बाज़ारवाद के युग का नया चीन

जे के कर
पिछले करीब तीन माह से चल रहे डोकलाम विवाद को हल कर लिया गया है.भारत तथा चीन की सेनायें डोकलाम में आमने-सामने आ गई तथा दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया था. बीबीसी के अनुसार सोमवार को भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि दोनों देश डोकलाम से सेना हटाने को तैयार हो गये हैं. हालांकि चीनी मीडिया यह दावा कर रहा है कि वापसी भारतीय सेना की हुई है, चीन तो अपनी ज़मीन से एक कदम पीछे नहीं हटा है. वैसे स्थिति जो भी हो, चीन के साथ युद्ध करने के लिये लालायित दोनों देशों के ‘राष्ट्रवादी तबकों’ को इससे निराशा ही हाथ लगी होगी. यह दिगर बात है कि युद्ध होता तो इसमें दोनों तरफ के सैनिक मारे जाते ‘राष्ट्रवादी’ नहीं.

वैसे पहले से ही माना जा रहा था कि चीन अब हमला नहीं करेगा, इसका कारण है कि आज का चीन माओ जे दुंग का चीन नहीं तेंग, शियाओ पिंग का चीन है.


चीन में आज भी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन चलता है लेकिन वहां निजी संपत्ति बनाने की छूट दी गई है तथा बाज़ार अर्थव्यवस्था को अपना लिया गया है. चीन तमाम तरह के पैंतरे जरूर कर लेता है परन्तु उसका उद्देश्य दुनिया के बाज़ार पर अपनी पहुंच बढ़ाने पर ज्यादा है. चीन द्वारा बनाये जा रहे ‘वन बेल्ट वन रोड’ (न्यू सिल्क रूट) का मकसद भी यही है. शीत युद्ध के समय रूस ने अमरीका को चुनौती दी थी लेकिन आज चीन बड़ी शांति से अमरीका के बाज़ार को हड़प रहा है बिना एक बूंद भी खून गिराये या बहाये.

चीन के इतिहास पर नज़र डाले तो पता चलता है कि साल 2011 में राष्ट्रपति हू जिंताओ और प्रधानमंत्री वेन जिआबाओ के बाद यूं तो उपराष्ट्रपति ज़ी जिंगपिंग और उप प्रधानमंत्री ली केकियांग का नाम आ रहा था परन्तु चुंग चिंग शहर के पार्टी सचिव बॉ शी लाई को भी प्रतिदव्ंदी के तौर पर देखा जा रहा था.

माना जा रहा था कि बॉ शी लाई चीन में माओ की विचारधारा के अनुसार बदलाव कर सकते हैं तथा तेंग शियाओ पिंग के बाज़ारवाद की जगह फिर से पुरानी व्यवस्था लाने वाले हैं. लेकिन साल 2012 में चीन के 18वीं पार्टी कॉंग्रेस के पहले बॉ शी लाई को ठिकाने लगा दिया गया. उसी से तय हो गया था कि चीन की कोशिश किसी के साथ सीमा तनाव बढ़ाने की जगह उस देश में अपने माल बेचने की ज्यादा रहने वाली है.

वैसे भी जिस देश के बाज़ार पर चीन का कब्जा हो उस देश से युद्ध छेड़ना कम से कम तेंग शियाओ पिंग के उत्तराधिकारी तो नहीं करने वाले हैं. रही बात चीनी सेना की तो न तो उसमें अब जनरल चू तेह के समान सेना नायक है और न ही वे माओ की ‘लाल किताब’ को अपना बाइबल या गीता मानते हैं. आज का चीन तेंग शियाओ पिंग के विचारधारा के अनुरूप चल रहा है जोकि ली शाओ ची द्वारा परिभाषित ‘सच्चे कम्युनिस्टों’ की पैरवी करते हैं.

उल्लेखनीय है कि ली शाओ ची की मशहूर किताब ‘सच्चे कम्युनिस्ट कैसे बने’ में माओ के समय के राज्य के ‘सर्वहारा अधिनायकत्व’ वाले चरित्र की पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया था. अब चीन का नारा ‘सत्ता का जन्म बंदूक की नाल से होता है’ के बजाये ज्यादा से ज्यादा देशों के बाज़ार पर कब्जा करने की है. कुल मिलाकर चीन की योजना दुनिया का सबसे बड़ा सौदागर बनने की है न कि सैन्य विवाद में उलझने की है. दुनिया का इतिहास गवाह है कि सेना का उपयोग उसी समय किया जाता है जब और कोई विकल्प संभव न हो. याद रखे कि दुनिया में हुये दोनों विश्वयुद्ध दुनिया के बाज़ार को पुनः बाट लेने के लिये ही हुये थे.

वैसे देखा जाये तो डोकलाम से अलग भारत के बाज़ार के एक बड़े हिस्से पर चीन ने अपना कब्जा जमा लिया है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत आज चीन से सबसे ज्यादा आयात करता है. भारत प्रति साल चीन से अपने कुल आयात का करीब 15 फीसदी आयात करता है. इतना ही नहीं चीन से भारत में भारी मात्रा में निवेश हो रहा है. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामलें में भारत की चीन पर निर्भरता लगातार बढ़ती ही जा रही है. चीन तेजी के साथ भारत में निवेश करता जा रहा है. साल साल 2011 में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने वाले देशों में चीन का स्थान 35वां था जो साल 2014 में 28वां हो गया. इसके बाद साल 2016 में भारत में निवेश करने वाले देशों में चीन 17वें नंबर पर आ गया.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि साल 2014 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने घोषणा की थी कि भारत में चीन अगले 5 सालों में 20 बिलियन डालर का निवेश करेगा. यह दिगर बात है कि चीन इन 5 सालों में विदेशों में 750 बिलियन डालर का निवेश करने वाला है.

दूसरी तरफ भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के बूते पर देश की अर्थव्यवस्था के विकास की नीति पर चलने वालों के लिये चीन से बढ़ते निवेश को नज़रअंदाज करना आसान न होगा. भारत सरकार के औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग के आकलन के अऩुसार अप्रैल 2000 से लेकर दिसंबर 2016 केबीच चीन से भारत में कुल 1.6 बिलियन अमरीकी डालर का निवेश आया है.

हालांकि भारतीय व्यापार जगत का मानना है कि यह निवेश 2 बिलियन अमरीकी डालर के बराबर का हुआ है. लेकिन जानकारों का मानना है कि चीन से भारत में इस दरम्यान 4.07 बिलियन अमरीकी डालर का निवेश हुआ है. उनका कहना है कि चीन, हांगकांग के माध्यम से भारत में ज्यादा निवेश करता है. जबकि भारत ने चीन में महज 650 मिलियन अमरीकी डालर का निवेश किया है.

आइये अब चीन के साथ भारत के विदेश व्यापार पर भी एक नज़र डाल लेते हैं. भारत से चीन को साल 2016-17 में 6,841,753.05 लाख रुपये का सामान निर्यात किया गया जो भारत के कुल निर्यात का 3.6936 फीसदी था. उसी तरह से साल 2017-18 में अप्रैल से मई माह तक 1,097,850.28 लाख रुपयों के सामान का निर्यात किया जा चुका है जो भारत के कुल निर्यात का 3.5186 फीसदी है. जहां तक भारत से निर्यात की बात है तो साल 2016-17 में अमरीका को 28,380,653.22 लाख रुपयों का सामान का निर्यात किया जो 15.3215 फीसदी के बराबर है.

संयुक्त अरब अमीरात को 20,981,260.53 लाख रुपयों का सामान निर्यात किया जो 11.3269 फीसदी का रहा है. उसी तरह से इंग्लैंड को 5,738,698.28 लाख रुपये के सामान का निर्यात किया गया जो 3.0981 फीसदी के बराबर का होता है. इसके अलावा विएतनाम को 4,570,235.94 लाख रुपयों के सामान का निर्यात किया गया जो 2.4673 फीसदी का है. हांगकांग को इसी दरम्यान 9,485,500.26 लाख रुपयों के सामान का निर्यात किया गया जो 5.1208 फीसदी का रहा है. सिंगापुर को 6,414,404.15 लाख रुपयों के सामान का निर्यात किया गया जो कुल निर्यात का 3.4629 फीसदी है.

भारत कुल 234 देशों को सामान का निर्यात किया जाता है. जिसमें से आस्ट्रेलिया को करीब 1 फीसदी, बांग्लादेश को 2.4 फीसदी, बेल्जियम को 2 फीसदी, फ्रांस को 1.7 फीसदी, जर्मनी को 2.6 फीसदी, इंडोनेशिया को 1.2 फीसदी, इसरायल को 1.1 फीसदी, इटली को 1.7 फीसदी, जापान को 1.3 फीसदी, दक्षिण कोरिया को 1.5 फीसदी, मलेशिया को 1.8 फीसदी, मेक्सिको को 1.2 फीसदी, नेपाल को 1.9 फीसदी, नीदरलैंड को 1.8 फीसदी, सऊदी अरब को 1.8 फीसदी, साउथ अफ्रीका को 1.2 फीसदी, स्पेन को 1.2 फीसदी, श्रीलंका को 1.4 फीसदी, थाईलैंड को 1.1 फीसदी तथा टर्की को 1.6 फीसदी का निर्यात किया जाता है.

केन्द्र सरकार के वाणिज्य विभाग द्वारा जारी इन आंकड़ों से जाहिर है कि यदि चीन को निर्यात करना बंद करना पड़ा तो भारत के व्यापार को कोई खास फर्क नहीं पड़ सकता है. लेकिन आयात के आंकड़ें इससे उलट कहानी बयां कर रहें हैं.भारत में साल 2016-17 के दौरान चीन से 41,112,449.69 लाख रुपयों के सामान का आयात किया गया जो कुल आयात का 15.9510 फीसदी का रहा है. इसी तरह से चालू साल 2017-18 में अप्रैल-मई के दरम्यान 7,632,848.26 लाख रुपये के सामान का आयात किया गया जो 15.5978 फीसदी का है.

चीन के अलावा सऊदी अरब से 13,376,327.32 लाख रुपयों के सामान का आयात किया गया जो 5.1898 फीसदी का होता है. इसी तरह से स्विटजरलैंड से 11,561,928.81 लाख रुपये का अर्थात् 4.4859 फीसदी का, संयुक्त अरब अमीरात से 14,415,876.29 लाख रुपयों के सामान का याने 5.5931 फीसदी का, अमरीका से 14,989,794.21 लाख रुपयों के सामान का याने 5.8158 फीसदी का आयात किया गया. भारत 223 देशों से सामान का आयात करता है.

इसके अलावा आस्ट्रेलिया से 2.9 फीसदी, बेल्जियम से 1.7 फीसदी, ब्राजील से 1 फीसदी, कानाडा से 1 फीसदी, फ्रांस से 1.4 फीसदी, जर्मनी से 3 फीसदी, हांगकांग से 2.1 फीसदी, ईरान से 2.7 फीसदी, इराक से 3 फीसदी, जापान से 2.5 फीसदी, दक्षिण कोरिया से 3.2 फीसदी, कुवैत से 1.1 फीसदी, मलेशिया से 2.3 फीसदी, नाइजेरिया से 1.9 फीसदी, कतर से 1.9 फीसदी, रूस से 1.4 फीसदी, सिंगापुर से 1.8 फीसदी, साउथ अफ्रीका से 1.5 फीसदी, स्विटजरलैंड से 4.4 फीसदी, थाईलैंड से 1.4 फीसदी तथा वेनेजुएला से 1.4 फीसदी का आयात किया जाता है.

जहां तक व्यापार संतुलन की बात है भारत-चीन के बीच होने वाले आयात-निर्यात में भारत को सबसे ज्यादा घाटा होता है. साल 2016-17 में भारत ने चीन को 68,417.53 करोड़ रुपयों के सामान का निर्यात किया वहीं चीन से भारत में 411,124.50 करोड़ रुपयों का सामान आया. इस तरह से चीन की तुलना में भारत को -342,706.97 करोड़ रुपयों का घाटा हुआ है. आंकड़ों को देखकर ऐसा आभास होता है कि चीन से आयात कम या बंद कर देने से भारत को फायदा ही होगा चीन को नहीं. केवल एक अपवाद को छोड़कर जो दवा का है.

खुद सरकारी आंकड़ें इस बात का समर्थन करते हैं कि दवा के क्षेत्र में भारत, चीन पर निर्भर है. भारत में जो दवा बनती हैं उनमें से करीब 65 फीसदी चीन से आयातित बल्कड्रग से बनती है. कुछ जीवनरक्षक दवाओं के मामलें में तो यह आंकड़ा करीब 80 फीसदी के बराबर का है. हालांकि पिछले साल भर से इस दिशा में कोशिश की जा रही है परन्तु स्थिति में अभी तक सुधार नहीं आया है. बहरहाल, बात आज के चीन की हो रही थी. जिसकी नज़र दुनिया के ज्यादा से ज्यादा देशों के बाज़ार पर कब्जा करने की है. अब चीन को जनरल चू तेह के बजाये किस्ट्रोफ़र कोलंबस की तलाश है जो उसके लिये नये-नये बाज़ार खोज निकाले जैसे कभी अमरीका को खोज निकाला गया था.

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