अफसोस कि वे हुए ही क्यों?

सुनील कुमार
अभी दो दिन पहले डॉ. बाबा साहब अंबेडकर की जन्मतिथि आई, तो अलग-अलग पार्टियों और अलग-अलग नेताओं ने उसे अपने-अपने हिसाब से इस्तेमाल किया. बौद्ध समाज के लोग अंबेडकर के अनुयायियों में सबसे अधिक हैं, और उनके लिए भी यह दिन गौरव का एक दिन रहता है, और उन पर होती ज्यादतियों के खिलाफ यह दिन प्रतिरोध की एकजुटता का भी रहता है. लेकिन इन सबसे परे जो कुछ बातें इस बरस चर्चा में आईं उनमें से एक यह कि राजस्थान में इस मौके पर अंबेडकर प्रतिमा को सार्वजनिक रूप से बाल्टी भर दूध से नहलाया गया.

दूध से किसी प्रतिमा को नहलाने का एक मतलब यह भी होता है कि उतने दूध को बर्बाद करना. और फिर यह स्विटजरलैंड तो है नहीं जहां पर कि दूध इतना अधिक होता है कि उसे चॉकलेट बनाकर, मक्खन बनाकर पूरी दुनिया में बेचना पड़े, यह तो वह देश है जिसमें दसियों करोड़ बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, और जहां के बच्चों को दूध-मक्खन महज कृष्ण की कहानियों में नसीब होता है. ऐसे में दलित गरीबों के मसीहा अंबेडकर की प्रतिमा को दूध से धोना उसी हिन्दू-रिवाज का एक सिलसिला है जिसके कि खिलाफ अंबेडकर ने बगावत की, और दलितों को उस हिन्दू धर्म से बाहर निकालकर बौद्ध बनाया, और सम्मान की, समानता की एक जिंदगी दिलवाई.


लेकिन यह अकेला ऐसा मामला नहीं है जिसमें रीति-रिवाज इस तरह हावी हो जाते हों. एक पुरानी मिसाल कबीर की है जिन्होंने हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों के ढकोसलों के खिलाफ एक दमदार बगावत की, सारे पाखंडों को चकनाचूर करने का साहस दिखाया, और उसके बाद आज उन्हीं के नाम का मूर्तिकरण करके, उनको उपासना का केन्द्र बनाकर, उनको सजाकर-बिठाकर एक ऐसा सिलसिला खड़ा कर दिया गया है जिसके खिलाफ कबीर हमेशा रहे.

कुछ ऐसा ही हाल गांधी का किया गया, और गांधी के नाम पर पलने वाले, गांधी के नाम की खाने वाले कांग्रेसियों ने भ्रष्टाचार के नए रिकॉर्ड कायम किए, गांधी की सादगी को घूरे पर फेंक दिया, और गांधी के नामलेवा भी बने रहे. गांधी से सबसे दूर जाने वाले ऐसे कांग्रेसियों ने गांधी की प्रतिमाएं तो खूब बनवा दीं, लेकिन गांधी की इज्जत घटा दी. जिन लोगों ने गांधी के काम को नहीं जाना है, और जो लोग ऐसी ही गांधी-संतानों को देखकर गांधी के बारे में अंदाज लगाते हैं, उनकी नजर में गांधी की इज्जत जरूरत से बहुत कम रह गई है. लेकिन गांधी के साथ यह ज्यादती महज कांग्रेसियों ने नहीं की है, उन लोगों ने भी की है जो कि गांधी के हत्यारों के हमकदम रहे, हमख्याल रहे, और हमदर्द रहे. उन लोगों ने भी मौके की नजाकत को देखते हुए अपनी दीवारों पर गांधी को टांग लिया, गांधी का नाम लिया, और इससे जितना फायदा पा सकते थे, उतना फायदा पा लिया, पा रहे हैं.

कुछ ऐसा ही भगत सिंह के साथ किया गया, उसकी शहादत, उसकी बहादुरी, उसकी समझ, और उसकी इंसानियत इन सबको कुचलकर उसके ऊपर उसकी प्रतिमाएं जगह-जगह खड़ी कर दी गईं, और भगत सिंह की बातों को सोच-समझकर साजिश के तहत खत्म करने की कोशिश की गई. भगत सिंह ने अपने आपको जिंदगी भर एक नास्तिक कहा, एक नास्तिक की जिंदगी जीते रहे, और जमकर लिखा कि वे नास्तिक क्यों हैं. लेकिन आज उनकी प्रतिमा पर अंग्रेजी टोपी लगे, या कि सिक्ख पगड़ी लगे, इसे लेकर शास्त्रार्थ चलता है, बहस होती है, और उन लोगों के बीच होती है, जिनको भगत सिंह के सिद्धांतों और उनके मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है. दूसरी तरफ यह भी होता है कि जिस शहर में मैं रहता हूं, वहां पर जब भगत सिंह की याद में जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर कोई सार्वजनिक कार्यक्रम होता है तो सड़क किनारे या चौराहे पर होते हुए कार्यक्रम में भी अधिकतर लोग सिक्ख ही रहते हैं, बाकी लोगों को मानो हिन्दुस्तान की आजादी अब तक मिली नहीं है, और उन्हें भगत सिंह की शहादत से कोई फायदा हुआ नहीं है. जो राजनीतिक दल भगत सिंह के घोषित वामपंथ के ठीक खिलाफ हैं, वे राजनीतिक दल भी भगत सिंह की शोहरत को दुहने में जुट गए, और अब तो साम्प्रदायिक ताकतें भी मानो भगत सिंह की सबसे बड़ी भक्त हो गई हैं.

कुछ ऐसा ही अंबेडकर के साथ हो रहा है जिनकी याद में महाराष्ट्र के विदर्भ में हर गांव, हर मुहल्ले में अंबेडकर की प्रतिमाएं दिखती हैं, और कई जगह तो उनके मंदिर भी दिखते हैं. मंदिरों की जिस सोच के खिलाफ अंबेडकर ने हिन्दू समाज के भीतर बगावत की, उन्हीं मंदिरों के ढांचे बनाकर अंबेडकर को बिठा दिया जा रहा है, उनकी प्रतिमाओं को बनाकर मानो इस बात को काफी मान लिया जा रहा है कि अंबेडकर के संघर्ष का पूरा सम्मान हो गया. और अब रही-सही कसर पूरी करने के लिए उनकी प्रतिमाओं को दूध से धोया जा रहा है, और हो सकता है कि अधिक वक्त न लगे कि आसपास तुलसी और गंगाजल का इस्तेमाल भी होने लगे.

जिन लोगों को शिर्डी के सांई बाबा की जिंदगी की थोड़ी जानकारी, वे भी जानते हैं कि सांई बाबा हिन्दू थे या मुस्लिम थे यह भी किसी को नहीं पता था, और वे जिंदगी भर किसी पेड़ के नीचे या किसी सार्वजनिक जगह पर पड़े रहे. लेकिन आज शिर्डी में उनके साथ यह हुआ कि उनकी प्रतिमा से लेकर वहां की उपासना तक, इन सबका इस कदर हिन्दूकरण कर दिया गया है कि वहां पहुंचकर किसी दूसरे धर्म के लोगों को असुविधा लगने लगे. और न सिर्फ शिर्डी में, देश भर में भी जगह-जगह उनके मंदिर बनाए गए, जो अपने आपमें एक हिन्दू प्रतीक हैं, भीतर उनकी प्रतिमा बनाई गई, जो कि जाहिर तौर पर इस्लाम के तहत बुतपरस्ती में आती है, और भीतर आरती, माला, दिया, और इस तरह के दूसरे हिन्दू प्रतीकों से उन्हें घेर दिया गया. हिन्दू और मुस्लिम एकता का एक बड़ा प्रतीक धीरे-धीरे एक भगवाकरण का कैदी होते चले गया, और हो सकता है कि कुछ अरसे बाद मुस्लिमों को यह लगने लगे कि सांई बाबा तो हिन्दुओं के ही थे.

आज जरा देर के लिए यह सोचें कि अगर कबीर, गांधी, भगत सिंह, अंबेडकर, या कि सांई बाबा कहीं पर होंगे, और वे उनकी आज इस्तेमाल हो रही स्मृतियों के बारे में सोचेंगे, तो हक्का-बक्का रह जाएंगे कि वे कहां फंस गए हैं. इनमें से हर कोई अपने आज के भक्तों के घेरे से निकलकर भागने को उतारू दिखेंगे, और शायद यह अफसोस भी करने लगेंगे कि वे हुए ही क्यों?

* लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शाम के अखबार छत्तीसगढ़ के संपादक हैं.

One thought on “अफसोस कि वे हुए ही क्यों?

  • April 23, 2017 at 12:34
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    Helle
    Sir aapka shikyakrmi wala article bahut acha laga uske liye thanks
    Aage bhi aap aise hi news dete rahiyega

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