छत्तीसगढ़: CoBRA कमांडो ने खुदकुशी की

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में एक सीआरपीएफ कमांडो ने खुदकुशी कर ली है. मिली जानकारी के अनुसार सीआरपीएफ के कोबरा कमांडो बीजू कुमार टीएस ने शुक्रवार को अपने सर्विस करबाइन से आत्महत्या कर ली है. दोपहर को उनका खून से लथपथ शरीर जगदलपुर के कैंप में पाया गया है. कोबरा (कमांडो बटैलियन फॉर रेजोल्यूट एक्शन) सीआरपीएफ की जंगल वारफेयर यूनिट है. नक्सल विरोधी अभियान चलाने के लिये इस टीम को तैनात किया गया है. उन्होंने एक सुसाइड नोट भी छोड़ा है जिसमें लिखा है कि इस घटना के लिये कोई जिम्मेदार नहीं है. सीआरपीएफ ने मामले की कोर्ट ऑफ इंक्वॉयरी के आदेश दे दिये हैं. आत्महत्या करने वाला कोबरा कमांडो केरल के तिरुवनंतपुरम का रहने वाला था.

गौरतलब है कि जब 2 फरवरी 2017 को सीआरपीएफ के डीजी दुर्गा प्रसाद जब छत्तीसगढ़ में जवानों के बीच ग्राउंड रियालिटी जानने पहुंचे थे तो रायपुर स्थित थनौद के सीआरपीएफ के जवानों ने उनसे तबादले की मांग की थी. मीडिया से चर्चा में दुर्गा प्रसाद ने कहा कि दरबार में कुछ जवानों ने ट्रांसफर का अनुरोध किया.


साल 2016 में आत्महत्या
* 14 दिसंबर को नक्सल प्रभावित सुकमा में सीआरपीएफ के जवान रोशन एक्का ने सर्विस रायफल से खुद को गोली मार ली थी.
* 29 अक्टूबर को सीआरपीएफ के 231वीं बटालियन के जवान सुनील कुमार ने दंतेवाड़ा में आत्महत्या कर ली थी.
* दंतेवाड़ा में जून माह में कोंदापारा में सतीश ने आत्महत्या कर ली थी.
* जून माह में ही बीजापुर में पदस्थ पवित्र यादव ने एके-47 से आत्महत्या की थी.
* इसी तरह से जुलाई माह में सुकमा में तेजवीर सिंह ने अपनी पिस्टल से आत्महत्या कर ली थी.

सबसे ज्यादा आत्महत्या CRPF में
उल्लेखनीय है कि Central Armed Police Forces personnel (CAPF) में सबसे ज्यादा आत्महत्या CRPF के जवान करते हैं. पिछले चार सालों में पूरे देश में CRPF में 137 आत्महत्या, ITBP में 12 आत्महत्या, SSB में 26 आत्महत्या, CISF में 50 आत्महत्या और AR में 32 आत्महत्या के मामले सामने आये हैं.

संसद में पेश आकड़ें
गौरतलब है कि पिछले पांच साल में नक्सली इलाकों में सीआरपीएफ के 870 जवान तनाव के कारण मारे गये हैं. इसकी तुलना में नक्सलियों द्वारा मारे गये सीआरपीएफ के जवानों की संख्या 323 है. कांग्रेस के सांसद मोतीलाल वोरा द्वारा पूछे गये सवाल के जवाब में गृह राज्यमंत्री हरिभाई चौधरी ने बताया था कि 2009 के जनवरी माह से 2013 के दिसंबर माह तक नक्सली इलाकों में तैनात सीआरपीएफ के 642 जवान हृदयाघात से मारे गये तथा 228 ने अवसाद के कारण आत्महत्या कर ली. इसी अवधि में मलेरिया से मरने वाले जवानों की संख्या 108 है.

इसी के साथ सवाल किया जाना चाहिये कि आखिर क्यों नक्सल इलाकों में जाते ही जवान तनावग्रस्त हो जाते हैं. यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि नक्सली इलाकों में सीआरपीएफ तथा पुलिस की पोस्टिंग को ‘पनिशमेंट’ के रूप में देखा जाता है. कई नक्सल प्रभावित इलाकों में खाने की कौन कहे पीने के पानी तक की ठीक से व्यवस्था नहीं होती है.

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