छत्तीसगढ़: किसानों के लिये राहत की मांग

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने मांग की है कि जब तक किसानों से पूरा धान न खरीदी जारी रखने की मांग की है. छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने राजनांदगांव में चल रहे किसानों के धान सत्याग्रह का समर्थन करते हुये मांग करते हुये मांग की है कि जब तक किसानों का पूरा धान न खरीद लिया जाये धान की खरीदी जारी रहनी चाहिये. छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने आरोप लगाया है कि धान उत्पाद किसानों को सरकार प्रताड़ित कर रही है. उनसे उनका पूरा उत्पाद खरीदने की जगह उनपर अधिक धान बेचने का आपराधिक आरोप लगाया जा रहा मानों किसानों ने धान पैदा कर अपराध कर दिया हो. दूसरी ओर कितने ही जगहों पर नोटबंदी के दुष्परिणाम से मंडियों में खरीदारी रुक सी गई है और सरकार धान खरीदी 31 जनवरी को बंद कर देगी. इन्हीं परिस्थितियों ने किसानों को आंदोलन के लिये बाध्य कर दिया है.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने किसानों के लिये राहत की मांग की है. छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन का कहना है कि जब घाटे में चल रही स्टील उद्योग के लिये करोड़ों के राहत पैकेज की घोषमा की जा सकती है तो किसानों के लिये क्यों नहीं? मांग की गई है कि नोटबंदी की मार झेल रहे किसानों के लिये सरकार राहत पैकेज जारी करे, धान सहित आगामी दलहन तिलहन की समर्थन मूल्य पर संपूर्ण खरीदी सुनिश्चित करे.


छत्तीसगढ़ में किसानों की हालत पर चिंता जाहिर करते हुए आंदोलन के वरिष्ठ नेता आनंद मिश्रा ने कहा कि अधिक उत्पादन लागत तथा कम दाम ने और सुविधाओं के अभाव से खेती पहले ही संकटग्रस्त थी उसपर नोटबंदी ने तो किसानों की कमर ही तोड़ दी है. उन्होंने कहा है कि नोटबंदी के कारण सुस्त पड़े बाज़ार में किसानों की ठंड की फसल आई तो किसानों को उसके खरीददार नहीं मिल रहे हैं. सबसे ज्यादा नुकसान सब्जी उत्पादक और खासकर टमाटर उत्पादकों को हो रहा है. उनके लिये खेत से बाज़ार तक का खर्च भारी पड़ रहा है. नतीजे के तौर पर उन्हें टमाटर को वहीं सड़कों पर फेंकने मजबूर होना पड़ा. इसके बावजूद भी किसानों को कोई राहत नहीं दी गई है.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक मंडल सदस्य व किसान नेता नंद कुमार कश्यप ने कहा कि सरकार ने घाटे में चल रहे स्टील उद्योग को राहत पैकेज के साथ ही बिजली बिलों में न्यूनतम प्रभार में छूट का ऐलान किया है परंतु वहीं पर किसानों की कोई चिंता सरकार को नहीं है. जबकि किसान उतनी ही पूंजी से दोगुना से ज्यादा रोजगार पैदा करते हैं.

राज्य सरकार के कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए आंदोलन के संयोजक मंडल सदस्य आलोक शुक्ला ने कहा कि राज्य बनने के 16 साल बाद भी राज्य सरकार खेती के लिए आधारभूत संरचना जिसके अधीन कृषि उत्पादों को प्रोसेस कर मूल्य स्थिरीकरण हो सकता नहीं कर पायी है. यहां तक कि कोल्ड स्टोरेज जैसी बुनियादी सुविधायें भी देने में विफल रही है. जिसके कारण कच्चा और नष्ट हो जाने वाले कृषि उत्पादक अपने उत्पादों को फेंकने पर मजबूर हुये हैं.

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