छत्तीसगढ़ में मृत्युदर ज्यादा क्यों?

रायपुर | विशेष संवाददाता: छत्तीसगढ़ मृत्युदर के मामले में अग्रणी राज्यों में है. सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम, रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के द्वारा हाल ही में जारी किये गये साल 2015 के आकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में मृत्युदर 7.5 है जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 6.5 है. देश में सबसे ज्यादा मृत्युदर ओडिशा में 7.6 है उसके बाद छत्तीसगढ़ तथा मध्यप्रदेश का 7.5 है.

यह आकड़ा देश के 21 राज्यों, 9 छोटे राज्यों तथा 6 केन्द्र शासित क्षेत्रों का है. मृत्युदर का अर्थ है प्रति 1,000 में मरने वालों की संख्या. यह एक जाना-माना पैमाना है जिसके आधार पर किसी भी देश, राज्य या क्षेत्र के बारें में जानकारी मिलती है.


वैसे जन्मदर के मामले में भी छत्तीसगढ़ देश के अग्रणी राज्यों में से है. छत्तीसगढ़ में जन्मदर 23.2 है जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 20.8 है. इस मायने में छत्तीसगढ़ की स्थिति अच्छी मानी जा सकती है. देश में सबसे ज्यादा जन्मदर उत्तरप्रदेश में 26.7 उसके बाद बिहार में 26.3, मध्यप्रदेश में 25.5, राजस्थान में 24.8. झारखंड में 23.5 तथा छत्तीसगढ़ में 23.2 है.

हालांकि, छत्तीसगढ़ का प्राकृतिक विकास दर 15.7 है जो राष्ट्रीय औसत 14.3 से ज्यादा है.

छत्तीसगढ़ में शिशु मृत्युदर में कमी आने के बावजूद भी यह 41 है जो राष्ट्रीय औसत 37 से ज्यादा है जबकि इसे तब बेहतर माना जाता जब यह राष्ट्रीय औसत से कम आता.

मामला मृत्युदर का है. जानकारों का मानना है कि मृत्युदर उस क्षेत्र के आबादी का अपने ऊपर निवेश करने की क्षमता पर निर्भर करता है. जिसका अर्थ होता है कि स्वास्थ्य पर, पोषण पर, पीने के स्वच्छ पानी पर, रहने के लिये साफ सुथरे वातावरण पर, ठंडी-गर्मी-बरसात से बचाने वाले रहने के स्थान पर खर्च करने की क्षमता पर निर्भर करता है.

आज के दौर में इसे अपने ऊपर निवेश करने की क्षमता माना जाता है क्योंकि पूरी दुनिया में सरकारें जन परोपकारी योजनाओं से हाथ पीछे खींच रही है.

इस कारण से खुद ही अपने स्वास्थ्य और पोषण पर खर्च करना पड़ता है. चूंकि रिजर्व बैंक के आकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ की 39.93 फीसदी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे रहती है इसलिये जाहिर है कि अपने ऊपर खर्च करना तो 39.93 फीसदी आबादी के वश की बात ही नहीं है. उसके बाद भी जो गरीबी रेखा से उपर हैं वे इतने अमीर तो नहीं हैं कि भोजन के बाद स्वास्थ्य पर खर्च कर सके.

1991 से देश में नई आर्थिक नीति अपनाये जाने के बाद से केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों ने स्वास्थ्य पर खर्च करने से अपने हाथ पीछे खींच लिया है. यह उन विदेशी संस्थागत कर्जदाता एजेंसियों की गोपनीय शर्तों में शामिल है जिससे कर्ज लेकर सरकारों ने घी पीना शुरू किया था.

पहले जिन सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में चिकित्सा होती थी वहां भी अब फीस ली जाती है. निजी क्षेत्र की तो बात ही अलग है. जो जितना ज्यादा खर्च कर सकता है उसे उतनी ज्यादा स्वास्थ्य सेवा मुहैया होगी.

दरअसल, स्वास्थ्य अब सेवा न रह के एक वस्तु बन गई है. बिकने वाली वस्तु, जिसमें चिकित्सक की फीस, दवा से लेकर जांच तक के लिये फीस चुकता करना पड़ता है.

इसका अर्थ है कि जब तक छत्तीसगढ़ से गरीबी दूर नहीं होगी यहां की मृत्युदर को कम करना कठिन काम है.

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