नर्सिंग होम में नॉर्मल डिलीवरी कम क्यों?

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ के निजी नर्सिंग होम में ऑपरेशन से बच्चे होने के केस बढ़े हैं. जबकि इसके ठीक उलट सरकारी अस्पतालों में ऑपरेशन से बच्चे पैदा होने के केस कम हुये हैं तथा नॉर्मल डिलीवरी के केस बढ़े हैं. इसका खुलासा हाल ही में जारी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट में हुआ है. आंकड़ें चौकाने वाले तथा विश्वसनीय हैं. इससे जाहिर होता है कि निजी नर्सिंग होम में जानबूझकर मरीजों का ऑपरेशन किया जाता है अन्यथा और क्या कारण हो सकता है कि सरकारी अस्पतालों में नॉर्मल डिलीवरी से ही बच्चा ज्यादा पैदा होता है.

नेशनल पैमिली हेल्थ सर्वे- 4 जो साल 2015-16 के दौरान किया गया है उसके अऩुसार छत्तीसगढ़ में 9.9 फीसदी बच्चे बच्चों का जन्म ऑपरेशन से होता है. जबकि 10 साल पहले 4.1 फीसदी बच्चों का जन्म ऑपरेशन से होता है. इस तरह से ऑपरेशन से बच्चा होने का केस दोगुना हो गया है.


10 साल पहले निजी नर्सिंग होम तथा प्राइवेट अस्पतालों में ऑपरेशन से बच्चे होने के केस 32.7 फीसदी हुआ करते थे वे अब बढ़कर 46.6 फीसदी हो गये हैं. सबसे चौंकाने वाले आंकड़े ग्रामीण छत्तीसगढ़ की है. वहां 48.6 फीसदी ऑपरेशन के केस होते हैं जबकि शहरों में यह उससे कम 44.3 फीसदी का है.

अब जरा सरकारी अस्पतालों के आंकड़ो पर गौर करे. 10 साल पहले जहां छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों में 24.9 फीसदी बच्चे ऑपरेशन से हुआ करते थे वे अब घटकर महज 5.7 फीसदी के रह गये हैं. शहरों के सरकारी अस्पतालों में 8.9 फीसदी बच्चे ऑपरेशन से होते हैं तो ग्रामीण छत्तीसगढ़ के 5 फीसदी बच्चे ऑपरेशन से होते हैं.

इससे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की आलोचना करने वालों के मुंह बंद हो जायेंगे. यह सवाल किया जाना चाहिये कि आखिर वह कौन सा कारण है कि सरकारी अस्पतालों में ऑपरेशन से बच्चे पैदा करने के केस कम हो रहें हैं तथा निजी नर्सिंग होम तथा प्राइवेट अस्पतालों में यह बढ़ रहें हैं?

इससे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की तुलना निजी स्वास्थ्य सेवाओं से करने वालों के मुंह पर ताला लग जायेगा. स्वास्थ्य सेवाओं जब निजी हाथों में सौंप दी जाती है तो इसका समाज पर क्या असर पड़ता है इसे देखने के लिये जनसंख्या 2011 के आंकड़ों पर फिर से गौर करना दिलचस्प होगा.

छत्तीसगढ़ के बड़े शहरों की तुलना में छोटे शहरो में कन्याओं का अनुपात ज्यादा क्यों?

बस्तर, दंतेवाड़ा, महासमुंद, राजनांदगांव, धमतरी, कांकेर, जशपुर में पुरुषों की तुलना में स्त्रियों का अनुपात 1000 से ज्यादा है. वहीं बड़े शहरों रायपुर, दुर्ग, कोरबा, रायगढ़ व बिलासपुर में यह अनुपात कम है.

2011 की जनगणना के मुताबिक देश में स्त्रियों का अनुपात प्रति 1000 पुरुषों की तुलना में 940 है. छत्तीसगढ़ का औसत 991 है. छत्तीसगढ़ की स्थिति अन्य राज्यो की तुलना में बेहतर है लेकिन यह बढ़त मिली है छोटे शहरों और कस्बों से. बस्तर में कन्याओं का अनुपात सबसे ज्यादा 1024 है, फिर क्रमश: दंतेवाड़ा 1022, महासमुंद 1018, राजनांदगांव 1017, धमतरी 1012, काकेंर 1007 तथा जशपुर 1004 है.

इसकी तुलना में कोरबा 971, बिलासपुर 972, रायपुर 983, दुर्ग 988 एवं रायगढ़ 993 है. अर्थात सबसे कम स्त्रियों का अनुपात कोरबा तथा बिलासपुर का है. इन बड़े शहरों में सोनोग्राफी सेंटर छोटे शहरो की तुलना में ज्यादा हैं. रायपुर और बिलासपुर में कई ऐसे कुख्यात सोनोग्राफी सेंटर हैं, जो गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग बताते हैं.

इन कुख्यात सोनोग्राफी सेंटरों में ओडीशा से लेकर बंगाल तक की गर्भवती महिलायें आती हैं और जांच करा कर चली जाती हैं. नालियों में मिलने वाले भ्रूण की घटनायें भी कम नहीं हैं. संकट ये है कि अब तक राज्य सरकार ने ऐसे किसी भी सेंटर पर कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की, जो दूसरों के लिये सबक का कारण बने. ऐसे में भ्रूण परीक्षण का धंधा बेखौफ चल रहा है और बेटियां गर्भ में ही मारी जा रही हैं. आश्चर्य नहीं कि अगली बार जब जनगणना की रिपोर्ट आये तो छत्तीसगढ़ के इन बड़े शहरों का लिंगानुपात और कम हो जाये.

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