कोयला खदान: सैकड़ों हाथियों पर मंडरा रहा है ख़तरा

रायपुर | आलोक पुतुल : छत्तीसगढ़ में बनने वाला हाथी अभयारण्य खटाई में पड़ता नज़र आ रहा है.राज्य सरकार ने हाथी अभयारण्य का दायरा केवल 450 वर्ग किलोमीटर करने की प्रक्रिया पर काम शुरु कर दिया है.

राज्य की कांग्रेस पार्टी की सरकार ने हाथी बहुल इलाकों में नये कोयला खदानों की नीलामी पर रोक लगाते हुए 3827 वर्ग किलोमीटर में हाथी अभयारण्य बनाने की बात कही थी. लेकिन राज्य सरकार अपनी घोषणा से पीछे हट गई है.


इसके अलावा लगभग दो साल पहले मंत्रीमंडल और वन्यजीव बोर्ड में 1995.48 वर्ग किलोमीटर में हाथी अभयारण्य बनाने के निर्णय को भी बदलने के लिए कार्रवाई शुरु कर दी गई है.

जिस इलाके में हाथी अभयारण्य बनाने की घोषणा की गई थी, वह घने जंगलों वाला इलाका है. इनमें मांड रायगढ़ प्रक्षेत्र के 90 कोयला खदान और हसदेव-अरण्य प्रक्षेत्र के 23 कोयला खदान हैं.

अब राज्य सरकार ने, भारतीय जनता पार्टी के कार्यकाल में लिए गये फैसले के अनुसार, केवल 450 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में ही हाथी अभयारण्य बनाने की योजना पर काम शुरु किया है. इससे राज्य में नये-नये कोयला खदानों की नीलामी और आवंटन का काम निर्बाध रुप से जारी रह सकेगा.

अगर ऐसा हुआ तो कोयला खदानों के कारण हसदेव अरण्य के जंगल उजड़ने से सैकड़ों हाथियों का आशियाना छीन सकता है. बड़ी संख्या में यहां रहने वाले आदिवासियों और किसानों का विस्थापन तय है.

लेकिन मामला केवल इतना भर का नहीं है. छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य के जंगल जिस इलाके में हैं, वहां से कर्क रेखा गुजरती है और देश के तापमान नियंत्रण में इस जंगल की महत्वपूर्ण भूमिका है. अगर ये जंगल उजड़े तो भारत में इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा.

इस इलाके में कई कोयला खदानों को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों या राज्यों को आवंटित किया गया है लेकिन इनमें से अधिकांश खदानों को एमडीओ यानी माइन डेवलपर कम ऑपरेटर के तौर पर अडानी को सौंप दिया गया है.

विपक्ष में रहते हुए भूपेश बघेल इस इलाके में कोयला खनन के कट्टर विरोधी रहे हैं और अदानी का खुल कर विरोध करते रहे हैं. लेकिन अब तस्वीर बदली हुई है.


राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक राकेश चतुर्वेदी का कहना है कि विभागीय प्रस्ताव के अनुरूप हाथी रिज़र्व की सीमा 1995.48 वर्ग किलोमीटर से कम कर 450 वर्ग किलोमीटर किए जाने पर निर्णय के लिए प्रकरण मंत्री परिषद में रखने का फ़ैसला किया गया है. इस पर अंतिम निर्णय मंत्री परिषद ही करेगी.

राज्य सरकार ने इस फ़ैसले के पीछे सात स्थानीय विधायकों और राज्य के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के विरोध का हवाला दिया है. लेकिन दिलचस्प ये है कि इन सात में से पांच विधायकों के विधानसभा का कोई भी हिस्सा, प्रस्तावित हाथी अभयारण्य में शामिल ही नहीं है.

इसी तरह राज्य के पंचायत एवं स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने भी हाथी अभयारण्य के विरोध की बात को सिरे से ख़ारिज किया है.

टीएस सिंहदेव का कहना है कि हाथी रिजर्व का क्षेत्र 450 किलोमीटर तक सीमित करने की बात उन्होंने कभी नहीं कही है. यह पूर्णतः तथ्यविहिन और भ्रामक है.

सिंहदेव का कहना है कि 1995.48 वर्ग किलोमीटर के प्रस्तावित हाथी रिज़र्व में मेरे अंबिकापुर विधानसभा क्षेत्र का कोई भी गांव शामिल नहीं है. ऐसे में मेरे विरोध का कोई कारण नहीं है. मैं तो इस बात का भी समर्थक हूं कि यूपीए शासनकाल में इस पूरे इलाके को नो गो एरिया घोषित किया गया था, उस निर्णय को पुनः लागू किया जाये.

कोयला खदानों में फंसा हाथी अभयारण्य

छत्तीसगढ़ अलग राज्य बनने से पहले तक सरकार यही दावा करती थी कि यहां बिहार और ओडिशा के इलाके से हाथियों का आना-जाना होता है. राज्य में हाथी तब तक ‘प्रवासी’ घोषित थे. लेकिन बाद के दिनों में स्थितियों में बदलाव आया.

नवंबर 2000 में अलग राज्य बनने के बाद राज्य सरकार ने दस्तावेज़ों में भी स्वीकार करना शुरु किया कि छत्तीसगढ़ के जंगलों में, पिछले कई सौ सालों से हाथी स्थाई रूप से रहते आए हैं और अब भी सैकड़ों की संख्या में राज्य में हाथी हैं.

इसके बाद 2005 में छत्तीसगढ़ विधानसभा में पहली बार सर्वसम्मति से हाथी अभयारण्य बनाने के लिए अशासकीय संकल्प पारित किया गया.

इसके तहत बादलखोल-सेमरसोत अभयारण्य और तमोर-पिंगला अभयारण्य के कुछ इलाकों के साथ-साथ हसदेव अरण्य और धर्मजयगढ़ के 450 वर्ग किलोमीटर के इलाके में हाथी अभयारण्य बनाने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया. जिस पर केंद्र सरकार ने 2007 में अपनी मुहर लगा दी.

लेकिन इसी इलाके में कोयला खदानों के आवंटन के कारण राज्य सरकार ने 450 वर्ग किलोमीटर के इलाके में हाथी अभयारण्य बनाने के अपने ही फ़ैसले पर चुप्पी साध ली.

मामला यहां तक पहुंच गया कि कुछ वन अधिकारियों ने जब प्रस्तावित लेमरू हाथी अभयारण्य में कोयला खनन को लेकर आपत्ति दर्ज़ की तो उन्हें इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करने के निर्देश भी जारी किये गये.

20 जुलाई 2009 को राज्य के वन विभाग के सचिव की प्रधान मुख्य वन संरक्षक को लिखी गई एक चिट्ठी में जो कुछ लिखा गया, उससे यह बात और साफ होती है. इस चिट्ठी में कहा गया था-“बादलखोल, सेमरसोत एवं तमोरपिंगला अभयारण्यों में हाथी रिज़र्व बनाने का कार्य जारी रखा जाए एवं प्रदेश के अन्य किसी भी स्थान पर कोई नया हाथी रिज़र्व, सेंचुरी अथवा नेशनल पार्क न बनाया जाये. वर्तमान में जो नेशनल पार्क एवं अभयारण्य अस्तित्व में हैं, उन पर ही भली-भांति ध्यान देकर वन्य प्राणियों की सुरक्षा एवं विकास का कार्य किया जाये… वर्तमान में राज्य शासन अभी किसी नये क्षेत्र को अभयारण्य/हाथी रिज़र्व/ नेशनल पार्क बनाये जाने पर विचार नहीं कर रहा है.”

लेकिन बाद के दिनों में जयराम रमेश ने हस्तक्षेप किया और 2010 में कोल मंत्रालय और वन पर्यावरण मंत्रालय ने देश के नौ कोल प्रक्षेत्र के एक साझा अध्ययन के बाद हसदेव अरण्य के जंगलों की अति संपन्न जैव विविधता और पारिस्थितकी रुप से संवेदनशील स्थिति को देखते हुए इस पूरे इलाके को ‘नो-गो एरिया’ घोषित करते हुये यहां कोयला खनन नहीं करने निर्देश जारी किए. इसी तरह हसदेव-अरण्य से लगे हुए छत्तीसगढ़ के ही मांड-रायगढ़ कोल प्रक्षेत्र के 80 में से 48 कोल ब्लॉक को ‘नो गो एरिया’ में सूचीबद्ध कर दिया गया.

लेकिन कुछ ही दिनों में कोयला खनन की ज़रुरतों का हवाला देकर ‘नो गो’ पर सरकार के भीतर ही सवाल उठने लगे. इसके कुछ दिनों के बाद ही 53 प्रतिशत हिस्से को ‘नो गो एरिया’ से बाहर कर दिया गया. साल भर बाद ‘नो गो एरिया’ का हिस्सा 47 प्रतिशत से घटा कर 29 प्रतिशत कर दिया गया.

जून-जुलाई 2014 में इस इलाके के 11.99 प्रतिशत हिस्से को इनवायोलेट एरिया यानी निर्बाध क्षेत्र घोषित किया गया. अगस्त-सितंबर 2014 में 7.86 प्रतिशत, जुलाई-अगस्त 2015 में 11.43 प्रतिशत, नवंबर 2015 में 9.82 प्रतिशत और दिसंबर 2015 में इस इलाके का केवल 7 प्रतिशत हिस्सा ही निर्बाध क्षेत्र रह पाया. शेष इलाके को कोल खदानों के लिए खोल दिया गया.

राहुल गांधी और भूपेश बघेल का वादा

राज्य में विधानसभा चुनाव से पहले तक मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इस इलाके में आदिवासियों के साथ खड़े रहे. 15 जून 2015 को मदनपुर में कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी ने भी वादा किया कि अगर आदिवासी नहीं चाहेंगे और ग्रामसभा नहीं चाहेगी तो इस इलाके में कोयला खनन नहीं होने दिया जायेगा.

2018 में जब राज्य में सरकार बदली और इस इलाके में कोयला खदानों के ख़िलाफ़ आंदोलन कर चुके भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने हाथियों की बढ़ी हुई संख्या और पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से 15 अगस्त 2019 को, राज्य के 1995.48 वर्ग किलोमीटर इलाके में लेमरू हाथी अभयारण्य बनाने की घोषणा की और 27 अगस्त को मंत्रीमंडल ने इसकी मंज़ूरी भी दे दी. मंत्रीमंडल के इस फ़ैसले में कहा गया कि यह दुनिया में अपनी तरह का पहला हाथी अभयारण्य होगा, जहां हाथियों का स्थायी ठिकाना बन जाने से उनकी अन्य स्थानों पर आवाजाही तथा इससे होने वाले जान-माल के नुकसान पर अंकुश लगेगा.

2019 में 1995.48 वर्ग किलोमीटर इलाके में लेमरू हाथी अभयारण्य बनाये जाने की घोषणा के बाद पर्यावरण मामलों के जानकार और जल, जंगल, ज़मीन के मुद्दे पर काम करने वालों ने राज्य सरकार से अनुरोध किया कि हसदेव अरण्य और मांड रायगढ़ के जलग्रहण क्षेत्र में भी कोयला खनन की अनुमति नहीं देनी चाहिए और इसे भी लेमरू हाथी अभयारण्य में शामिल किया जाना चाहिए.

तर्क ये था कि हसदेव अरण्य और मांड रायगढ़ के जिन इलाकों को हाथी अभयारण्य में शामिल नहीं किया गया है, उन्हीं इलाकों में हाथियों का आवागमन और प्रवास अधिक है. इसके अलावा अगर इन इलाकों में खनन को मंजूरी दी गई तो इससे मिनी माता हसदेव बांगो बांध का जलस्तर प्रभावित होगा, जिससे प्रतिवर्ष 3,95,600 हेक्टेयर खेतों की सिंचाई का लक्ष्य रखा जाता है.

जिन इलाकों को हाथी अभयारण्य में शामिल करने की मांग की गई, उससे वन विभाग ने भी सहमति जताई. वन विभाग के दस्तावेज़ों के अनुसार हसदेव अरण्य के जिन 18 कोयला खदानों में खनन नहीं करने और उन्हें लेमरू हाथी अभयारण्य में शामिल करने का फ़ैसला लिया गया, उसमें परसा, केते-एक्सटेंशन, गिधमुड़ी-पतुरिया, तारा, पेंडराखी, पुटा परोगिया, मदनपुर उत्तर, मदनपुर दक्षिण, मोरगा-1, मोरगा-2, मोरगा-3, मोरगा-4, मोरगा दक्षिण, सैदू उत्तर व दक्षिण, नकिया-1-2-3, भकुर्मा मतरिंगा, लक्ष्मणगढ़ और सरमा कोयला खदान शामिल हैं.

इसके बाद राज्य सरकार ने आरंभिक तौर पर 1995.48 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के लेमरू हाथी अभयारण्य का क्षेत्रफल बढ़ा कर 3827 वर्ग किलोमीटर करने पर सहमति जताई और प्रस्तावित इलाकों में वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 36 (ए) के तहत ग्रामसभाओं में चर्चा शुरु की गई. हालांकि कई इलाकों में हाथी अभयारण्य को लेकर भ्रम की स्थिति बनी और विरोध के स्वर भी उभरे लेकिन राज्य सरकार ने अलग-अलग अवसरों पर स्पष्ट किया कि अभयारण्य क्षेत्र में रहने वाले लोगों के किसी भी तरह के अधिकार प्रभावित नहीं होंगे.

इन सब प्रक्रियाओं के बीच ही केंद्र सरकार ने प्रस्तावित इलाके में कोल खदानों की नीलामी की प्रक्रिया शुरु की तो राज्य के वन मंत्री मोहम्मद अकबर ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिख कर अपनी आपत्ति दर्ज़ कराई.

मोहम्मद अक़बर ने अपने पत्र में लिखा कि “…राज्य की दो महत्वपूर्ण नदियां हसदेव एवं मांड के जल ग्रहण क्षेत्र में भी कोल ब्लाकों की नीलामी प्रस्तावित है. हाल ही में छत्तीसगढ़ राज्य में हाथियों की संख्या में हो रही लगातार वृद्धि, मानव हाथी द्वंद की बढ़ती घटनाओं तथा हाथियों के रहवास की आवश्यकता को देखते हुए हसदेव नदी से लगे 1995 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को लेमरू हाथी रिजर्व घोषित करने का निर्णय लिया गया है, जिसके पालन में अधिसूचना प्रकाशन हेतु कार्यवाही प्रगति पर है…राज्य के वनों एवं पर्यावरण की सुरक्षा तथा भविष्य में मानव हाथी द्वंद की घटनाओं पर प्रभावशील नियंत्रण के लिए उक्त क्षेत्र में भविष्य में खनन गतिविधियों पर रोक अत्यंत आवश्यक है. भविष्य में होने वाली कोल ब्लाकों की नीलामी में इन क्षेत्रों में आने वाले कोल ब्लॉकों को पृथक किया जाना वन एवं पर्यावरण की सुरक्षा के दृष्किोण से उचित होगा.”

मोहम्मद अक़बर ने केंद्र से अनुरोध किया कि आगामी कोल ब्लाक नीलामी में हसदेव अरण्य एवं उससे सटे मांड नदी के जल ग्रहण क्षेत्र तथा प्रस्तावित हाथी अभयारण्य की सीमा में आने वाले क्षेत्रों में स्थित कोल ब्लाकों को शामिल न किया जाए. इसके बाद मोहम्मद अक़बर ने 1 जुलाई 2020 को एक और पत्र लिख कर अपनी मांग दुहराई.

इस पत्रों का असर भी हुआ और केंद्र सरकार ने 1 सितंबर 2020 को, प्रस्तावित लेमरू हाथी इलाके के पांच कोयला खदानों मोरगा-2, मोरगा दक्षिण, मदनपुर उत्तर, श्यांग और फतेपुर पूर्व को अपनी नीलामी की सूची से बाहर कर दिया. हालांकि नीलामी की नई सूची में लेमरू हाथी अभयारण्य से अलग, छत्तीसगढ़ की तीन नई कोयला खदानों डोलेसरा, जरेकेला और टंगरघाट को जोड़ लिया गया.

विरोध के बीच भूमि अधिग्रहण

इस साल 11 जनवरी को मदनपुर दक्षिण और 19 जनवरी को केते एक्सटेंशन कोयला खदान की नीलामी को लेकर राज्य के खनिज सचिव ने केंद्र सरकार के कोयला मंत्रालय के सचिव को पत्र लिख कर लेमरू हाथी अभयारण्य का हवाला देते हुए इनके आवंटन पर रोक लगाने की मांग की.

पत्र में राज्य के खनिज सचिव अंबलगन पी ने लिखा-“ हाथियों के संरक्षण, हाथी एवं मानव के बीच संघर्ष में हो रही वृद्धि को रोकने, क्षेत्र में अन्य जनधन की हानि को रोकने, पर्यावरणीय संतुलन को बनाये रखने, जल उपलब्धता के साथ प्रचुरता से विद्यमान जैव एवं वानस्पत्ति विविधता को संरक्षित करने के दृष्टिकोण से भविष्य में कोयला खदान आवंटन की प्रक्रिया से प्रस्तावित लेमरू हाथी अभयारण्य क्षेत्र लगभग 3827 वर्ग किलोमीटर को संरक्षित किये जाने हेतु केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक की भूमि को कोयला धारक क्षेत्र अर्जन और विकास अधिनियम 1957 की धारा-4 की उपधारा-1 के अंतर्गत कृत कार्यवाही एवं इस अधिनियम की अन्य धाराओं के तहत प्रस्तावित कार्यवाही पर राज्य शासन आपत्ति दर्ज करता है. अतः प्रकरण में आगामी कार्यवाहियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाये जाने का अनुरोध है.”

लेकिन इस बार बात नहीं बनी और केंद्र सरकार की कार्रवाई चलती रही. दिलचस्प ये है कि जिन कोयला खदानों में राज्य सरकार ने खनन नहीं करने का फ़ैसला किया था, उन्हीं खदानों में खनन के लिए केंद्र सरकार ने अब भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई शुरु कर दी.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला का कहना है कि खुद छत्तीसगढ़ सरकार भैयाथान के जिस बिजली परियोजना के लिए पतुरिया-गिधमुड़ी में कोयला खनन करना चाहती थी, वह परियोजना ही रद्द हो गई, इसके बाद भी कोयला खदान का आवंटन रद्द नहीं किया गया. परसा कोयला खदान को राजस्थान सरकार को आवंटित किया गया है, जिसके पास पहले से ही परसा केते बासन खदान है और जिसकी क्षमता को 50 फीसदी और बढ़ा दिया गया है.

इसी तरह कोरबा ज़िले के मदनपुर दक्षिण कोयला खदान, आंध्र प्रदेश सरकार को खुले बाज़ार में बेचने के लिए दिया जा रहा है. यानी कोयले का खनन किसी ज़रुरत के लिए नहीं, खुले बाज़ार में बेच कर मुनाफा कमाने के लिए किया जा रहा है और इसके लिए जल, जंगल, ज़मीन और आदिवासियों की जिंदगी दांव पर लगाई जा रही है.

हसदेव अरण्य का जंगल

पूरे देश में सर्वाधिक कोयला उत्पादन करने वाले छत्तीसगढ़ में 59907.76 मिलियन टन कोयला का भंडार है, जो देश में उपलब्ध कुल 326495.63 मिलियन टन कोयला भंडार का 18.34 फ़ीसदी के आसपास है.

राज्य के 12 कोयला प्रक्षेत्र के 184 कोयला खदानों में से, सर्वाधिक 90 कोल ब्लॉक मांड-रायगढ़ में और 23 कोल ब्लॉक हसदेव-अरण्य के जंगलों में हैं. 1,70,000 हेक्टेयर में फैले हसदेव अरण्य के जंगल को अति संपन्न जैव विविधता और पारिस्थितकी रुप से संवेदनशील इलाका माना जाता रहा है.

हाथियों का घर कहे जाने वाले हसदेव-अरण्य कोयला प्रक्षेत्र के कुल 1878 वर्ग किमी में से 1502 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा समृद्ध वन क्षेत्र है, जिसमें कई विलुप्त प्राय प्रजातियां पाई जाती हैं. अगर इस इलाके में कोयला खनन शुरु हुआ तो इन हाथियों और दूसरी प्रजातियों का जीवन ख़तरे में पड़ जाएगा.

दक्षिण सरगुजा वन विभाग की कार्ययोजना रिपोर्ट के अनुसार इस जंगल में महत्वपूर्ण वन्यजीवों के अलावा गंभीर रूप से लुप्तप्राय सर्पगंधा जैसी वनस्पतियों की दुर्लभ प्रजातियां, लुप्तप्राय बच सहित वनस्पतियों की कई दुर्लभ प्रजातियाँ, 21 प्रतिशत मुख्य रूप से औषधीय व वनोपज वाले पेड़, मछलियों की 29 प्रजातियाँ, सरीसृप की 14 प्रजातियाँ, पक्षियों की 111 प्रजातियाँ, स्तनधारियों की 34 प्रजातियाँ, औषधीय गुण की 51 प्रजातियाँ, पेड़-पौधों की 86 प्रजातियाँ, 38 तरह की झाड़ियां, 19 प्रजातियों की जड़ी-बूटियाँ, 17 प्रजाति की लताएं और घास की 12 प्रजातियाँ उपलब्ध हैं.

झारखंड के गुमला से छत्तीसगढ़ के कोरबा तक हाथियों के आवागमन का यह एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. महाराष्ट्र-मप्र के पेंच अभयारण्य, मप्र के कान्हा टाइगर रिज़र्व, छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व और झारखंड के पलामू टाइगर रिज़र्व तक फैले कॉरिडोर का यह बीच का हिस्सा है.

जब छत्तीसगढ़ के कोरबा, सरगुजा और रायगढ़ के हिस्से में एक-एक कर कोयला खदानों में उत्खनन शुरु हुआ तो हाथी और मानव संघर्ष की घटनाओं में भी वृद्धि होने लगी.

आज हालत ये है कि कोयला खदानों के कारण हाथियों का दल उत्पात मचाता हुआ राजधानी रायपुर और राज्य के दूसरे छोर पर स्थित बस्तर तक पहुंच रहा है.

अपना घर छीने जाने के कारण यहां से वहां भटकते हुए हाथियों के गुस्से का शिकार मनुष्य हो रहे हैं और इस संघर्ष में सैकड़ों लोग हाथियों के कारण मारे गये हैं. फसलें बर्बाद हो रही हैं, घर टूट रहे हैं. दूसरी ओर हाथियों को भी मारा जा रहा है. पिछले 20 सालों में सर्वाधिक हाथी पिछले साल मारे गये हैं.

अब जबकि हाथी अभयारण्य पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं तो माना जा रहा है कि कोयला बेच कर मुनाफ़ा कमाने के चक्कर में मनुष्य और हाथियों के बीच संघर्ष और बढ़ेगा. साथ ही भारत के तापमान में भी वृद्धि होगी. लेकिन फ़िलहाल तो हसदेव अरण्य के इलाके के आदिवासी अपनी अंतिम लड़ाई में अकेले नज़र आ रहे हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!