गोली का संदेश

गौरी लंकेश की हत्या करने वाले मीडिया के लिए एक अशुभ संकेत दे रहे हैं. 5 सितंबर को बेंगलुरु में अपने ही घर के बाहर पत्रकार गौरी लंकेश पर चली गोली ने सिर्फ उनकी हत्या नहीं की बल्कि पत्रकारों को एक अशुभ संकेत भी दे दिया. जो लोग एक स्वतंत्र देश में होने के नाते सवाल पूछने, आलोचना करने, असहमत होने, मानवाधिकार और भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाने को अपना अधिकार समझते हैं, उनके लिए इसमें स्पष्ट संकेत है.

दलितों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ काम करने वालों के खिलाफ गौरी लंकेश मुखर थीं. वे कन्नड भाषा में प्रकाशित होने वाली गौरी लंकेश पत्रिके निकालती थीं. उनके पिता पी. लंकेश लंकेश पत्रिके निकालते थें. उनके निधन के बाद गौरी ने इसकी शुरुआत की थी और इसके जरिए निर्भिक पत्रकारिता कर रही थीं. वे न सिर्फ नरेंद्र मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी की घोर आलोचक थीं बल्कि प्रदेश की कांग्रेस सरकार के खिलाफ भी उनका ऐसा ही रुख था. उन्होंने स्थानीय स्तर पर मजबूत समूहों को नाराज किया और उन लोगों का साथ दिया जो सरकार और सत्ताधारी पार्टी को चुनौती दे रहे थे.


जहां तक हमें मालूम है कि उन्हें मारे जाने की कोई धमकी नहीं मिली थी. जबकि इसी तरह की एक घटना में जान गंवाने वाले लेखक और इतिहासकार एमएम कलबुर्गी को पहले से जान से मारने की धमकियां मिल रही थीं. कलबुर्गी की हत्या 2015 में उनके घर में ही हुई थी. उन्हें हिंदू चरमपंथियों से 1989 से धमकियां मिल रही थीं.

गौरी लंकेश की हत्या से पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और सरकार से असहमत होने वाले लोग हिल गए हैं और पूरे देश में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं. कन्नड में अपना प्रकाशन शुरू करने से पहले वे अंग्रेजी पत्रकारिता में काम कर चुकी थीं. वह एक मेट्रो शहर में रह रही थीं न कि किसी छोटी जगह पर. उनके खिलाफ आपराधिक मानहानी के मुकदमे भी दर्ज हुए. भाजपा सांसद प्रहलाद जोशी और दूसरे भाजपा नेता उमेश दुषी द्वारा दायर मामले में उन्हें दोषी भी पाया गया. वे इसके खिलाफ अपील करने की योजना पर काम कर रही थीं. लेकिन उन्हें मार दिया गया. इससे पता चलता है कि आलोचना करने वालों को रास्ता से हटाने की सोच किस स्तर तक चली गई है.

इसमें मीडिया के लिए क्या संदेश है? जब तक दोषी का पता नहीं चल जाए तब तक किसी नतीजे पर पहुंचना ठीक नहीं होगा. वैसे भी भारतीय मीडिया में गौरी लंकेश जैसे बहादुर लोग कम ही हैं जो ताकतवर लोगों के खिलाफ आवाज उठा सकें. सच्चाई तो यह है कि कुछ अपवादों को छोड़ दें तो भारत की मुख्यधारा की मीडिया बिल्कुल आज्ञाकारी हो गई है. जिस तरह से मीडिया में पूंजी की स्थिति है उसमें किसी पत्रकार के लिए बगैर मालिक के समर्थन में कोई पड़ताल संभव नहीं है. इसलिए मीडिया में आजकल हर मामले में एक खास तरह की ही बात चलती है. दूसरे मामलों को उठाने वाले बहुत कम हैं. ऐसे में ही गौरी लंकेश पत्रिके जैसे प्रकाशन अहम हो जाते हैं.

ये छोटी आवाजें तब मुखर हो जाती हैं जब ताकतवार लोग इन्हें दबाने की कोशिश करते हैं. ऐसे प्रकाशनों के पास कोई खास समर्थन नहीं होता इसलिए न सिर्फ सरकार के हमले बल्कि गैर सरकारी तत्वों के हमले की आशंका भी इन पर बढ़ जाती है.

गौरी लंकेश का अंत करने के लिए गोली का इस्तेमाल किया गया लेकिन उन्हें दबाने के लिए अवमानना के मुकदमों का इस्तेमाल हो रहा था. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. इस हथियार का इस्तेमाल कारपोरेट घराने और नेता दोनों मीडिया को काबू में करने के लिए कर रहे हैं. इस कानून पर अब नए सिरे से बहस की जरूरत है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे हटाने की मांग करने वाली एक याचिका को 2016 में खारिज कर दिया था. इस निर्णय की आलोचना करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने वायर में लिखा, ‘दुनिया समतल नहीं बल्कि असमान है. ताकतवर लोग मुकदमे का इस्तेमाल लोगों को चुप कराने के लिए करते हैं.’

ऐसे कानून की लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई जगह नहीं होनी चाहिए. हमें यह याद करना चाहिए कि जब 1988 में राजीव गांधी सरकार मानहानी विधेयक लाने की कोशिश कर रही थी तो मीडिया के भारी विरोध की वजह से उसे अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे. गौरी लंकेश को मीडिया की ओर से सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि एकजुट होकर मानहानी कानून को खत्म करने की मांग उठाई जाए. उनकी निर्मम हत्या पत्रकारों के लिए एक खतरे की घंटी है. न सिर्फ उनकी जान खतरे में है बल्कि स्वतंत्र और निर्भिक पत्रकारिता का भविष्य खतरे में है.
1966 से प्रकाशित इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली के नये अंक के संपादकीय का अनुवाद

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