अंतर्राष्ट्रीय मवेशी तस्करी में छत्तीसगढ़ कनेक्शन

रायपुर | डेस्क: भारत-बांग्लादेश सीमा पर मवेशियों की तस्करी में सीमा सुरक्षा बल की भूमिका की जांच शुरु हो गई है. इस सिलसिले में हाल ही में सीबीआई के अधिकारियों ने भिलाई में बीएसएफ के एक अधिकारी से लंबी पूछताछ की थी.

बीबीसी के अनुसार सीमा पर मवेशियों की तस्करी रोकने की जिम्मेदारी भी बीएसएफ़ के जवानों की होती है लेकिन ऐसे आरोप लगे हैं कि तस्करी करने वाले एक संगठित रैकेट के साथ बीएसएफ़ के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की सांठगांठ थी.


बीएसएफ़ अधिकारियों के अलावा कुछ नेता, कस्टम अधिकारी और पुलिस अधिकारियों के भी इसमें शामिल होने की बात कही जा रही है. जांचकर्ताओं का कहना है कि मुख्य तौर पर यह रैकेट पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद और मालदा में काम कर रहा था लेकिन कोलकाता में मौजूद वरिष्ठ अधिकारी इस रैकेट को चला रहे थे.

सीबीआई ने 23 सितंबर को देश के कई हिस्सों में छापा मारा था. ये छापे कोलकाता, मुर्शिदाबाद, गाज़ियाबाद और पंजाब और छत्तीसगढ़ के कई जगहों पर मारे गए थे.

बीएसएफ़ ने आधिकारिक तौर पर जानकारी दी है कि केंद्रीय जांचकर्ताओं ने बीएसएफ़ के कमांडेंट सतीश कुमार के घरों और संपत्तियों पर छापा मारा है. सतीश कुमार अभी छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी ऑपरेशन के हिस्सा हैं.

मुर्शिदाबाद के रहने वाले इनामुल शेख रैकेट के मुख्य सरगना है. शेख को 2018 में भी गिरफ़्तार किया जा चुका है और अभी वो जमानत पर हैं. बीएसएफ़ के कमांडेंट जिबू मैथ्यू को केरल के अल्लापुझा में 47 लाख नकदी के साथ रंगे हाथ पकड़ा गया था.

इसके बाद ही इनामुल शेख की गिरफ्तारी हुई थी. मैथ्यू 83 बटालियन के कमांडेंट थे जो पश्चिम बंगाल में भारत-बांग्लादेश सीमा पर तैनात थी. उन्होंने बताया था कि उन्हें ये पैसे मवेशी तस्करियों से मिला था.

एक वरिष्ठ बीएसएफ़ अधिकारी ने नाम नहीं बताने के शर्त पर कहा, “जिन लोगों के नाम बाहर आए हैं ये वाकई में छोटी मछलियाँ हैं. कुछ बहुत वरिष्ठ अधिकारी भी इस रैकेट में शामिल हैं.”

सूत्रों के मुताबिक रैकेट में शामिल कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने या तो नौकरी छोड़ दी है या फिर विदेश चले गए हैं. कुछ वरिष्ठ अधिकारी तो दूसरे एजेंसियों में नियुक्त कर दिए गए हैं. एक की मौत भी हो गई है और कुछ अभी भी बीएसएफ़ में हैं लेकिन उनकी पोस्टिंग कहीं और कर दी गई है.

बीएसएफ के एक दूसरे अधिकारी ने बताया कि, “ना सिर्फ़ हमारे अधिकारी बल्कि कुछ पुलिस, कस्टम और नेता भी इसमें शामिल थे.”

दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार चंदन नंदी सालों तक गृह मंत्रालय और केंद्रीय बलों के ऊपर रिपोर्टिंग कर चुके हैं.

उनका कहना है, “इस रैकेट की जड़ें काफी गहरी हैं. यह एक बहुत संगठित रैकेट है और इसे राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त रहा है. पश्चिम बंगाल में ना सिर्फ़ स्थानीय नेताओं बल्कि केंद्रीय स्तर के नेताओं ने भी इस रैकेट को मदद पुहँचाई है. और इसलिए मुझे इस बात को लेकर संदेह है कि कोई केंद्रीय एजेंसी इस मामले के तह तक पहुँच पाएगी.”

मैथ्यू और शेख की 2018 में हुई गिरफ्तारी के बाद इस रैकेट के बारे में पता चला था. बीबीसी को पता चला है कि बीएसएफ़ के एक व्हिसलब्लोअर ने साल 2016 में डायरेक्टर जनरल को चिट्ठी लिखकर इस रैकेट की सूचना दी थी. पहले 20 बटालियन में उनकी पोस्टिंग हुई थी जो फरक्का में तैनात थी.

डायरेक्टर जनरल को लिखे चिट्ठी में लिखा था, “अधिकारियों और पोस्ट कमांडर्स को सीमा पर मौजूद मुख्यालय के अधिकारियों से तस्करों की बात मानने को लेकर सीधे दिशा-निर्देश मिल रहे हैं. कंपनी कमांडर्स और पोस्ट कमांडर्स को क्षेत्र में तस्करी जारी रखने को लेकर निर्देश दिए जा रहे हैं और उन्हें ऐसा करने को मजबूर किया जा रहा है.”

जांचकर्ताओं का कहना है कि पूर्व डीआईजी, कमांडेंट और सेकेंड-इन कमांड्स जैसे अधिकारी इसमें शामिल रहे हैं.

एक अधिकारी ने बताया, “दिलचस्प रूप से इसमें से कुछ अधिकारियों के ऊपर जवानों के ऊपर निगरानी रखने की जिम्मेवारी थी. वे जवानों के ऊपर यह नज़र रखने के लिए नियुक्त थे कि कहीं जवान रिश्वत तो नहीं ले रहे हैं. लेकिन वो ख़ुद तस्करों से रिश्वत ले रहे थे.”

और ‘रिश्वत’ की रकम करोड़ो में थी. नाम ना बताने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया कि, “इनमें से कुछ ने 200 करोड़ की संपत्ति जुटाई है तो कुछ ने 300 करोड़ तक की. जूनियर अधिकारियों ने भी लाखों बनाए हैं. उन्होंने घर, आलीशान अपार्टमेंट, फार्म हाउस और क्या नहीं खरीदा है. हमें अब तक यह नहीं पता चल पाया है कि उन लोगों ने तीन सालों में आख़िर कितनी संपत्ति जुटाई है.”

बीएसएफ़ के रिटार्यड डीआईजी समीर कुमार मित्रा का कहना है, “जब किसी के ऊपर पहरे की जिम्मेवारी हो और उसकी नियत ग़लत हो जाए तो फिर हालात और ख़राब हो जाते हैं.”

मित्रा को अपने उस फोर्स के जवानों का नाम मवेशी तस्करी के मामले में आता दिख कर तकलीफ होती है जिस फोर्स में उन्होंने दशकों तक सेवा दी है और जिसने 1971 की लड़ाई लड में शिरकत की हो.

उनका कहना है, “शुरुआत से ही बीएसएफ़ भारत और बांग्लादेश के लिए लड़ता रहा है. हमने 71 की लड़ाई लड़ी. यह दुनिया की सबसे बड़ी सीमा सुरक्षा बल है. इस बल के कुछ अधिकारियों का नाम मवेशियों की तस्करी में आना अविश्वसनीय है. यह बिल्कुल माफ नहीं करने लायक अपराध है.”

भारत-बांग्लादेश सीमा पर मवेशियों की तस्करी लंबे समय से चली आ रही है लेकिन मित्रा इस बात को लेकर चिंतित हैं कि यह संस्थागत हो चुका है.

वो आगे कहते हैं, “बीएसएफ़ सिर्फ़ सीमा पर तैनात रहता है लेकिन ये मवेशी भारत के पश्चिमी राज्यों पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश से लाए जाते हैं. पश्चिम बंगाल की सीमा पर पहुंचने से पहले इन राज्यों की पुलिस को उन्हें रोकना चाहिए. वे भी अपनी जिम्मेवारी से बच नहीं सकते. केवल एक निष्पक्ष जांच से ही उन सभी लोगों के नाम उजागर होंगे जो बीएसएफ़ अधिकारियों की तरह सरकारी सेवा में नहीं है.”

जांचकर्ताओं को इस बात की पूरी जानकारी मिल चुकी है कि कैसे ये रैकेट काम करता है.

जांचकर्ताओं ने अपनी जांच में पाया है कि “मवेशियाँ उत्तरी और पश्चिमी राज्यों से बीरभूम ज़िले में लाई जाती है. वहाँ से मवेशियों को मुर्शिदाबाद की सीमा पर लाया जाता है. कितने मवेशियों की तस्करी होगी और किस जगह से होगी, वो बीएसएफ़ के अधिकारियों के साथ मिलकर पहले से तय रहता था.

एक दूसरा तरीका भी है जिसके माध्यम से इस रैकेट को लाभ होता था.

“बीएसएफ़ जिन मवेशियों को पकड़ता था, उनकी कस्टम के मार्फत नीलामी होती थी. स्वस्थ्य मवेशियों को बछड़े या फिर बंगाल की स्थानीय किस्म के तौर पर रिकॉर्ड किया जाता था. ये उत्तर और पश्चिमी भारत में मवेशियों को मिलने वाली क़ीमत से काफी कम होती है. बीएसएफ़ के अधिकारियों की मदद से तस्कर इन पकड़े हुए मवेशियों को नीलामी के दौरान ख़ुद ही कम क़ीमत पर खरीद लेते थे.”

जांच में पाया गया है कि हर रात 13-14 करोड़ की क़ीमत के मवेशी सीमा पर एक ही जगह से बांग्लादेश भेजे जाते थे. हालांकि मवेशी तस्करी के रैकेट के बारे में पता चलने और दक्षिण बंगाल की सीमा पर बीएसएफ़ के संदिग्ध अधिकारियों की तैनाती के बाद मवेशियों की तस्करी में काफी कमी आई है.

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