नोटबंदी: कहीं लेने के देने न पड़े

नई दिल्ली | समाचार डेस्क: नोटबंदी को कालेधन के खिलाफ बड़ा कदम बताया जा रहा है. भाजपा के समर्थक इसे मोदी सरकार के क्रांतिकारी कदम के रूप में प्रचारित कर रही है. नोटबंदी को लागू करने के बाद जो हकीकत सामने आ रही है कहीं उससे भाजपा को राजनीतिक तौर पर लेने के देने न पड़ जाये. गौरतलब है कि कुछ माह बाद उत्तरप्रदेश व पंजाब में विधानसभा चुना होने हैं. जिसमें इसे मोदी सरकार के काले धन पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के रूप में पेश किया जाना है.

*देश में करीब 90 फीसदी लेनदेन नगद में होता है. नोटबंदी के कारण नगदी की समस्या से जनता के साथ-साथ बाजार भी ठंडा हो गया है.


*भारत में जीडीपी का 12 फीसदी हिस्सा नगद के रूप में है. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि अर्थव्यवस्था के कितने बड़ा हिस्सा मौजूदा नगदी की कमी से प्रभावित हो रहा है.

*बाजार में मौजूद नगदी का 85 फीसदी हिस्सा 500 और 1000 रुपये के नोट के रूप में था. जो अवैध घोषित हो गया है. केवल 14 तारीख तक इससे सरकारी भुगतान किया जा सकता है.

*तमाम दावों के बावजूद बैंक तथा एटीएम में जरूरत के मुताबिक नगदी नहीं है. इससे जाहिर होता है कि नोटबंदी का फैसलाजमीनी हकीकत को नजरअंदाज करके लिये गया है.

*बड़ी मुश्किल से यदि नया 2000 रुपये का नोट हासिल भी कर लिया जाये तो नये 500 रुपये के नोट के अभाव में बाजार से खरीददारी कैसे की जा सकती है. अभी भी चिल्हर की समस्या सामने आ रही है.

*तमाम दावे के बावजूद 50 फीसदी आबादी के पास बैंक अकाउंट नहीं है. कईयों के पास किसी तरह का पहचान-पत्र नहीं है. इस तरह से पासबुक और पहचान-पत्र न होने पर किसी को आर्थिक रूप से पंगु बनाये जाने का क्या परिणाम होगा.

*नोटबंदी से कालाधन बंद हो जायेगा यह दावा पूरी तरह से सही नहीं है. बड़े कारोबारी तथा धन्ना सेठ महंगे धातु तथा प्रापर्टी के रूप में भी काला धन रखे हुये हैं जिस पर नोटबंदी का कोई असर नहीं पड़ने वाला है.

*रसूखदार, उच्च मध्यम वर्ग और कुछ हद तक मध्यम मध्यम वर्ग उधार में सामान की खरीददारी कर ले रहा है. लेकिन निम्न मध्यम वर्ग तथा गरीबों को कौन उधारी में सामान देगा. इस तरह से एक बड़ी आबादी कुछ दिनों के लिये अपनी जरूरत के सामान से मरहूम हो गई है.

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