गिरीश कर्नाड का निधन

नई दिल्ली | डेस्क: देश के जाने माने अभिनेता, लेखक, निर्देशक और सामाजिक कार्यकर्ता गिरीश कर्नाड नहीं रहे. लंबे समय से बीमार चल रहे 81 वर्षीय गिरीश कर्नाड का सोमवार को तड़के निधन हो गया.

गिरीश कर्नाड बीते चार दशकों से नाटक लेखन और रंगमंच की दुनिया के एक बड़े नाम थे. वे समकालीन मुद्दों पर लिखते हुए इतिहास और पौराणिक कथाओं का इस्तेमाल करने के लिए जाने जाते थे. उनके कई नाटकों का अंग्रेजी और कई भारतीय भाषाओं में मंचन हुआ.


लगभग पांच दशक से ज्यादा समय तक गिरीश कर्नाड नाटकों के लिए सक्रिय रहे. इसके अलावा सामाजिक आंदोलनों में भी वे लगातार सक्रिय रहने वाले लोगों में से थे. कई बार भारी अस्वस्थता के बाद भी वे सामाजिक आंदोलनों में उत्साह के साथ सक्रिय भूमिका में नज़र आते थे.

अभिनय, लेखन, निर्देशन आदि में अपने योगदान के लिए गिरीश कर्नाड को पद्म श्री से सम्मानित किया गया था. वे चार बार फिल्मफेयर (कन्नड़) पुरस्कार भी जीते. इनमें से तीन बतौर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और एक स्क्रीनप्ले के लिए दिया गया था.

जीवन

19 मई, 1938 को महाराष्ट्र के माथेरान में गिरीश कर्नाड का जन्म हुआ था. बाल्यावस्था से ही उनका लगाव नाटकों की ओर था. अपने स्कूली समय से ही कर्नाड ने थियेटर से जुड़कर कार्य करना आरम्भ कर दिया था. अपनी स्नातक पूरी करने के बाद वे इंग्लैण्ड चले गए और वहीं पर आगे की शिक्षा पूर्ण की.

भारत वापस लौटने पर गिरीश कर्नाड ने मद्रास में सात साल तक ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में कार्य किया, लेकिन कुछ ही समय बाद यह कार्य छोड़ दिया. बाद में शिकागो गए और एक प्रोफ़ेसर के रूप में काम किया.

इसके बाद पुन: भारत लौटने पर इन्होंने अपने साहित्य के ज्ञान से क्षेत्रीय भाषाओं में कई फ़िल्मों का निर्माण किया और पटकथा कार्य भी करने लगे.

पहला नाटक ययाति 1968 में छपा और चर्चा का विषय बना. तुगलक के लेखन-प्रकाशन और बहुभाषी अनुवादों-प्रदर्शनों से राष्ट्रीय स्तर के नाटककार के रूप में प्रतिष्ठा हुई. 1971 में हयवदन, 2015 में बलि, 2017 में शादी का एलबम, बिखरे बिम्ब और पुष्प का प्रकाशन से वे लगातार नाट्य लेखन में सक्रिय रहे.

इनके नाटकों को इब्राहिम अलकाजी, ब.ब. कारंत, आलोक पद्मसी, अरविंद गौड़, सत्यदेव दुबे, विजय मेहता, श्यामानंद जालान और अमल अल्लाना जैसे थिएटर और रंगमंच के लब्धप्रति‍ष्ठ निर्देशकों ने निर्देशित किया.

1970 में कन्नड़ फ़िल्म ‘संस्कार’ से अपने सिने कैरियर को प्रारम्भ किया था. इस फ़िल्म की पटकथा उन्होंने स्वयं ही लिखी थी. इस फ़िल्म को कई पुरस्कार प्राप्त हुए थे. इसके पश्चात श्री कर्नाड ने और भी कई फ़िल्में कीं.

उन्होंने कई हिन्दी फ़िल्मों में भी काम किया था. संस्कार, वंशवृक्ष, काड़ू, अंकुर, निशान्त, मंथन, स्वामी, गोधूलि और ‘पुकार’ आदि उनकी कुछ प्रमुख फ़िल्में हैं. गिरीश कर्नाड ने छोटे परदे पर भी अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम और ‘सुराजनामा’ आदि सीरियल पेश किए.

गिरीश कर्नाड ‘संगीत नाटक अकादमी’ के अध्यक्ष पद को भी सुशोभित कर चुके थे. तुगलक के लिए संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार, हयवदन के लिए कमलादेवी चट्टोपाध्याय पुरस्कार, रक्त कल्याण के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार तथा साहित्य में समग्र योगदान के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया गया था.

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