साजिश के नाम पर भय का भ्रम

मोदी की हत्या की साजिश की बात भारतीय जनता पार्टी के लिए राजनीतिक तौर पर अनुकूल है. पांच महीने तक टाल-मटोल करने के बाद 6 जून, 2018 को पुणे पुलिस ने भीमा कोरेगांव मामले में मुंबई, नागपुर और दिल्ली में कई गिरफ्तारियां कीं. पांच आरोपी सुधीर धवले, सुरेंद्र गडलिंग, शोमा सेन, महेश राउत और रोना विल्सन को गिरफ्तार किया गया. पांचों मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और उन्हें एलगार परिषद से संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार किए गया. पुलिस के मुताबिक इसी संस्था ने भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़कायी थी. पुलिस ने यह भी दावा कि ये ‘शहरी माओवादी’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने की साजिश रच रहे थे. गिरफ्तारी का वक्त, जिन्हें निशाना बनाया गया है और जिस तरह की बातें आ रही हैं, उससे यही लगता है कि भारतीय जनता पार्टी एक तीर से कई निशाना करना चाहती है.

केंद्र में और महाराष्ट्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार अपने कार्यकाल के सबसे मुश्किल दौर में है. ऐसे में इस मुद्दे को जिंदा करके इसे पीछे करने की कोशिश की जा रही है. इस साल की शुरुआत में भीमा कोरेगांव में हिंसा हुई थी और इसके बाद पूरे प्रदेश में दलितों ने प्रदर्शन किए. दलितों के खिलाफ अत्याचार के कानून पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद पूरे देश में दलितों ने प्रदर्शन किया. इससे लगा कि भाजपा से दलितों को मोहभंग पूरा हो गया है.


भाजपा के हालिया हमले के निशाने पर नागरिक अधिकारों की मांग करने वाले कार्यकर्ता, विपक्षी राजनीति दल और दलितों में उपजा गुस्सा है. वामपंथी छात्र संगठनों की बदनामी की कोशिश के बाद भाजपा अब वामपंथी सामाजिक संगठनों को बदनाम करना चाहती है. क्योंकि यह भाजपा का मुखर विरोधी है. पांच लोगों में से चार का तो भीमा कोरेगांव की घटना से कोई संबंध तक नहीं है. साजिश की चिट्ठी को सामने लाया गया और विपक्षी दलों पर भाजपा ने यह आरोप लगाया कि वह माओवादियों का इस्तेमाल सरकार के खिलाफ कर रही है.

वित्त मंत्री ने तो ‘अर्द्ध माओवादी’ का सिद्धांत भी गढ़ दिया जो सामाजिक कार्यकर्ता के वेश में भूमिगत माओवादियों के लिए काम करते हैं. इन गिरफ्तारियों के जरिए दलित और अंबेडकरवादी बुद्धिजीवियों को भी डराने की कोशिश की गई है ताकि वे सरकार के खिलाफ किसी अभियान का नेतृत्व नहीं करें.

भाजपा की यह रणनीति नई नहीं है. 2006 में महाराष्ट्र के खैरलांजी में एक दलित परिवार के बलात्कार और हत्या के वक्त से यह रणनीति चल रही है. दलितों के आंदोलनों को बदनाम उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों का अवमूल्यन करना है. उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद तो यही लगता है कि दलितों को न्यायिक प्रक्रिया और सार्वजनिक प्रदर्शनों से भी न्याय नहीं मिलने वाला.

भीमा कोरेगांव भाजपा के लिए एक निर्णायक घटना थी. एलगार परिषद ने भाजपा शासन को ‘नई पेशवाई’ का नाम दिया था. इसके जरिए निचली जातियों को हिंदुत्ववादी ताकतों के खिलाफ एकजुट किया जाता. महाराष्ट्र में इस तरह के आंदोलनों का इतिहास रहा है. इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी इसका असर पड़ता और इसकी आंच दूसरे राज्यों तक भी पहुंचती.

भीमा कोरेगांव के बाद सरकार ने भले ही आग शांत करने की कोशिश की लेकिन इस घटना ने अंबेडकरवादी संगठनों को एकजुट करके उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्र में ला दिया. उस घटना के लिए दलितों को जिम्मेदार ठहराकर सरकार हिंसा भड़काने वाले हिंदुत्ववादी समूहों को बचा रही है. पिछले दो महीने में शंभाजी भीडे और मिलिंक एकबोटे की इस मामले में हुई गिरफ्तारी के विरोध में मुंबई और कोल्हापुर में बड़ी रैलियां हुई हैं. ऐसे में इस आंदोलन को राष्ट्र विरोधी ठहराकर आंदोलन को कमजोर करने और दलितों के गुस्से को भटकाने की कोशिश की जा रही है.

मुख्यधारा की मीडिया ने इस मुद्दे को चाहे जितना भी उछाला हो लेकिन ‘मोदी की हत्या की साजिश’ से उतनी सहानुभूति नहीं मिली जितने की उम्मीद भाजपा को थी. शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने इन गिरफ्तारियों का विरोध किया है. मोदी जब भी मुश्किल में होते हैं तो इस तरह का मुद्दा उठाया जाता है. जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी ऐसा होता था. भाजपा साजिश के नाम पर जिस तरह से भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही है और प्रधानमंत्री के कसरत के वीडियो के प्रचार-प्रसार में लगी है, उससे उसकी बेचैनी दिखती है. इससे यह भी पता चलता है कि कैसे अभी की भाजपा एक व्यक्ति की पार्टी बनकर रह गई है.
1966 से प्रकाशित इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली के नये अंक का संपादकीय

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