इच्छा मृत्यु और गांधी की व्याख्या

कनक तिवारी|फेसबुक:गांधी विचार सरोवर, अंतर्विरोधों के संग्रहालय और उत्तरोत्तर समझ के संशोधनकर्ता हैं. जटिल समस्याओं और स्थितियों को नैतिकता और प्रखर तार्किकता के साथ बुद्धिमय विचारक को सब सूझता रहता था. वह वर्षों बाद इतिहास में उकेरा जाता. इच्छा मृत्यु अर्थात युथनेसिया पर सुप्रीम कोर्ट की आदेशात्मक मुहर वाली व्याख्या को खंगालने पर गांधी की याद आती है. नर्स अरुणा रामचंद्र शानबाग के प्रसिद्ध मुकदमे से शुरू कर सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णायक फैसले में महत्वपूर्ण बिन्दुओं को समेकित, व्याख्यायित और निर्धारित करने की मौलिक कोशिशों में केवल ‘पैसिव‘ युथनेसिया को जायज करार दिया गया. विधि आयोग ने रेखांकित किया था कि इच्छा मृत्यु को निष्क्रिय अर्थ में देने वाले डॉक्टरों को दंडित नहीं किया जा सके.

‘पैसिव‘ शब्द को गांधी के जुमले में ‘निष्क्रिय‘ के बदले ‘अहिंसात्मक‘ लिखना बेहतर होगा. एक डॉक्टर ब्लेज़र ने बेटी का इलाज संभव नहीं कहते खुद क्लोरोफॉर्म सुंघाकर मार डाला. मुकदमे में जूरी ने डॉक्टर को माफ कर दिया. एक फ्रांसीसी अभिनेत्री ने लाइलाज दीख रहे प्रेमी के अनुरोध पर उसे गोली मारकर मौत दे दी. उसे जूरी के कहने पर छोड़ दिया गया. दोनों घटनाओं पर टिप्पणी करते बापू ने कहा ‘इस तरह की हत्या नेकनीयती से की जाए, तो मेरी परिभाषा और समझ के अनुसार हिंसा नहीं मानी जाएगी.‘ उन्होंने सावधान किया कि तीसरे व्यक्ति द्वारा ऐसे कार्य को उचित ठहराने की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर नहीं ले सकता. गांधी ने लाइलाज व्यक्ति की इच्छा मृत्यु को फैसला करने वाले व्यक्ति की नीयत पर छोड़ दिया. चेतावनी भी बिखेरी ऐसा करने वाले व्यक्ति को परिणामों को भुगतने तैयार भी रहना चाहिए. गांधी ‘हिन्द स्वराज‘ में डॉक्टरों को पिस्सुओं की तरह खून चूसना प्रचारित भी करते हैं. पिछले सौ बरसों में वे कॉरपोरेट अस्पतालों में प्रोन्नत हो गए हैं.


साबरमती आश्रम के अपंग बछड़े की ज़िंदगी बचाने डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए. गांधी ने आश्रमवासियों से बात कर खुद जहर की पिचकारी के जरिए उसके प्राण हरण की कार्यवाही सम्पन्न कराई. निर्णय का तत्काल और बाद में भी लगातार विरोध हुआ. एक पत्र पाठक ने पूछा ‘आपको मान लेने का क्या अधिकार था कि बछड़ा चंगा होगा ही नहीं? गांधी ने आत्म स्वीकार किया कि ‘बछड़े को मारने में यदि भूल हुई भी हो तो भी मैं जानता हूं कि उसकी आत्मा भी तो कुशल ही है.‘ यह आत्म स्वीकार भी किया कि उन्हें निश्चयात्मक ज्ञान तो नहीं था कि बछड़ा चंगा हो ही नहीं सकता. फिर दुविधा भी परिभाषित की कि बछड़े के शरीर का नाश करने में परिणाम के पूर्ण ज्ञान की ज़रूरत नहीं थी. उन्होंने साफ कहा कि अहिंसा उनके लिए ऐसा धर्म है जो धर्म लोकमत की परवाह नहीं करता. मानव मुक्ति के महान मसीहा ने कहा इच्छा मृत्यु कारित करने और सर्जन की चीरफाड़ करने दोनों ही बातों में मंशा तो शरीर में स्थित आत्मा को दुख मुक्त करना ही है.

सुप्रीम कोर्ट और विधि आयोग ने कुछ मानवीय स्थितियां अनुत्तरित छोड़ दी हैं. गांधी वहां भी गए. एक श्रीनिवासन अपनी बीमार बहन की इच्छा मृत्यु को लेकर राय मांगते हैं. अहिंसा के अप्रतिम पुजारी ने नायाब तर्क किया. अपना प्राणान्त कर लेने की श्रीनिवासन की बहन की इच्छा विशुद्ध रूप से परमार्थ की भावना से प्रेरित थी. उसने सोचा वह अपनी सेवा करने वालों की परेशानी दूर कर सकेगी. यह सोचना गांधी के अनुसार गलत था क्योंकि मरीज़ की परिजनों द्वारा सेवा करना परेशानी नहीं सौभाग्य का उदाहरण है. यही काम तो के. ई. एम. अस्पताल की नर्स बहनों ने अरुणा शानबाग के लिए किया. चाहे सुप्रीम कोर्ट हो, विधि आयोग हो, डॉक्टर हों या गांधी हों, इच्छा मृत्यु पश्चिम के न्यायशास्त्र से उद्भूत परिकल्पना का उत्पाद है.

गांधी ने पढ़ा था डेनमार्क में कानून बनाया गया है. उसमें किसी मनुष्य को ‘कष्ट से मुक्त करने के लिए मारना‘ कुछ विशेष अधिकार प्राप्त लोगों के लिए अपराध नहीं है. बापू ने कहा केवल इस आधार पर किसी की हत्या करना कि मृत व्यक्ति मरना चाहता था उचित ठहराना खतरनाक काम है. कोई व्यक्ति असह्य पीड़ा से घबराकर कह सकता है उसे मार दिया जाए. अच्छा हो जाता तो ईश्वर का शुक्रिया अदा करता. भला हुआ उसकी इच्छा पूरी नहीं की गई.

गांधी ने एक और महत्वपूर्ण स्थिति का आकलन किया. युद्ध-क्षेत्र में घातक रूप से घायल सैनिक को यदि चिकित्सा की सुविधा प्राप्त होने की सम्भावना नहीं हो. तब उसकी हत्या का फैसला उस घायल सैनिक की स्वयं मार दिये जाने की इच्छा नहीं होगी, बल्कि यह जानकारी होगी कि बिल्कुल बेसहारा हालत में उसे तिल तिल करके मरना पड़ेगा. खासकर जब घायल सैनिक को प्रेमपूर्ण तीमारदारी भी हासिल होने की उम्मीद नहीं हो. यह भी देखना होगा जो सैनिक उसकी हत्या करेगा वह इस स्थिति में भी नहीं है कि अपने घायल साथी की सुश्रूषा कर सके.

एक अज्ञात व्यक्ति ने गांधी को 1928 में पत्र लिखा था. उनका चार महीने का शिशु अपने जन्म के पंद्रहवें दिन से बीमार पड़ा था. डॉक्टर तथा पिता को लगता है बच्चा जिएगा नहीं. कुटुम्ब बड़ा है. सिर पर कर्ज का बोझ है. गांधी ने दूरदर्शिता और परिपक्वता की सलाह दी. फिलहाल पिता अपने स्पष्ट धर्म अर्थात बेटे की सेवा करने से निरपेक्ष नहीं जान पड़ता है. करोड़ों डॉक्टर भी बच्चे के जीने की आशा छोड़ दें तब भी उसकी सेवा की जा सकती है. डॉक्टर से ज़रा भी चूक हुई. रिश्तेदार ज़रा भी बेईमान हुए. न्यायालय ज़रा भी तटस्थ आकलन नहीं कर सके. तो युथनेसिया का प्रकरण मानव वध में तब्दील होने में देर कहां लगेगी!

कैंसर ऐसी ही बीमारी का नाम है. उससे बचना लगभग असंभव होता है. क्या ऐसे भी मरीज़ को गांधी, सुप्रीम कोर्ट या विधि आयोग के कहने से निष्क्रिय या अहिंसात्मक युथनेसिया की मौत का निवाला बनाया जा सकता है? यदि ऑक्सीजन, ग्लूकोज़, वेंटिलेटर वगैरह धीरे धीरे हटाते चले जाएं तो मरीज़ को असह्य वेदना नहीं होगी. इसका प्रमाण पत्र कौन देगा? सुप्रीम कोर्ट ने सभी संभावनाओं के आकाश का विस्तार भले ही नहीं देखा हो. अपने सूक्ष्मदर्शी यंत्र से बारीक संभावनाओं को उकेरा है. उन पर समाजशास्त्रीय चिंतन का सिलसिला ज़रूर चलना चाहिए. अरुणा शानबाग, डॉक्टर ब्लेज़र, पेरिस की अभिनेत्री, श्रीनिवासन, एक अज्ञात पिता, डेनमार्क का कानून, गांधी, सुप्रीम कोर्ट और विधि आयोग इस त्रासद सवाल का जवाब देने की कोशिश करते रहे हैं. संभव है संसद कानून रच दे. सुप्रीम कोर्ट ने कई अन्य मुद्दों पर संसद को कानून रचने बल्कि संविधान संशोधन तक की समझाइशें दी हैं. उनका पालन लेकिन नहीं किया गया है.

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