संविधान को हिंदी में लाने वाला छत्तीसगढ़िया

रायपुर | संवाददाता: देश के संविधान को हिंदी में पहुंचाने वाली समिति का अध्यक्ष छत्तीसगढ़ के घनश्याम सिंह गुप्त को बनाया गया था. आज हिंदी में संविधान की उपलब्धता का बड़ा श्रेय घनश्याम सिंह गुप्त को जाता है. उनकी अध्यक्षता वाली समिति ने ही संविधान का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया था.

अंग्रेज़ी शासनकाल में घनश्याम सिंह गुप्त 14 सालों तक सेंट्रल प्रोविंस व बरार विधानसभा के अध्यक्ष भी रहे. संविधान सभा के सदस्य घनश्याम सिंह गुप्त की ख्याति एक आर्यसमाजी की भी थी, जिसने स्त्री शिक्षा और छूआछूत को मिटाने के लिये अपनी पूरी ज़िंदगी लगा दी.


भारत में 9 दिसम्बर, 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक हुई. उसी दिन श्री रघुनाथ विष्णु धूलेकर ने आग्रह किया कि संविधान सभा की कार्यवाही हिन्दी में होनी चाहिए.

इसके बाद 1947 में प्रथम अनुवाद समिति बनी. इसमें घनश्याम सिंह गुप्त को शामिल किया गया. श्री गुप्त के अलावा पं. कमलापति त्रिपाठी, डा. रघुवीर, श्री हरिभाऊ उपाध्याय, डा. नगेंन्द्र, श्री बालकृष्ण इस समिति में थे.

15 मार्च 1949 को दूसरी अनुवाद समिति में घनश्याम सिंह गुप्त को अध्यक्ष बनाया गया. इस समिति में भाषाविद और बाद में बंगाल विधान परिषद के अध्यक्ष बने डा. सुनीति कुमार चटर्जी, हिंदी के विद्वान लेखक और इतिहासकार राहुल सांकृत्यायन जैसे लोग शामिल थे. इसके अलावा इतिहासकार पं. जयचंद्र विद्यालंकर, भाषाविद् मोटुरी सत्यनारायण, मराठी कोशकार यशवंत रामकृष्ण दाते, न्या. डबल्यू. आर. पुराणिक, प्रो. मुजीब, बालकृष्ण इस समिति में रखे गये थे. 24 जनवरी, 1950 को संविधान की हिन्दी की प्रति पर 282 हस्ताक्षर है, जबकि अंग्रेजी प्रति पर 278.

मंगलवार 24 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान सभा की कार्रवाई पुस्तिका बताती है कि भारतीय संविधान सभा की बैठक सुबह 11 बजे शुरु हुई और कुछ सवाल जवाब औऱ वक्तव्य के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा-मैं श्री घनश्याम सिंह गुप्त से निवेदन करता हूं कि वे हिंदी अनुवाद को मुझे दें ताकि उसे रस्मी तौर पर सभा के समक्ष रखूं और उनका प्रमाणीकरण कर दूं.

इसके बाद घनश्याम सिंह गुप्त ने अध्यक्ष को हिंदी अनुवाद की प्रतियां सौंपी और अध्यक्ष ने उन पर अपने हस्ताक्षर किये.

जीवन यात्रा

22 दिसंबर 1885 में दुर्ग में जन्मे घनश्याम सिंह गुप्त की आरंभिक शिक्षा दुर्ग और रायपुर में हुई. जबलपुर के राबर्ट्सन कॉलेज से उन्होंने विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की. जिसके लिये उन्हें स्वर्ण पदक प्रदान किया गया.

इसके बाद स्नातकोत्तर और क़ानून की पढ़ाई उन्होंने इलाहाबाद से की. 1908 में पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्होंने कुछ समय तक गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक के रुप में उन्होंने अपनी सेवायें दीं. लेकिन उनका मन वहां नहीं लगा और दो साल के भीतर वे दुर्ग लौट आये. यहां उन्होंने वकालत शुरु की.

इसी दौरान वे आज़ादी की लड़ाई से जुड़े और पंडित जवाहरलाल नेहरु और दूसरे नेताओं से संपर्क में आये.

पढ़ाई कर वापस लौटने के बाद वे राजनीति में सक्रिय हुये. उन्होंने गांधी से प्रभावित हो कर सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया और दो बार उन्हें जेल जाना पड़ा.

उनके अनुरोध पर महात्मा गांधी और पं. जवाहरलाल नेहरु ने दुर्ग की यात्रा की.

1923 और 1927 में वे सेंट्रल प्रोविंस एंड बरार विधानसभा के सदस्य चुने गये. 1930 में सेंट्रल असेंबली के चुनाव में उन्होंने डॉक्टर हरिसिंह गौर को हराया और दिल्ली पहुंचे. इसके बाद 1937 में वे फिर से सेंट्रल प्रोविंस एंड बरार विधानसभा के सदस्य चुने गये और इन्हें विधानसभा का अध्यक्ष भी चुना गया.

वे आजीवन स्त्री शिक्षा और समाज सुधार के काम से जुड़े रहे. उनका निधन 13 जून 1976 को हुआ.

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