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जुड़वा बेटी पैदा हुई तो घर से भगाया

बिलासपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में जुड़वा बच्ची होने पर पति ने पत्नी को घर से निकाल दिया. छत्तीसगढ़ के कापू गांव में शेरसिंह पाले ने दो माह पहले अपनी पत्नी कांतिदेवी को जुड़वा बच्चियों सहित घर से निकाल दिया. कांतिदेवी को चार माह पहले ही जुड़वा बच्चियां हुई थी. दोनों बच्चियां स्वस्थ हैं पर पिता शेरसिंह पाले को लड़का ही चाहिये था. इसलिये वह पत्नी को जुड़वा बच्चियों के जन्म के कारण ताना देता था. जुड़वा बच्चियों के जन्म के बाद से शेरसिंह पाले का व्यवहार अपनी पत्नी के प्रति बदल गया था. बात-बात पर वह झगड़ा किया करता था. अंततः दो माह पहले उसने अपनी पत्नी को जुड़वा बच्चियों सहित घर से निकाल दिया. जिस देश की लोकसभा अध्यक्ष एक महिला है, जिस देश में कई महिला मंत्री, सांसद-विधायक, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, आईपीएस-आईएएस अधिकारी हैं, जिस देश में राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री के पद पर महिलायें रह चुकी हैं उस देश में बेटियों के जन्म के कारण उन्हें मां सहित घर से निकाला जाना अत्यंत शर्मनाक घटना है. इससे समाज के पिछड़े सोच का पता चलता है.

पति द्वारा घऱ से निकाल देने पर कांतिदेवी अपनी जुड़वा दुधमुंहे बच्चियों को लेकर मायके रतनपुर आ गई. मायके की आर्थिक हालत ठीक न होने के कारण कांतिदेवी अपने बच्चियों को लेकर भटकने पर मजबूर हो गई. उसके बाद से वह दर-दर भटक रही है. महिला अपने पति से इतनी भयभीत है कि उसने इसकी शिकायत किसी से नहीं की.

घटना की जानकारी मिलने पर महिला एवं बाल विकास अधिकारी ने कहा कि घटना शर्मनाक है तथा महिला एवं उसके बच्चों को सुरक्षा दी जायेगी.

एक तरफ छत्तीसगढ़ सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं’ को बढ़ावा दे रही है दूसरी तरफ पुरुषवादी मध्ययुगीन सोच के चलते बच्चियों सहित मां को घर से निकाला जा रहा है.

गौरतलब है कि चिकित्सीय तौर पर भी मां को बेटा या बेटी के जन्म के लिये जिम्मेदार नहीं माना जाता है.

वैज्ञानिक तथ्य: पति बेटा-बेटी के जन्म का जिम्मेदार
अक्सर समाज में बेटियों को जन्म के लिये पत्नी को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है तथा उस पर ताने कसे जाते हैं. जबकि वैज्ञानिक तौर पर पति ही बेटा या बेटियों के जन्म के लिये जिम्मेदार होता है. दरअसल लड़कियों में xx क्रोमोसोम के 23 जोड़े तथा लड़कों में xy क्रोमोसोम के 23 जोड़े होते हैं.

जब पति के वीर्य में x क्रोमोसोम की मात्रा अधिक होती है तो वह पत्नी के x क्रोमोसोम के साथ मिलकर लड़की को जन्म देता है. ठीक इसी तरह से जब पति के वीर्य में y क्रोमोसोम की मात्रा अधिक होती है तो वह पत्नी के x क्रोमोसोम के साथ मिलकर बेटे को जन्म देता है. जब पति के वीर्य में xy क्रोमोसोम की मात्रा बराबर होती है तो लड़का या लड़की के जन्म की समान संभावना रहती है.

कुलमिलाकर यह आनुवांशिक जीन है जो तय करता है कि लड़का पैदा होगा या लड़की उसके बावजूद समाज में पत्नी से उम्मीद की जाती है कि वह परिवार को बेटा दे. हालांकि, ऐसे परिवारों की भी कमी नहीं हैं जो बेटे के बजाये बेटी की चाहत रखते हैं.

शोध के नतीजे:
विदेश में इस बारें में एक शोध किया गया जिसमें 927 वंश-वृक्ष का अध्ययन किया है. इस अध्ययन में 5,56,387 लोगों के बारें में विस्तार से जांच की गई. इस अध्ययन में पाया गया कि यह आनुवांशिक रूप से तय होता है कि पैदा होने वाले बच्चे का लिंग क्या होगा. इस अध्ययन में 927 परिवारों के साल 1600 से होने वाले बच्चों का अध्ययन किया गया. अध्ययन में पाया गया कि जिन पतियों के ज्यादा भाई होते हैं वहां लड़के की जन्म की संभावना ज्यादा होती है तथा जिनके अधिक बहनें होती है उनके यहां लड़की की जन्म की अधिक संभावना होती है. अध्ययन को पढ़ने के लिये क्लिक करें.

छत्तीसगढ़ लिंगानुपात में अग्रणी
2011 की जनगणना के मुताबिक देश में स्त्रियों का अनुपात प्रति 1000 पुरुषों की तुलना में 940 है. छत्तीसगढ़ का औसत 991 है. छत्तीसगढ़ की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर है लेकिन यह बढ़त मिली है छोटे शहरों और कस्बों से.

बस्तर में कन्याओं का अनुपात सबसे ज्यादा 1024 है, फिर क्रमश: दंतेवाड़ा 1022, महासमुंद 1018, राजनांदगांव 1017, धमतरी 1012, काकेंर 1007 तथा जशपुर 1004 है.

इसकी तुलना में कोरबा 971, बिलासपुर 972, रायपुर 983, दुर्ग 988 एवं रायगढ़ 993 है. अर्थात सबसे कम स्त्रियों का अनुपात कोरबा तथा बिलासपुर का है.

हमारे देश में धन की देवी लक्ष्मी तथा ज्ञान की देवी सरस्वती को पूजा जाता है. उसी देश में बेटियों के प्रति समाज में पिछड़ी सोच वाकई में सोचनीय है.

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