कौड़ियों के भाव कोयला खदानों की नीलामी

आलोक शुक्ला | प्रियांशु गुप्ता: केंद्र सरकार की बहुचर्चित वाणिज्यिक कोयला खनन हेतु संपन्न हुई खदान नीलामी प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं. कोयला खनन की प्रक्रिया पर नज़र रखने वालों ने जैसी आशंका जताई थी, अंततः वही हुआ.

देश के कोयला मंत्री प्रह्लाद जोशी ने दावा किया कि वाणिज्यिक खनन के लिए कोयला खानों की नीलामी में जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा देखने को मिली है. जोशी का कहना है कि जिन 19 ब्लॉकों की नीलामी की गई है, उनसे सालाना 7,000 करोड़ रुपये का राजस्व मिल सकता है. उनका कहना है कि इन ब्लॉकों का परिचालन शुरू होने के बाद इनसे 69,000 से अधिक रोजगार के अवसर पैदा होंगे.


प्रह्लाद जोशी के अनुसार इन ब्लॉकों की अधिकतम सामूहिक क्षमता 5.1 करोड़ टन सालाना की है. इस लिहाज से इन 19 खानों से सालाना करीब 7,000 करोड़ रुपये का राजस्व मिल सकता है. लेकिन जोशी के दावे से हकीकत अलग है.

हकीकत तो ये है कि कोरोना काल में गैर-प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया होने के कारण सभी खदानों पर बहुत कम बोली लगाई गई. जिसके फलस्वरूप चुनिंदा निजी कंपनियों को भारी मुनाफा मिला. वहीं दूसरी ओर इसका सीधा नुकसान राज्य सरकारों को होगा क्योंकि बोली रकम में कटौती से राजस्व में कमी आना तय है.

1585 की बोली रद्द, वही खदान 350 में आवंटित

जून माह में विस्तृत प्रचार-प्रसार में केंद्र सरकार ने दावा किया था कि कोयला खदान नीलामी आत्मनिर्भर भारत और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की ओर एक क्रांतिकारी कदम है. परंतु खदान नीलामी के नतीजों से स्पष्ट हो गया है कि यह दावा गलत साबित हुआ है और माना जा रहा है कि इससे अर्थव्यवस्था को फायदा होने के बजाय दीर्घकालीन नुकसान उठाना पडेगा.

जिन 38 खदानों के लिये बोलियां आमंत्रित की गईं, उनमें से केवल आधे यानी 19 खदानों पर ही न्यूनतम बोलीदार सामने आए, जिसके कारण बाकी खदानों की नीलामी प्रक्रिया को रद्द करना पड़ा.

गौरतलब है कि इस बार नियमों को लचीला बनाने हेतु न्यूनतम बोलीदारों की संख्या मात्र 2 रखी गई थी, जो पिछली नीलामी प्रक्रिया से भी कम है. ऐसे में आधी खदानों में न्यूनतम बोलीदार ना मिल पाना पूरी प्रक्रिया पर ही, विशेष रूप से कोरोना काल के इसके समय पर, एक सवालिया निशान है.

यदि नीलामी की बोली- दरों पर नज़र डालें तो साफ है कि बाकी की 19 खदानों को बेहद कम कीमत पर दे दिया गया है. अधिकांश खदानों के लिये बोली अनुसार केवल 10-30% आय का हिस्सा ही राज्य सरकारों को दिया जायेगा जो कि पिछली नीलामी की दर तथा कोयले के वास्तविक मूल्य से बहुत कम है.

उदाहरण के लिये छत्तीसगढ़ के गारे-पेल्मा 4/1 खदान को ही लें. इस खदान को जिंदल कम्पनी ने 350 रु प्रति टन (25% Revenue share) से भी कम दर पर हासिल किया है. वहीं जब 2015 में पहले चरण की नीलामी हुई तब गारे-पेल्मा क्षेत्र की सभी खदानों पर लगभग 1000-3000 रु प्रति टन की बोलियां लगी थीं.

2015 में गारे-पेल्मा 4/1 के लिये ही बाल्को ने 1585 रु प्रति टन की बोली लगाई थी, जिसे कोयला मंत्रालय ने यह कह कर खारिज कर दिया था कि यह बहुत कम है. वहीं ताजा नीलामी में उससे एक-चौथाई से भी कम दर पर उस खदान को आवंटित कर केंद्र सरकार नीलामी की सफलता का दावा कर रही है.

नीलामी की विफलता का कारण ?

नीलामी प्रक्रिया के विफलताओं के अनेक कारण हैं. पहला तो ये कि देश में इतने पैमाने पर कोयले की ज़रूरत ही नहीं है. CEA, कोल इंडिया लिमिटेड vision-2030 तथा अन्य विश्लेषकों ने कई अवसरों पर देश के सामने इस तथ्य को रखा है.

गौरतलब है कि 2015 के बाद आवंटित 72 में से सिर्फ 20 खदानें ही चालू हो पाई हैं जबकि 50 से अधिक खदानें अभी तक खनन शुरु नहीं कर पाई हैं. यदि ये खदानें शुरु हुई तो लगभग 320 मिलियन टन का उत्पादन बढ‌ जायेगा, जो कि भारत की वर्तमान कोयला ज़रूरतों से बहुत ज़्यादा है.

नीलामी की विफलता का दूसरा बड़ा कारण ये है कि कोयला क्षेत्र की अधिकांश कंपनियाँ या तो दिवालिया हो चुकी हैं या आर्थिक संकट से जूझ रही हैं. वहीं विदेशी कंपनियों ने भी कोरोना के समय में कोई रुचि नहीं दिखायी. ऐसे में बोलीदारों का अभाव रहा, जिसके कारण केवल 4 खदानों को ही 5 से अधिक बोलियां मिलीं, जबकि कुल 10 खदानों के लिये ही 3 से अधिक बोलियां लगाई गई.

तीसरा बड़ा कारण ये रहा कि नीलामी में रखी ज़्यादातर खदानों के पास पर्यावरण तथा वन स्वीकृतियाँ नहीं थीं, जिससे बोली लगाने वालों को अधिक जोखिम उठाना पड़ रहा था.

नीलामी की विफलता का एक कारण यह भी था कि सरकार ने MDO के जरिये चुनिन्दा कंपनियों के लिए पिछले दरवाज़े का रास्ता खोला था, जिसमें जोखिम कम और मुनाफा अधिक था.

एक कारण ये भी हुआ कि कोविड के इस संकट में जब विश्व की अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुजर रही हो, कॉरपोरेट अपने लिये पैकेज की मांग कर रहे हैं, उस स्थिति में नीलामी के सफल होने की उम्मीद वैसे भी कम ही थी, इसी कारण झारखंड समेत कई राज्यों ने इसे स्थगित करने की पहले ही मांग की थी.

किसको फायदा, किसका नुकसान?

जब पिछली बार कोयला खदानों की नीलामी हुई, तब कहा गया था कि राज्य सरकारों को फायदा होगा और लगभग 3.35 लाख करोड़ की बोली-दर आधारित राजस्व प्राप्ति होगी. परंतु आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार 2020 मार्च तक केवल 8.36 हज़ार करोड़ ही मिल पाये क्योंकि जब खदान चालू ही नहीं हैं तो राजस्व कैसे आएगा?

दूसरी ओर आवंट्न प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के दावे भी सही साबित नहीं हुए क्योंकि 90% से अधिक खनिज सम्पदा का आवंट्न MDO के माध्यम से चुनिंदा कारपोरेट घरानों को ही दिये गये. इस नीलामी में भी ऐसा ही हुआ, जहाँ कुछ निजी कंपनियों ने केंद्र सरकार की मदद से कोरोना के आपदा को अवसर में बदलकर कौड़ी के भाव पर बहुमूल्य राष्ट्रीय सम्पदा को हासिल कर लिया है.

गारे-पेल्मा 4/1 में कम बोली मिलने का सीधा नुकसान छत्तीसगढ़ राज्य सरकार को ही होगा क्योंकि इन खदानों से अब बहुत कम राजस्व प्राप्ति होगी. वहीं दूसरी ओर सबसे ज़्यादा दुष्प्रभाव खदान क्षेत्रों के पर्यावरण तथा आदिवासी समुदायों के विस्थापन पर पड़ेंगे.

छत्तीसगढ़ के इस खदान की बात करें तो ग्राम सभाएं अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग कर लगातार खनन का विरोध करती आई हैं और पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में जन-विरोध को दरकिनार कर की गई यह नीलामी प्रक्रिया कई कानूनी सवालों के घेरे में है.

ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि छत्तीसगढ़ राज्य सरकार इस पर क्या रुख होता है. क्या वह छत्तीसगढ़ राज्य तथा यहां के गरीब-आदिवासी समुदाय के हक में आवाज़ उठायेगी या फिर वह भी कारपोरेट घरानों और केंद्र सरकार के सामने अपने घुटने टेक देगी?

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