स्टेन स्वामी की लाश में कानून का मवाद

कनक तिवारी
मानवाधिकार कार्यकर्ता, ईमानदार नागरिक और नैतिक साहस के प्रवक्ता स्टेन स्वामी की न्यायिक प्रक्रिया के चलते दर्दनाक मौत आखिर हो ही गई. 84 वर्ष के स्टेन स्वामी पार्किन्सन और अन्य कई शारीरिक बीमारियों से गुजर रहे थे. उन्हें महीनों से जेल में निरोधित कर रखा गया था क्योंकि उनके खिलाफ बदनाम गैरकानूनी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम 1967 और राजद्रोह वगैरह की धाराएं लगाई गईं. और भी कुछ घटबढ़ पुलिस अपने हिसाब से इस तरह करती रहती है कि नागरिकों को क्या आरोपी तक को उसकी खबर नहीं दी जाती. यह मौत राष्ट्रीय शर्म का एक तकलीफदेह उदाहरण है.

वैचारिक मतभेद को कुचलने सरकार ने इतने क्रूर अधिनियम खुद बना लिए हैं कि नागरिक अपनी जुबान तक नहीं खोल सके. दस्तखत सरकार करती है और उनकी वैधता पर रबरस्टांपनुमा ठप्पे अदालतों में लगाए गए हैं. बहुत कम जज इंसाफ के इजलास में आए हैं जिन्होंने इतिहास गढ़ा है. स्टेन स्वामी की मौत ऐसे जजों का इस्तकबाल करने का अपवाद भरा मौका भी है.


संसद में कई बदनाम कानून बने, मिटे और बनते रहे हैं. MISA 1971, फिर पोटा और टाडा बने. अदालतों ने उन्हें वैध ठहराया. जनता के दबाव और दमदार विरोध की वजह से उन्हें हटाना पड़ा. अन्याय तो आजादी की दहलीज पर हो ही गया था.

अंगरेजी कोख का राजद्रोह का बदनाम कानून भारत की संविधान सभा ने निकालकर फेंक दिया था. उसे लेकिन केदारनाथ सिंह के मामले में 1962 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने वैध ठहरा दिया. वह सरकारी आंत से चिपककर महफूज बैठा है.

अदालत ने जरूर कहा कि राजद्रोह का मतलब आजादी को कुचलना या हर नागरिक की जबरिया धरपकड़ नहीं है. नागरिक अधिकारों और सरकार का खुलकर विरोध कर सकता है, बशर्ते उसके कामों से राज्य की सुरक्षा को असरकारी खतरा नहीं हो.

राज्य की सुरक्षा नाम का शब्दांश मृगतृष्णानुमा सरकारी चिलमन है. उसकी आड़ से निजाम, अदना पुलिस अधिकारियों के जरिए धरपकड को सही ठहराता हुआ बड़ी से बड़ी अदालत को इशारा भर कर देता है. उसके बाद हौसलामंद नागरिक के पर अदालतों की कैंची से कटवा दिए जाते हैं, जिससे उनका हौसला ही मंद पड़ जाए.

फादर स्टेन स्वामी की मौत पर कांग्रेस के बड़े नेताओं सोनिया, राहुल और प्रियंका के भी ट्वीट आए हैं. देश जानना चाहेगा 1962 में राजद्रोह को वैध ठहराए जाने के बाद कांग्रेस सरकारों ने उस कानून की किताब से बर्खास्तगी को लेकर क्या किया? 1971 में MISA का कानून किसने बनाया और उसके पहले 1967 में UAPA किसने बनाया? यह भी कि राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 (NSA) किसके कार्यकाल में बना?

भाजपा की सरकारें खुलकर उन सब अधिनियमों का क्रूर इस्तेमाल बदनीयती से (भी) करती रही हैं. कांग्रेसी हुकूमत ने राज्य की सुरक्षा को बरकरार रखने के सरकारी जोश में बनाया होगा!

विनोद दुआ, दिशा रवि, कोई कार्टून कलाकार, कोई केरल का पत्रकार, विश्वविद्यालय के बच्चे, अम्बेडकर का पौत्र, आदिवासियों, मजदूरों के लिए संघर्षरत सुधा भारद्वाज और संविधान के तहत जनसंघर्ष की आजादी और अभिव्यक्ति के झूले पर चढ़कर लोग पेंगें मारते हैं. तो संविधान वृक्ष की डालियों से ही वह रस्सी काट दी जाती है.

उसे नागरिक की फांसी का फंदा बना दिया जाता है. क्या मौजूदा सरकार तो पौराणिक काल के अत्याचारों की बानगी ढोने को अपना सांस्कृतिक संस्करण समझती है?

अंगरेजी कानून का कोढ़ हिन्दुस्तानी कानूनी समझ की खाज के साथ जुड़कर भारतीय जीवन में सड़ांध पैदा कर चुका. इंग्लैंड और अमेरिका में जमानत के लिए अदालतों की ड्योढ़ियों पर इस तरह एड़ियां नहीं रगड़नी पड़तीं. कानून के उधार में आए शब्द और अक्षर तो भारतीय कानूनी समझ की इबारत में हैं.

वह फलसफा नहीं है जो मनुष्य को गरिमा का संस्करण समझता है. यही समझ लेकिन अमेरिकी संविधान से हमने उधार ली है. अंगरेज अदालतों की उदारता को भी हमारी कानूनी समझ के हलक में ठूंसा गया. फिर हमें मितली क्यों हो रही है? कहने को वह संविधानिक नस्ल का कानून है. लेकिन धरपकड़ थानेदार के स्तर का अधिकारी करता है. वह कानून की किताब को हथकड़ी ही समझता है.

फिर उसके हुक्मनामे पर पकड़े गए आरोपी के लिए लाखों रूपए की फीस लेकर या सरकारी कारिंदा बने या कुछ इंसानी फलसफा को समझने वाले वकील पत्रकार और बुद्धिजीवी प्रोफेसर जद्दोजहद अलग अलग कारणों से करते हैं. स्टेन स्वामी जैसे लोग अदना मनुष्य लगते भारतीय भाई बहन के जिस्म की पसीना, खून और आंसू की त्रिवेणी में डुबकी लगाकर जीवन की मुक्ति ढूंढ़ते रहते हैं.

कोई मुझे मत समझाए कि अंगेरजी कानून में यह जो लिखा है कि हर सरकारी अधिकारी अगर गलती भी करता है तो प्राथमिक तौर माना जाए कि उसने सद्भावना के साथ किया होगा. सत्य यह है उसमें नेकनीयती अमूमन नहीं होती.

अदालतें कुछ भी फैसला करें तो उनके खिलाफ उनकी ही खींची गई लक्ष्मण रेखा के बाहर जाकर कहीं गलती से कोई कुछ कह दे. अवमानना कानून का नागपाश उसकी हैसियत की मुश्कें बांध लेता है.

छोटी अदालतों में फतवा जारी होता है, जाओ अपील करो. लाखों खर्च करो. अपनी जिंदगी तबाह करो. बरसों जेल में सड़ो. फिर एक रुक्का पकड़ा दिया जाएगा पुलिस तुम्हारे खिलाफ मामला सबूत नहीं कर पाई. जाओ उन बाल बच्चों से मिलो जिनकी जिंदगी तुम्हारे जेलयाफ्ता होने पर घर को यतीमखाना बनाए रही.

भीमाकोरेगांव नाम के बदनाम मामले में मानव अधिकार कार्यकर्ता जमानत के लिए बेचैन होंगे. हत्यारे, बलात्कारी, रसूखदार, तरह तरह के अपराधी जमानत और पेरोल पर हैं. कई सरकारी मिलीभगत से करोड़ों रूपयों का गबन करने के बावजूद विदेशों में ऐश कर रहे हैं.

फादर स्टेन स्वामी! तुम अदालतों के बेपरवाह रुख और सरकारी जुल्म के शिकार होकर असफल और नाकारा इंसान की तरह मर गए? कई पहले भी मरे हैं. आगे भी मरेंगे.

पस्तहिम्मत हिन्दुस्तानी कौम में केवल नागरिक जज्बा है. वह कभी संविधान की सीमाओं में रहकर लेकिन इन्सानियत की नई इबारत समझते, पढ़ते सैलाब बनकर इस देश को बर्बाद करने नहीं रचने के लिए दावत देगा. तब खलनायकी, हिदुस्तान की बेइंसाफ मशीनरी से अपना मुंह काला करके बाहर जाएगी. लगता नहीं ऐसा होगा! लेकिन हो जाए इस उम्मीद के कारण मैं अभी मरा नहीं हूं.

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