लॉकडाउन की आड़ में बाल विवाह

सुनील शर्मा | रायपुर : इस साल दसवीं की परीक्षा में 77 फीसदी अंक लाने वाली सुनीता की आंखों में बड़े-बड़े सपने पल रहे थे. ख़ूब अच्छे नंबरों से पास होने के बाद अब आगे कॉलेज़ की पढ़ाई के सपने. रात में पढ़ते-पढ़ते चांद-तारों से बात करती सुनीता सोचती थी कि पढ़ाई ठीक से हो जायेगी तो कोई अच्छी-सी नौकरी भी मिल जायेगी.

लेकिन कोरोना वायरस से बचने के लिये देश भर में किये गये लॉकडाउन में उसके सारे सपने तार-तार हो गये. लड़की की पढ़ाई-लिखाई और नौकरी के बजाये उसकी शादी को ज़रुरी मानने वाले सुनीता के परिजनों ने लॉकडाउन की आड़ में ही सुनीता से दुगनी उम्र के एक युवक से उसकी शादी करा दी.


लॉकडाउन में पहले दो माह 15 लोगों को ही शादी में शामिल होने की छुट थी. फिर यह संख्या 50 हुई. सरकार ने कोरोना का संक्रमण रोकने के लिए ऐसा किया था लेकिन लॉकडाउन में कम लोगों की उपस्थिति के नियम और आवाजाही बंद होने का रुढीवादियों ने फायदा उठाया और कई छोटी बच्चियों के हाथ पीले कर दिये गये.

मुंगेली ज़िले के एक गांव की रहने वाली 16 साल की सुनीता (बदला हुआ नाम) को यह बात पता नहीं थी कि उसके घर वाले उसकी शादी की तैयारी में जुटे हैं. वह तो दसवीं के बोर्ड एग्जाम की तैयारी में लगी थी. उसने खूब मन लगाकर पढ़ाई की और 77 प्रतिशत अंक हासिल किए लेकिन कुछ ही दिनों बाद उसकी उससे दोगुने उम्र के युवक से शादी कर दी गई. उसे जब पता चला तो उसने विरोध भी किया लेकिन उसकी आवाज दबा दी गई.

दरअसल सुनीता के पिता ने बचपन में ही एक संपन्न बुजुर्ग दंपत्ति को उसे परवरिश के लिए सौंप दिया था. उस बुजुर्ग दंपति ने एक युवक को अपना वारिस बनाने का फैसला किया और सुनीता से उसकी शादी करवा दी. यह शादी छत्तीसगढ़ के अनुसूचित जाति बाहुल्य इलाके मुंगेली के पास एक गांव में हुई.

इसका पता इसलिए भी नहीं चला क्योंकि गांव की लड़की, गांव में ही ब्याह दी गई. ज़ाहिर है, गांव में भी लोगों को देर से ही ख़बर हुई. गांव की सरहद से इस ख़बर के बाहर जाने का तो सवाल ही नहीं था क्योंकि इस तरह के बाल विवाह को अभी भी कई गांवों में असामान्य नहीं माना जाता.

पड़ोस के ही एक गांव में एक बुजुर्ग दंपत्ति ने अपनी दो बेटियों की शादी लॉकडाउन में की, जिसमें एक बेटी आशा (बदला हुआ नाम) नाबालिग थी. बुजुर्ग दंपत्ति का तर्क है कि दोनों 75-80 के होने को आये, कब सांस उखड़ जाए, ऐसे में कन्यादान कर दिया. उनकी तैयारी है कि अगले साल 14 साल की एक और बेटी का ब्याह कर के वो दुनियाबी कर्तव्यों से मुक्त हो जायें.

मुंगेली से कबीरधाम ज़िले की ओर जाने वाली सड़क पर बसे एक गांव में ब्राह्मण परिवार ने अपनी नाबालिग बेटी सुकन्या (17 वर्ष) की शादी केवल इसलिए कर दी क्योंकि वह किसी दूसरी जाति के लड़के से प्रेम करती थी. यह बात उन्हें नागवार गुजरी और आनन-फानन में लॉकडाउन में शादी कर दी. लड़की मां के सामने खूब गिड़गिड़ाई लेकिन उसने भी साथ नहीं दिया. बता दें कि उसकी मां का भी बाल विवाह हुआ था.

हालांकि इस कहानी में शादी तक तो परिजनों की चली लेकिन शादी के कुछ दिनों बाद सुकन्या अपने प्रेमी के साथ कहीं चली गई और अब उसके मां-बाप दुखी और परेशान हैं.

सुनीता (16), आशा(17) और सुकन्या(17) अकेली नाबालिग नहीं हैं, जिनकी इस लॉकडाउन में शादी हुई. छत्तीसगढ़ के अलग-अलग इलाकों में लॉकडाउन के दौरान बड़ी संख्या में बाल विवाह के मामले सामने आए. छोटी उम्र की लड़कियों को दोगुने उम्र के युवकों के साथ ब्याह दिया गया. दरअसल लॉकडाउन को महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों ने छुट्‌टी समझ लिया और उन्होंने शादियों को रोकने की दिशा में कोई काम नहीं किया. सूचनाएं उन तक पहुंची नहीं और उन्होंने इसके लिए प्रयास भी नहीं किया. कानोकान खबर नहीं हुई और धड़ाधड़ शादियां होती रही. ग्रामीण इलाकों में शादियों के लिए अनुमति तक नहीं ली गई. अनुमति लेने पर डर ये था कि प्रशासन को इसकी खबर लग जाएगी और शादी रुक जाएगी.

बच्चों की शादियों को रोकने के लिए 1928 में शारदा एक्ट बनाया गया था. उसके बाद 1978 में हिंदू विवाह अधिनयम और बाल विवाह अधिनियम में संशोधन करके लड़की की शादी की उम्र 18 साल और लड़के की शादी की उम्र 21 साल निर्धारित की गई. शारदा एक्ट के उल्लंघन पर कड़ी क़ानूनी कार्रवाई का प्रावधान किया गया.

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की अधिवक्ता निरुपमा बाजपेयी कहती हैं, “ शारदा एक्ट बना है लेकिन कानूनी पेचीदगियां इतनी अधिक है कि इसका लाभ नहीं मिल पाता. इसे सरलीकृत करना चाहिए. लड़की विरोध भी कहां करे, उसके घरवाले ही उसे निकाल देंगे, फिर वह कहां जाएगी. सामाजिक ढांचे में भी बदलाव की जरूरत है.”

हर साल 350 से अधिक बाल विवाह रोके गये

लॉकडाउन बाल विवाह के लिए सुअवसर के तौर पर सामने आया। पुलिस लॉकडाउन को सफल बनाने में व्यस्त रही. महिला एवं बाल विकास विभाग ने आंखें मूंद ली और इस बीच खासतौर पर दूरस्थ अंचलों में सैकड़ों बाल विवाह हुए। हालत ये है कि हर साल साढ़े तीन सौ से अधिक बाल विवाह के मामले रोकने का दावा करने वाले जिम्मेदारों के पास ये आंकड़े भी नहीं हैं कि उन्होंने इस बार कितने मामले रोके.

सामाजिक कार्यकर्ता नवनीता सेन कहती हैं- “भविष्य में घरेलू हिंसा, अनवांटेड प्रेग्नेंसी, कुपोषण जैसे मामले बढ़ेंगे और इससे निपटने के लिए भी सरकार के पास पुख्ता इंतजाम नहीं हैं.”

ज़ाहिर है, ऐसी जिम्मेवारियों के कारण ही राज्य की महिला एवं बाल विकास विभाग की मंत्री यह मानने तैयार नहीं हैं कि राज्य में इस साल लॉकडाउन के दौरान बाल विवाह हुए हैं.

लॉकडाउन में अक्षय तृतीया यानी मिल गया मौका

छत्तीसगढ़ में अक्षय तृतीया के दिन बच्चों द्वारा गुड्डे-गुड्डियों की शादी रचाने की परंपरा रही है. लेकिन अक्षय तृतीया को शुभ मुहुर्त वाला दिन बता कर नाबालिग और यहां तक दुधमुँहे बच्चों तक की शादियां कर देना, इस खेल का भयावह पहलू है. ऐसी मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन मुहुर्त निकालने, गन मिलाने और यहां तक कि शादी करवाने के लिए पंडित की भी ज़रूरत नहीं पड़ती.

न्यूनतम रस्मों के कारण इस दिन शादी में रुपए भी कम ख़र्च होते हैं. छोटे बच्चों की शादी में दहेज की मांग भी नहीं के बराबर होती है और उस पर यह धार्मिक आस्था भी कि इस दिन दान देने से सात जन्मों के बराबर का पुण्य मिलता है और कन्यादान महादान है.

इस बार जब छत्तीसगढ़ में चौथा लॉकडाउन था तब सर्वाधिक शादियां अक्षय तृतीया (26 अप्रैल2020) को हुई. गुड्‌डे-गुड़ियों के खेल भी हुए लेकिन इससे अधिक शादियां हुई.

गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के समाज कार्य विभाग की एचओडी प्रतिभा जे. मिश्रा कहती हैं “लॉकडाउन में परिवारों के आय की साधन सीमित हुई और अपने सिर से लड़की की शादी का बोझ उतारने के लिए भी लोगों ने अपनी नाबालिग लड़कियों की शादी कर दी पर लड़कों की नहीं की. दरअसल पढ़े लिखे लोग जरूरी नहीं कि समझदार हों और लड़के-लड़की को समान मानते हो. ऐसे लोग दिमागी तौर पर अभी भी रुढ़ीवादी है. लड़कियों को आज भी बोझ समझा जाता है और उसी का नतीजा है कि लॉकडाउन में शादियां हुईं .”

छत्तीसगढ़ और बाल विवाह

छत्तीसगढ़ में बाल विवाह कोई नई बात नहीं है. 2011 की जनगणना के विश्लेषण से यह बात सामने आई कि समाज में बाल विवाह की मानसिकता में बदलाव नहीं आया है. छत्तीसगढ़ में दो लाख तीन हजार 527 बालिका वधुएं हैं. इनमें से 22 हजार 728 बच्चियों की उम्र 14 साल से भी कम है.

प्रदेश में बाल विवाह का रुझान ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है. 10 से 19 वर्ष तक की आयु में शहरों में जहां 37 हजार 94 लड़कियों की शादी हुई, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा बढ़कर एक लाख 65 हजार 433 तक जा पहुंचा है.

आंकड़ों के मुताबिक 10 से 19 वर्ष तक आयु वर्ग की कुल आबादी 54 लाख 33 हजार 855 है. इनमें से पांच प्रतिशत मतलब दो लाख 60 हजार 601 लोग शादीशुदा हैं. इनमें से 57 हजार 74 पुरुष हैं और दो लाख तीन हजार 527 महिलाएं शामिल हैं.

दुर्भाग्यजनक यह कि इन लोगों में से 37 हजार 629 लोगों की शादी 10 से 14 साल की उम्र में हो गई.

बाल विवाह रोकने के दावे और हकीकत

अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के शोध में यह बात सामने आई थी कि छत्तीसगढ़ में हर साल साढ़े तीन से चार हजार बाल विवाह हो रहे हैं. वहीं बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने यह दावा किया था कि बाल विवाह की संख्या में कमी आई है.

सरकारी दावा ये है कि बाल चौपाल कार्यक्रम के माध्यम से लोगों में जागरुकता आई और आयोग के प्रयास, चाइल्डलाइन की सूचनाओं और महिला एवं बाल विकास विभाग और पुलिस की मदद से 2019 में एक साल के भीतर छत्तीसगढ़ में 350 से अधिक बाल विवाह रोके गए. प्रदेश में 2 हजार बाल मितान भी हैं जो बाल विवाह होने की सूचना आयोग के अधिकारी-कर्मचारियों को देते हैं लेकिन लॉकडाउन में यह सारा सिस्टम ठप्प पड़ा रहा.

बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष प्रभा दुबे कहती हैं “ वीडियो कांफ्रेसिंग के माध्यम से लगातार बाल विवाह पर नजर रखने के निर्देश दिए गए थे. सामाजिक जागरुकता की कमी बाल विवाह के पीछे बड़ी वजह है. बाल विवाह के बाद भी अगर सूचना मिलती है तब भी उसे अवैध घोषित कर कानूनी कार्रवाई की जाती है. इस बार बाल विवाह की सूचनाएं बहुत कम मिली. वैसे भी लॉकडाउन में बहुत कम शादियां हुई होंगी. पुलिस लॉकडाउन में व्यस्त रही और लॉकडाउन के कारण मैदानी स्तर पर जागरुकता लाने वाले कार्यक्रम नहीं कर सके.”

इधर महिला एवं बाल विकास विभाग की मंत्री अनिला भेड़िया लॉकडाउन में बाल विवाह होने से ही इनकार करती हैं. वे कहती हैं “ बाल विवाह नहीं हुए. मेरे संज्ञान में तो नहीं आए. बाल विवाह जितने रजिर्स्टड हुए, वे रोके गए होंगे.”

(लाडली मीडिया फेलोशिप के तहत किए गए अध्ययन पर आधारित रिपोर्ट)

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