इस कांग्रेस पार्टी के भरोसे…

कनक तिवारी

बिहार के और कई उपचुनावों के मद्देनजर कांग्रेस पार्टी की दुर्दशा पर बहुत से एकेडमिक लेख सोशल मीडिया पर और अन्यथा आ गए हैं. उनमें से कुछ देख रहा हूं. अधिकांश लोग कांग्रेस पार्टी के सदस्य नहीं रहे हैं. वे बाहर से इन सब चीजों को देखते रहे हैं. आज भी वही कर रहे हैं. अलबत्ता उनके कुछ कांग्रेस नेताओं से नजदीकी संबंध रहे होंगे. इससे इनकार नहीं किया जा सकता.


वे बहुत सी ऐसी बातें कह रहे हैं. मसलन कॉन्ग्रेस को नेता ठीक से चुनना चाहिए. सड़कों पर आना चाहिए. संगठन मजबूत करना चाहिए. युवकों का खास तौर से ध्यान रखना चाहिए. और भी ऐसे बहुत से काम हैं. अपना नैरेटिव बदल लेना चाहिए. और कुछ नई तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसमें आधे अंग्रेजी के शब्द होते हैं.

मैं तो कांग्रेस में तीस बरस रहा हूं. पार्टी पदाधिकारी रहा हूं. चुनाव प्रचार किए हैं. कई किलो धूल खा गया होऊंगा. छोटा-मोटा कार्यकर्ता रहा हूं लेकिन लोगों से संपर्क में रहा हूं. जो सुझाव दे रहे हैं. उन्हें बुनियादी बातों की तरफ भी अपना ज्ञान कांग्रेस को देना चाहिए.

मनमोहन सिंह की अगुवाई में प्रधानमंत्री नरसिंह राव के कार्यकाल के समय से वैश्वीकरण का दौर आया और कांग्रेस ने स्वागत किया. उदारवाद के नाम पर उधारवाद आया.

अमेरिका के सामने उसकी मातहती मंजूर की. परमाणु नीति तक को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी को कांग्रेस से किनाराकशी करनी पड़ी. उस बिंदु से कांग्रेस कमजोर होना शुरू हुई. कांग्रेस एक जमाने से राजनीतिक पार्टी नहीं जन आंदोलन रही है.

डॉ मनमोहन सिंह की अगुवाई में उसे अर्थशास्त्रियों का जमावड़ा बना दिया गया. यह कांग्रेस के पतन का एक और कारण है.

कुछ नेहरू की और उससे ज्यादा इंदिरा गांधी की आर्थिक नीतियों को 360 अंश के कोण पर परिवर्तित कर दिया गया. कांग्रेस ने पगडंडी तैयार की. अब मोदी जी का अश्वमेध का घोड़ा उस पर दौड़ रहा है. इस पर बात किए बिना बात बनेगी नहीं. सारी नीतियां भारत की सुरक्षा सहित अमेरिका की झोली में डाल दी हैं मौजूदा सरकार ने.

कांग्रेस पार्टी में बड़े-बड़े वकील हैं. जब बड़े-बड़े उद्योगपति टाटा, एस्सार, अडानी, अंबानी, वेदांता आदिवासियों की हजारों एकड़ जमीन हड़पते हैं. तब इन कंपनियों के वकील कौन होते हैं. कभी कांग्रेस ने देखा है?

भयानक हादसा हुआ था भोपाल में यूनियन कार्बाईड की गैस ट्रेजेडी का. उसमें कौन-कौन से वकील थे यूनियन कार्बाईड और उसकी सहयोगी कंपनियों के दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के कर्णधार?

आज भी अडानी अंबानी और तमाम लोग जहां भूमियां हड़प रहे हैं. और जहां जहां कांग्रेस की सरकारें हैं. वे सरकारें कौन से एमओयू दस्तखत कर रही है. लोगों को पता भी है? आदिवासियों के धार्मिक विश्वासों की आस्थाओं की सांस्कृतिक और कलात्मक उपलब्धियों की किस तरह हत्या की जा रही है! किसी को पता है? किस तरह अवैध धन की उगाही कौन कर रहा है?

रेत के ठेके शराब के ठेके तरह-तरह के भूमि घोटाले कौन कर रहा है ? जहां कांग्रेस की सरकारें हैं. वहां भी उतना ही लोकतंत्र है, जितना भारत में नरेंद्र मोदी ने मचाया है. इन पर सब पर ध्यान दिए बिना केवल लीपापोती करने से संगठन बदल जाए? कैसे मजबूत होगा ?

संगठन के बड़े नेताओं को राष्ट्रीय स्तर तक पसीने की दुर्गंध आती है. इत्र फुलेल की सुगंध के बिना जी नहीं सकते. उनसे आप संगठन चलाने की उम्मीद करते हैं? कैसे होगा? कितने कांग्रेस कार्यकर्ताओं बल्कि नेताओं के पास जवाहरलाल नेहरू का साहित्य होगा?

इंदिरा गांधी की पब्लिक सेक्टर की नीति को राष्ट्रीयकरण की नीति को किसने बर्बाद किया है? और उसके समर्थन में कौन खड़ा है? आपके पास अगर आर्थिक विचार नहीं हैं. आपके पास गरीब आदमी के लिए करुणा नहीं है. आप अगर किसानों के संबंध में उनके साथ खड़े नहीं होना चाहते सहयोगी बनाकर अपना. केवल वोट बैंक के लिए नहीं. तो कैसे पुनरुद्धार होगा आपका?

कांग्रेस के ताजा घोषणा पत्र और भाजपा के ताजा घोषणा पत्रों को एक साथ मिलाकर बुद्धिजीवी देखें. कांग्रेस कौन सी दिशा देश को देना चाहती है. देखें तो आप लोग कि जवाहरलाल नेहरू के समय से लेकर अब मौजूदा वक्त तक कांग्रेस में समाजवाद का खात्मा उसके कांग्रेस अध्यक्षों के भाषण में वर्ष दर वर्ष कैसे नीचे गिरता गया है? उसके बिना भी कांग्रेस को मजबूती मिल जाएगी?

आपकी जो सेकुलरिज्म की नीति है. आप उस पर दोबारा देखना नहीं चाहते. आपको हिंदू देवी देवताओं से बहुत परेशानी हो गयी लेकिन हिंदुत्व के पीछे पीछे चलने का झंडा उठाकर चलने का नया खेल कैसे पैदा हो गया ? राम वन गमन योजना बनाकर, हनुमान मंदिर बनाकर, जनेऊ पहन कर आप किसको मजबूत कर रहे हैं ?

इन दोनों के बीच कहीं महात्मा गांधी दिखाई देते हैं आपको? 150 वां जन्मवर्ष चला गया जैसे कोई मातम मनाया गया. फिर भी कांग्रेस को जीतना है. कई कांग्रेस विधायक और मंत्री कैमरे पर पकड़े गए. उन्हें गांधी की पुण्यतिथि और जन्म तिथि तक मालूम नहीं थी.

अभिव्यक्ति की आजादी पर और असहमति पर आप की सरकारें भी उतना ही प्रतिबंध लगा रही हैं, जितना केंद्र की सरकार लगाती है. जिन प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारें बची हैं चलिए वहां से शुरू करिए. जो आप देश में चाहते हैं प्रधानमंत्री से, अपने राज्यों में कर के दिखाइए तो. केवल राहुल गांधी के बल पर कांग्रेस कब तक चलेगी. उनकी साफगोई के सामने और उनके साथ कितने कांग्रेसी बड़े नेता खड़े हैं हिसाब तो दीजिए.

दिल से चाहता हूं कि पार्टी मजबूत बने. बुद्धिजीवी मिलकर उसको बना दें. अच्छा रहेगा. आज प्रधानमंत्री और भाजपा को सब संवैधानिक संस्थाएं कुचलने के बाद भी अंतिम संस्था सुप्रीम कोर्ट की ओर से ऑक्सीजन मिल रही है. कांग्रेस इस पर भी ध्यान दे रही है क्या.

मैं राजनीति में नहीं हूं. किसी पॉलिटिकल पार्टी में नहीं हूं. लेकिन एक आजाद ख्याल नागरिक होने के नाते लोकतंत्र के प्रति मन में समर्थन होने के नाते यह मेरा फर्ज है कि मैं इस देश में किसी एक पार्टी की हुकूमत को तानाशाही में तब्दील होने से रोक सकूं. तो एक टिटहरी की तरह आसमान को पैरों पर उठाने की कोशिश क्यों नहीं करूं!

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