‘कोरबा की बेटियां, बेटों से कम है के’

कोरबा | अब्दुल असलम: छत्तीसगढ़ के कोरबा की चार बेटियों ने साबित कर दिया कि वे बेटों से कम नहीं हैं. उन्होंने अपने पिता की मृत्यु के बाद न केवल कैंसरग्रस्त मां का इलाज करवाया बल्कि मौत के बाद मां का अंतिम संस्कार भी खुद किया. हाल ही में जारी आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ में आमिर खान कहते हैं ‘म्हारी छोरियां छोरों से कम है के’. इस फिल्म में में बेटियां देश लिये पदक लेकर आती है. ठीक उसी तरह से कोरबा की चार बेटियों ने मां की मृत्यु के बाद सरकारी मदद न मिलने के बावजूद खुद ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया. उनकी देखादेखी उनकी सहेलिया भी श्मशान तक गई. सामाजिक रीतियों के अनुसार माता-पिता के निधन के बाद उनकी चिता को मुखाग्नि बेटे या फिर कोई बड़ा पुरुष देते है लेकिन कोरबा की चार बेटियों ने समाज की बेड़ियोँ को पीछे छोड़कर ना सिर्फ माँ की अर्थी को कंधा दिया मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार भी किया. इस तरह से चारों बहनों ने अपनी माँ की अंतिम इच्छा पूरी करते हुये बिलखते हुए मुखाग्नि देकर बेटे का फर्ज अदा किया.

छत्तीसगढ़ की औद्योगिक नगरी कोरबा के पुरानी बस्ती स्थित मुक्तिधाम में एक ऐसा वाकया सामने आया जिसने बेटियों के प्रति समाज के नज़रिये को बदल कर रख दिया. पुरानी बस्ती निवासी कैंसर पीड़ित 45 वर्षीय गीता सिदार की शनिवार की रात निधन हो गया था. रविवार को चारों बहनों ने बेटा बनकर अपनी माँ की अर्थी को कंधा दिया और चिता को मुखाग्नि दी. अपनी सहेली के कंधे पर


इस नाजुक उम्र में चारों बहनों के ऊपर मानो पहाड़ टूट पड़ा. बीती रात अंजु की माँ गीता सिदार की तबियत अचानक ऐसी बिगड़ी की उसने एकाएक दम तोड़ दिया. माँ की मौत के बाद इन बेटियों के सामने अँधेरा छा गया. घर में कोई पुरुष या कोई भाई नहीं था अंतिम संस्कार करने की चुनौती सामने थी. बीए की पढाई कर रही अंजु ने हिम्मत दिखाई और छोटी बहनों में साहस भरा और खुद ही माँ की अंतिम इच्छा को पूरा करने मुखाग्नि देने तैयार हो गई.

बहनों की सुनकर पडोसी भी मदद के लिये आगे आये. इसके बाद माँ की अर्थी चारों बेटियों के कंधे पर निकली. इस दुख की घड़ी में इनके हौसले को देखते हुये उनकी सहेलियों भी मुक्तिधाम उनके साथ पहुची. मुक्तिधाम पहुँचकर चारों बहनों ने चिता को मुखाग्नि देकर बेटे का फर्ज निभाया और माँ की अंतिम इच्छा को पूरा किया. अंजू माँ की बातों को याद कर कहती है की उसकी माँ चार बेटियों को जरूर जन्म दिया लेकिन बेटों से कम नही है.

करीब दस साल पहले चारों बहनों के सिर से पिता का साया उठ गया था. पति धर्मेंद्र ठाकुर के गुजरने के बाद मृतका गीता ने अपनी चारों बेटियों को बेटे की तरह पाला था. खुद दूसरे के घरों में बर्तन धो कर बेटियों को पढ़ाया और उन्हें बड़ा किया. मगर कुछ साल पहले गीता को कैंसर की बीमारी ने घेर लिया था. गरीबी की मार झेल रही गीता के लिये इस बीमारी के इलाज के लिए पैसे नही थे जिससे पर्याप्त इलाज के अभाव में बीमारी नासूर बन गया. दिन पर दिन हालत बिगड़ते गये.

हालांकि, की रायपुर के मेकाहारा अस्पताल में उपचार चल रहा था लेकिन अचानक तबियत बिगड़ने से गीता ने दम तोड़ दिया और चारों बहनों को अनाथ छोड़ दिया. निगम की मुक्तांजलि योजना के लिए बहनों ने मदद मांगी लेकिन शनिवार को छुट्टी होने की दलील देकर निगम के अधिकरियों ने इतिश्री कर ली. आम लोगों की मदद से किसी तरह माँ की अंत्येष्टि का इंतेजाम हो सका. बेसहारा अंजु और उसकी बहनों ने सरकार से मदद की गुहार लगाई है की सरकार उन्हें कोई नौकरी दे जिससे उनकी आगे की पढाई और जीवन यापन हो सके. इधर मंजु ने भी सरकार से मदद की गुहार लगाई है.

पहले ही गरीबी की मार झेल रही इन बच्चियों को संभालने वाला अब कोई नहीं है. पिता के बाद अब माँ की मौत का सदमा झेल रही बेटियों ने सामाजिक रीतियों को बदलने का साहस दिखाया. मगर अब अपने जीवन को पटरी पर लाना उनके लिये बड़ी चुनौती है. ऐसे में सरकार की पहल उनके जख्म को मरहम बन सकती है. अब देखना होगा की इन बेटियों के लिये सरकार की बेटी बचाव बेटी पढ़ाओं योजना का कितना लाभ मिल सकता है.

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