क्यों हमलावर हो रहे हैं हाथी

रायपुर| संवाददाता: छत्तीसगढ़ में 176 लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है? यह सवाल अब किया जाना चाहिये. छत्तीसगढ़ में हाथियों एवं भालूओं के द्वारा साल 2015-16 से 2016-17 में जनवरी माह तक 176 लोग मारे गये हैं. इनमें से सभी मौतें तब हुई जब ग्रामीण अपने खेतों की रखवाली कर रहे थे या रात को घर में सो रहे थे या गांव के बाहर के जंगल में उनका सामना हाथी या भालू से हो गया था.

इतना ही नहीं छत्तीसगढ़ में इसी दरम्यान हाथियों द्वारा मकान तोड़ने की कुल 43,309 घटनायें घटी हैं. इसी दौरान हाथी एवं भालू द्वारा किसानों के 17048.34 हेक्टेयर भूमि की फसल को क्षति पहुंचाई गई है. हालांकि, सभी मामलों में राज्य शासन ने मुआवजा दिया तथा यथा संभव सहायता की है.


लेकिन, लाख टके का सवाल यह है कि ऐसा कौन सा कारण है कि हाथी तथा भालू अपने प्राकृतिक रहवास को छोड़कर उन गांवों तथा कुछ मामलों में शहर तक पहुंच जाते हैं जहां मानव निवास करते हैं. ऐसी कौन सी मजबूरियां कि हाथी या भालू जैसे जानवर अपने जंगल के खाने को छोड़कर खेतों तथा गांव की फसल तथा अनाज पर खाने के लिये टूट पड़ते हैं. जब ग्रामीण अपने फसल को बचाने का प्रयास करते हैं तो हाथी उन पर हमला कर देते हैं. हाथियों द्वारा ज्यादातर हुई मौंते इसी कारण से हुई है.

दरअसल, पिछले कुछ सालों से हाथियों के प्राकृतिक रहवास की जगह जंगल में कोल ब्लॉक मिले हैं. कोयले के लिये जंगल काटे जाने तथा कोल ब्लॉक खोदे जाने के कारण जंगलों से गांवों तथा शहरों की ओर भोजन की तलाश में आ जाते हैं. जब उन्हें आबादी वाले इलाके से खदेड़ने की कोशिश होती है तो वे हमला बोलते हैं और लोगों की जान चली जाती है.

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में 1 जनवरी 2008 से 31 जनवरी 2017 तक कुल 13547.096 हेक्टेयर वनों का खनन, औद्योगिकरण तथा विकास परियोजनाओं के लिये डायवर्सन किया गया.

जिसमें से खनन के लिये 8053.297 हेक्टेयर, औद्योगिकरण के लिये 686.848 हेक्टेयर तथा विकास परियोजनाओं के लिये 4806.951 वन भूमि का डायवर्सन किया गया है.

अब जब पशुओं के घर में घुसकर उन्हें खदेड़ा जा रहा हो तो वे कहां जायेंगे. बात चार्ल्स डार्विन के survival of the fittest के समान हो गई है. चार्ल्स डार्विन ने 1869 में अपने ‘विकास के सिद्धांत’ में यह प्रतिपादित किया था कि जिस जीव ने अपने आप को परिस्थिति के अनुसार ढाल लिया वह ही विकासक्रम में रह पाया और जो अपने आप को परिस्थिति के अनुसार ढाल नहीं पाया वह जीव धरती से गायब हो गया.

ऐसे में अपने प्राकृतिक रहवास से खदेड़े जाने के बाद हाथी व भालू, मानव के फसल एवं अनाज के भंडार तक अपनी भूख मिटाने के लिये नहीं पहुंचेंगे तो आने वाले समय में भोजन एवं आवास के अभाव में वे धरती से लुप्त हो जायेंगे.

यहां पर स्वर्गीय ओम पुरी का उल्लेख करना गलत न होगा. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 3 अक्टूबर 2014 को कंजरवेशन कोर सोसायटी द्वारा आयोजित परिचर्चा की शुरुआत करते हुये उन्होंने कहा था कि देश में 72 फीसदी कोयला गैर वन क्षेत्रों में है तथा 27 फीसदी कोयला वन क्षेत्रों में है. उन्होंने उद्योगपतियों से आग्रह किया था कि पहले कोयला गैर वन क्षेत्रों से निकाले.

हाथी और भालू से मानव का संघर्ष, दरअसल मानव द्वारा निर्मित है. हां, यह सच है कि जिन गांववालों तथा किसानों के घर टूटे या जिन्होंने अपनी जान गंवाई है, उन्होंने निश्चित तौर पर जंगल में खनन नहीं किया, उन्होंने वहां जाकर उद्योग नहीं लगाये. लेकिन जिन्होंने यह काम किया है, उस पर बहस करने की फुरसत किसी को नहीं है.

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