महंगाई को लेकर रिजर्व बैंक के कठोर रुख की जड़ें

चालू वित्त वर्ष की दूसरी मौद्रिक नीति में भी रिजर्व बैंक नेसरकार की मांग को खारिज करते हुए ब्याज दरों में कोई कमी नहीं की. अगर ऐसा होता तो बैंकों के ब्याज दर कम होते और अर्थव्यवस्था में तेजी आती. मुख्य आर्थिक सलाहकार को यह समझना चाहिए कि रिजर्व बैंक महंगाई को ध्यान में रखकर जिस अड़ियल तरीके से मौद्रिक नीति पर चल रही है, उसकी जड़ें सरकार की आर्थिक नीतियों में ही हैं. सच्चाई यह भी है कि जिस तरह की स्वायत्ता अभी रिजर्व बैंक की ओर से दिखाई जा रही है, वैसी स्वायत्ता नोटबंदी और अन्य प्रशासनिक मसलों पर नहीं दिखा.

पिछले दो दशक में रिजर्व बैंक की छवि यह बनी है कि वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ के स्थिरता कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करती रही है. रिजर्व बैंक और आईएमएफ द्वारा साझा तौर पर तैयार किए गए एक पेपर से यह बात सामने आती है कि महंगाई को लक्ष्य बनाकर काम करने की पूरी रूपरेखा क्या होगी. महंगाई दर को लक्षित करने की सिफारिश उर्जित पटेल समिति ने की थी. उस वक्त वे आरबीआई के गवर्नर नहीं थे. इस समिति ने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को आधार बनाकर चार फीसदी महंगाई दर को लक्ष्य बनाने की सिफारिश की थी. इसमें दो फीसदी कमी और दो फीसदी अधिकता के दायरे का भी जिक्र किया गया था. इस लक्ष्य को कानूनी तौर पर रिजर्व बैंक के लिए सरकार ने फरवरी, 2015 में एक सहमति पत्र पर दस्तखत करके बाध्यकारी बना दिया.


मौद्रिक नीति का पहला लक्ष्य यह था कि कीमतों में स्थिरता बनी रहे. इसके लिए रिजर्व बैंक को एक लक्ष्य चाहिए था. सरकार ने आरबीआई कानून में संशोधन करके महंगाई दर के एक लक्ष्य को अधिसूचित कर लिया और यह लक्ष्य मार्च, 2021 तक प्रभावी रहेगा. अगर महंगाई तय दायरे में नहीं रहती तो रिजर्व बैंक को इसकी वजहें बतानी होंगी और कैसे कम समय में इसे काबू में किया जाएगा, इसके उपाय भी बताने होंगे. इससे ऐसा लगता है कि जैसे सिर्फ महंगाई सिर्फ मौद्रिक नीति पर ही निर्भर हो.

यही वह तलवार है जो रिजर्व बैंक के सर पर लटक रही है. उसे हर हाल में महंगाई दर को काबू में रखना है. यह भी सच है कि यह तलवार आरबीआई ने अपनी पहल पर ही अपने सिर पर लटकवाई है. कुछ दूसरे देशों के उदाहरण के आधार पर आरबीआई ने यह नीति अपना ली. कहीं-कहीं यह प्रयोग सफल भी हुआ है. लेकिन मोटे तौर पर यही बात सामने आई है कि महंगाई दर काबू में तो आई लेकिन उत्पादन, रोजगार और सामाजिक कल्याण की कीमत पर.

भारत में जब यह नीति अपनाई जा रही थी तो रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनरों ने इसका विरोध किया था. इनका कहना था कि बाकी बातों को नजरंदाज करके सिर्फ महंगाई दर को लक्षित करना ठीक नहीं होगा. इन लोगों ने यह भी कहा कि भारत में महंगाई पर सिर्फ मौद्रिक नीति का नहीं बल्कि आपूर्ति तंत्र और विकास को लेकर चलाए जा रहे कार्यक्रमों को भी असर होता है. मौद्रिक नीति की एक और समस्या यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की जटिलता इसके संकेतों का व्यापक प्रसार नहीं होने देती.

आपूर्ति के पक्ष के महत्व को एक आंकड़े के जरिए समझते हैं. मार्च, 2007 से मार्च, 2017 के बीच उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में 117 फीसदी की तेजी आई. इसमें 53 फीसदी योगदान खाद्य सूचकांक का है. इस अवधिक में खाद्य सूचकांक में 131 फीसदी तेजी आई जबकि गैर खाद्य सूचकांक में 104 फीसदी. थोक मूल्य सूचकांक में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में 108 फीसदी की तेजी दिखती है जबकि गैर खाद्य वस्तुओं में यह तेजी आधी है. खाद्य सामग्री का दायरा बढ़ा है. बाजरा, फल और सब्जियों की खपत बढ़ी है. इनकी कीमतों में तेजी से दूसरी वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ता है और इससे महंगाई बढ़ती है. लेकिन यह दूसरे चरण की स्थिति है. इसे आधार बनाकर महंगाई विरोधी नीति के जरिए विकास प्रक्रिया को रोकना ठीक नहीं है.

सिर्फ महंगाई दर को लक्ष्य बनाकर मौद्रिक नीति बनाना किताबी अधिक और व्यवहारिक व गहराई वाला कम लगता है. खुद आरबीआई के कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि कई संकेतकों को लक्ष्य बनाकर काम करने का प्रयोग सफल रहा है. इससे जीडीपी की गति बनी रही है, महंगाई नियंत्रण में रही है और थोक मूल्य सूचकांक का उतार-चढ़ाव भी काबू में रहा है. इसमें अपवाद खुदरा मूल्य सूचकांक रहा है. इसमें काफी उतार-चढ़ाव दिखे हैं. इससे यह पता चलता है कि इसमें आपूर्ति प्रबंधन की बड़ी भूमिका है.

भारत के आर्थिक तंत्र की जटिलताओं को देखते हुए और इसकी सामाजिक व आर्थिक जरूरतों को देखते यह लगता है कि आरबीआई द्वारा पहले अपनाई जा रही कई संकेतकों को लक्ष्य करने वाली नीति मौद्रिक नीति के निर्धारण के लिए अधिक उपयोगी थी.
1966 से प्रकाशित इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली के नये अंक के संपादकीय का अनुवाद

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