स्मृतियों का जंगल

अभिषेक श्रीवास्तव | फेसबुक

गीदड़ की मौत आती है तो वो शहर की ओर भागता है या नहीं, पक्का नहीं कह सकता. आदमी की मौत आती है तो वो जंगल की ओर ज़रूर भागता है. स्मृतियों का जंगल! आदमी जब मौत के करीब होता है तो उसकी स्मृतियां कोलाज की तरह आंखों के सामने तैरने लगती हैं. फिल्मों में हमने देखा है, यह मेरा अनुभूत नहीं है. कोई किरदार मरने वाला है और उसे अपनी ज़िन्दगी की चुनिंदा निर्णायक तस्वीरें दिख रही हैं, दृश्य तैर रहे हैं, आवाज़ें गूंज रही हैं. अपना बचपन, जवानी, शादी, बच्चे, दुख, सुख, सब याद आता है एक पल में. ये सब कहने को पुराना होता है लेकिन सबसे नया लगता है ऐन उस वक़्त.


पुराना, सबसे नया है. एक पिट्ठू झोले के विज्ञापन की कैच लाइन है, “बैक इज़ द न्यू फ्रंट!” बिल्कुल यही होता है. आपके सामने खड़ी असीम दुनिया बेमानी हो जाती है. भविष्य लुप्त हो जाता है. पीछे तहखाने से निकल कर चीजें नज़र को आच्छादित कर लेती हैं. फिर आपको सुख मिलता है. एक सुरक्षाभाव भी पैदा होता है. यह शराब जैसा नहीं है कि आपको हाई पर ले जाए. हर स्मृति विजया है. धीरे धीरे घुलता भांग का गोला. ऊपर उठाता हवा में, हिचकोले खिलाता, फिर हिंडोला झुलाता. लो, और लो में ले जाता. गर्त तक.

दक्षिणपंथी प्रतिगामी राजनीति क्यों सफल है? वह आपकी आदिम स्मृतियों को भेजे में हाथ डालकर बाहर खींच लाती है अपनी ज़रूरत के मुताबिक और अपने नैरिटिव को आपसे पुष्टि दिलवाती है. यह काम डायरेक्ट होता है सूचनाओं, संकेतों, प्रच्छन्न संदेशों के माध्यम से. यह काम परोक्ष भी होता है. आपको असुरक्षा के घेरे में डालकर, उम्मीद को कुचल कर, भविष्य को धुंधला कर, दीवार तक धकेल कर. जो डायरेक्ट एक्शन है वह पॉलिटिक्स है, प्रोपगंडा है. जो इंडायरेक्ट है, वो मनोवैज्ञानिक है, अदृश्य है.

इसे इस तरह समझें. बचपन से मध्यवर्गीय हिन्दू परिवारों में पले लोग सुनते आए हैं कि फलाने समुदाय का दिया मत खाना, वे थूक कर देते हैं. हम लोग शहरी आधुनिकता की धकापेल में शायद ये बात कब की भूल चुके थे. बहुत सही मौके पर इसे महामारी के बहाने रिवाइव किया गया और माहौल बना दिया गया. ये प्रोपगंडा के माध्यम से डायरेक्ट पॉलिटिक्स थी. परोक्ष मोर्चे पर क्या हुआ? जो प्रतिगामी विचारों के समर्थक नहीं हैं, उनका पुराना हार्ड डिस्क भी मचलने लगा हालांकि उसमें से निकला कुछ राहतकारी माल. बचपन की तस्वीर, पुरानी रेसिपी, साड़ी, लूडो, सांप सीढ़ी, संस्मरण, रामचंद्र शुक्ल और चांदी की मछली पालती इतिहास की किताबें. फिर जैसे उधर थूकने का खेल चला, वैसे इधर चैलेंज का खेल चला. इन्हें सांस्कृतिक हलकों में विमर्श का नाम दिया गया ताकि मानसिक दिवालियेपन को छुपाया जा सके.

दोनों की राजनीतिक प्रक्रिया एक ही थी – स्मृतियों का आवाहन. इस प्रक्रिया का संचालक भी एक – सत्ता. अब जिसकी जैसी आस्था, उसके संदूक में से वैसा माल बरामद! डायरेक्ट पॉलिटिक्स की प्रतिक्रिया लक्षित वर्ग में अनुकूल हुई. जो लक्षित नहीं थे प्रत्यक्ष, उनमें दो तरह से प्रतिक्रिया हुई. एक, इसका विरोध कर के. दूसरे, अच्छी स्मृतियों में पनाह लेकर. कुल मिलाकर एजेंडा सेट करने वाले सफल हुए क्योंकि उन्होंने चाहे अनचाहे सबकी गर्दन पीछे मोड़ दी. आगे नहीं देखना है. पीछे देखते रहो, चाहे जिस पाले में रहो. इसका लाभ ये है कि आगे के चौराहों पर उन्हें बैरिकेड लगाने में आसानी होती है. विवेक के लौटते ही आपने गर्दन ज्यों आगे की, सामने रास्ता बंद!

पुराना, सबसे नया है लेकिन पुराने के खतरे भी बहुत हैं. नाम याद नहीं शायर का लेकिन बहुत पहले सुना था इसे इतिहासकार शाहिद अमीन से:

माज़ी से दामन मेरा अटका सौ सौ बार
माज़ी ने दिया हमको झटका सौ सौ बार
चले थे माज़ी के दोश पे चढ़ने हम
माज़ी ने ला ला के पटका सौ सौ बार!
(माज़ी=अतीत, दोश=कंधा)

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