्किल क्यों होता जा रहा है?

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