दो नेताओं की कहानी

क्या हमें वाकई इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी की तुलना करनी चाहिए? कई बार कुछ शख्सियत इतिहास में बदलाव के वाहक बनते हैं. लेकिन ये बदलाव इतिहास के क्रम की वजह से अधिक होते हैं. अभी चर्चा इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी की तुलना पर चल रही है. 19 नवंबर, 2017 को इंदिरा गांधी की जन्म शताब्दी थी. इसी परिप्रेक्ष्य में यह चर्चा चल रही है. इस बहस में कुछ टिप्पणीकार दोनों के बीच तुलना कर रहे हैं तो कुछ ऐसी किसी तुलना को खारिज कर रहे हैं. यह सच है कि गांधी और मोदी दो बिल्कुल अलग शख्सियत हैं. उनकी नीतियां और प्राथमिकताएं अलग हैं. उनकी ऐतिहासिक स्थितियां भी अलग हैं. लेकिन कुछ समानताएं भी हैं. इसलिए दोनों का एक आकलन प्रासंगिक है.

दोनों में प्रमुख अंतर तो यही है कि दोनों अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में खड़े हुए. इंदिरा गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उन्हें अपने पिता से मिली विरासत थी. किसी भी क्षेत्र या अपनी पार्टी में उनका कोई अपना आधार नहीं था. उन्हें सिंडिकेट ने यह सोचकर चुना था कि उन्हें आसानी से प्रभावित किया जा सकता है. किसी ‘इंदिरा लहर’ ने उन्हें सत्ता में नहीं लाया था. बाद में उन्होंने इंदिरा लहर पैदा की थी. इसलिए सत्ता में आने के बाद इंदिरा के लिए शुरुआती साल मुश्किल थे. इसके उलट मोदी लोकप्रियता की लहर पर सवार होकर प्रधानमंत्री बने. गुजरात में वे बेहद मजबूत थे. पार्टी के पुराने लोगों को उन्होंने बेअसर कर दिया था. मोदी ने शून्य से शुरुआत की थी. समय के साथ दोनों ने प्रधानमंत्री पद को संप्रभुता का प्रतीक बना दिया.


राजनीति में कहावत है कि कमजोर नेता संकट की घड़ी में निर्णय लेते हैं और मजबूत नेता संकट पैदा करते हैं. इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी दोनों संकट पैदा करने वाले नेताओं की श्रेणी के हैं. इंदिरा ने यह रूप अख्तियार करने में थोड़ा वक्त लगाया था. उन्होंने शुरुआत में रुपये के अवमूल्यन का जो निर्णय लिया था, उसकी परिस्थितियां उनके हाथ में नहीं थीं. लेकिन बाद में उन्होंने कई संकट पैदा किए. चाहे वह राष्ट्रपति चुनाव हो, बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो, रजवाड़ों के विशेषाधिकारों को खत्म करना हो या फिर आपातकाल की घोषणा हो. कांग्रेस पार्टी को तोड़ना, संसदीय चुनाव और विधानसभा चुनावों के तारतम्य को तोड़ना, उच्चतम न्यायालय के निर्णयों को पलटना और मूल अधिकारों को निलंबित करना भी उनके संकट पैदा करने वाले निर्णय कहा जा सकता है. इनमें किसी कदम को वे अतिवादी नहीं मानती थीं. इसके उलट मोदी को खुला मैदान मिला. दशकों से जो स्वायत्त संस्थाएं खड़ी हुईं, उन्हें नेस्तनाबूद करके संकट में ढकेल दिया गया. सरकारी विश्वविद्यालयों से लेकर रिजर्व बैक तक की स्वायत्ता में दखल दिया गया.

नीतियों के मामले में ये दोनों प्रधानमंत्री काफी अलग हैं. इंदिरा गांधी की नीतियां समाजवाद से प्रभावित थीं. आपातकाल को छोड़कर कोई गरीब विरोधी फैसला उन्होंने नहीं किया. उनके कुछ निर्णयों से तो अभिजात्य वर्ग आहत भी हुआ. मोदी की नीतियां लोकलुभावन हैं. नोटबंदी और जीएसटी के उनके फैसले से गरीब सबसे अधिक प्रभावित हुए. इसे राष्ट्र के लिए बलिदान कहा गया. जबकि इनका सबसे अधिक फायदा अमीरों को मिला. कुछ लोग इसे यूरोप के फासीवाद की तुलना में हिंदू राजाओं की शासन प्रणाली से अधिक प्रभावित बताते हैं.

दोनों की नीतियों के अंतर को प्रतिभाओं की उपलब्धता में फर्क से भी जोड़कर देखा जाता है. इंदिरा गांधी को अपनी कैबिनेट पर कोई खास भरोसा नहीं था. लेकिन उन्होंने अपने आसपास कुछ टेक्नोक्रेट सलाहकार के तौर पर रखे हुए थे. इनमें अधिकांश पुरुष थे और इनकी सत्यनिष्ठा सवालों से परे थी. मोदी के पास प्रतिभाओं का संकट है. अमित शाह चुनाव जीत सकते हैं लेकिन इंदिरा के लिए जो भूमिका पीएन हक्सर की थी और जवाहरलाल नेहरू के लिए वीके कृष्ण मेनन और पीसी महालनोबिस की थी, वह भूमिका वे मोदी के लिए नहीं निभा सकते.

संघ परिवार में ज्ञान के प्रति अरुचि भी इस प्रतिभा संकट के लिए जिम्मेदार है. एक ऐसे माहौल में समझदार लोग नहीं आ सकते जहां तार्किक सोच के लिए जगह नहीं हो. इंदिरा गांधी पर यह आरोप लगता था कि उन्होंने विचारधारा की राजनीति को धता बता दिया है. इसके बावजूद कांग्रेस प्रतिभाओं को आकर्षित करती थी. लेकिन भारतीय जनता पार्टी का काडर आधारित होना बाहरी बौद्धिक लोगों का प्रवेश मुश्किल कर देता है. क्योंकि राजनीतिक प्रगति के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आशीर्वाद जरूरी होता है. इसके लिए संघ की गैरतार्किकता और अन्य चीजों में कुछ शुरुआती प्रशिक्षण अनिवार्य है.

दोनों नेताओं में सबसे बड़ा अंतर इनकी शख्सियत और राजनीतिक प्रशिक्षण में है. इंदिरा की विरासत का प्रतिनिधित्व मोदी शख्सियत का प्रभाव विकसित करके और नियमों की अनदेखी करके करना चाहते हैं. लेकिन इंदिरा गांधी की आक्रामकता पर अंकुश लगाने का काम उदारवादी माहौल में हासिल की गई उनकी शिक्षा करती थी. उनका राजनीतिक प्रशिक्षण भी ऐसा था जो उन्हें पूर्णतः निरंकुश होने से रोकता था. इसलिए आपातकाल की घोषणा करने में भी उन्होंने संवैधानिक प्रावधानों का इस्तेमाल किया. लेकिन मोदी की शख्सियत और उनके राजनीतिक प्रशिक्षण को देखते हुए इसकी उम्मीद कम है कि जरूरत पड़ने पर वे संवैधानिक प्रावधानों की फिक्र करेंगे. भारत को मौजूदा समय में अधिक चिंतित होने की जरूरत है.
1960 से प्रकाशित इकॉनामिक एंड पॉलिटिकल विकली के नये अंक के संपादकीय का अनुवाद

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