बस्तर में ‘बंगाली मुक्त’ मुहिम

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ के बस्तर में इन दिनों ‘बंगालीमुक्त’ करने का पोस्टर देखा जा सकता है. दरअसल, छत्तीसगढ़ शासन ने पिछले महीने बस्तर में रहने वाले बंगाली समाज के 6 जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने का आदेश दिया था. उसी के बाद स्थानीय लोगों में असंतोष पनपा है. 46 साल पहले बांग्लादेश से आने वासे शर्णार्तियों को बस्तर में भी बसाया गया था. आज उन्हीं शर्णार्थियों की दूसरी-तीसरी पीढ़ी वहां बसती है जिनका जन्म ही छत्तीसगढ़ में हुआ है. इनकी आबादी करीब 3 लाख है तथा ये बस्तर के करीब 150 गांवों में फैले हुये हैं.

बस्तर के आदिवासी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने बीबीसी से कहा, “बेहद पिछड़े आदिवासी समाज की तुलना में पढ़े-लिखे बंगभाषियों ने पिछले चार दशकों में सरकार की तमाम योजनाओं का ख़ूब लाभ उठाया है. समाज की दूसरी जातियां भी इससे प्रभावित हुई हैं. सरकार के ताज़ा आरक्षण के फ़ैसले ने एक बार फिर यहां के मूल निवासियों में असुरक्षा की भावना भर दी है.”


उधर, ‘बंगाली समाज’ के नेता असीम राय का बीबीसी से कहना हैं कि उन्हें आरक्षण का लाभ देने से आदिवासियों को कोई नुक़सान नहीं होगा. उनका कहना है कि दूसरे कई राज्यों में बांग्लादेश से आई कुछ खास जातियों को आरक्षण मिला है और छत्तीसगढ़ सरकार ने भी वही किया है.

वे कहते हैं, “बस्तर के आदिवासियों और दूसरी जातियों के साथ हमारी दो पीढ़ियां शांति से रहती आई हैं. मगर कुछ नेता अपना अस्तित्व बचाने के लिए बस्तर के लोगों को भड़का रहे हैं.”

बंग समुदाय के पिछड़ों के लिये आरक्षण की मांग करने वालों का कथन है कि इन इन वर्गों को असम, त्रिपुरा, मेघालय, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, अंडमान निकोबार और अरुणाचल प्रदेश में एससी वर्ग में रखा गया है इसीलिये छत्तीसगढ़ में भी उन्हें एससी वर्ग में शामिल किया जाये.

उल्लेखनीय है कि भारत के बंटवारे के बाद पूर्वी पाकिस्तान से कई हिन्दू बंगाली परिवार विस्थापित होकर भारत आ गये थे. उस समय भारत सरकार ने उन विस्थापितों को देश के अलग-अलग राज्यों में बसाया था जिनमें से बस्तर का यह इलाका भी शामिल है. बस्तर में रहने वाले उन्हीं बंगभाषियों ने कुछ माह पहिले छत्तीसगढ़ शासन से आरक्षण देने की मांग की थी.

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