लाट साहबों के करम!

कनक तिवारी
राज्यपाल के पदों पर ऐसे राजनेता भी नियुक्त होते रहे हैं जिन्होंने सियासी हाराकिरी करने में कंजूसी नहीं बरती. आंध्रप्रदेश के राज्यपाल रामलाल ने एन.टी. रामाराव सरकार को बर्खास्त करने में हड़बड़ी और असंवैधानिकता दिखाई. उसके कारण केन्द्र की कांग्रेसी सरकार की जगहंसाई हुई.

कर्नाटक के राज्यपाल पी. वेंकटसुबैया ने राज्य विधानपरिषद के तीन सदस्यों के राज्य सरकार के प्रस्ताव को तीन महीनों तक ठंडे बस्ते में डाले रक्खा. केरल की गवर्नर रामदुलारी सिन्हा ने कालिकट विश्वविद्यालय संबंधी राज्य शासन के अध्यादेश को महीनों तक पढ़ने की ज़हमत तक नहीं उठाई और उसे बिना मंजूर किए वापस भेज दिया.


रोमेश भंडारी ने त्रिपुरा के गवर्नर के रूप में असाधारण पक्षपात, अदूरदर्शिता और गैरबुद्धिमत्ता की मिसाल ही कायम कर दी. 1966 में केरल के तत्कालीन राज्यपाल अजित प्रसाद जैन ने खुले आम इंदिरा गांधी को कांग्रेस संसदीय दल का नेता बनाने के लिए प्रचार किया. इस कारण उन्हें अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी.

शीला कौल और कुमुद बेन जोशी ने संवैधानिक कदाचार में पुरुषों को पीछे छोड़ दिया. शीला कौल के मामले में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों कुलदीप सिंह और फैजानुद्दीन की बेंच ने कहा कि उन्हें पदावनत हो जाना चाहिए.

कुमुद बेन जोशी ने भी आंध्रप्रदेश के लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर राज्यपाल पद की गरिमा की छीछालेदर की. भ्रष्टाचार के प्रकरणों के लाभार्थी होने पर पी. शिवशंकर और मोतीलाल वोरा ने इस्तीफा देने में बहुत देर की. संतोषमोहन देव और कल्पनाथ राय के भी सर्वख्यात उदाहरण हैं.

पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सावधानी, दूरदर्शिता और भविष्य दृष्टि का नायाब उदाहरण पेश करते अपने दोस्त बंबई के गवर्नर श्रीप्रकाश को समझाइश दी कि वे रफी अहमद किदवई स्मृति स्मारक कोष से खुद को अलग रखें. उन्होंने आंध्रप्रदेश गवर्नर वी.वी. गिरि तथा मध्यप्रदेश के गवर्नर एच0बी0 पाटस्कर को भी पत्र लिखा कि बहुत लंबी छुट्टियां नहीं लिया करें. पंजाब गवर्नर एन.वी. गाडगिल को डाॅ. प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से विवादग्रस्त राजनीतिक विषयों पर कोई बात नहीं करने की चेतावनी दी थी.

केरल के राज्यपाल वी. विश्वनाथन ने राज्य मंत्रिपरिषद द्वारा प्रस्तावित राज्यपाल के अभिभाषण का टेक्स्ट ही बदल दिया था. बिहार के राज्यपाल मोहम्मद यूनुस सलीम ने प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के कहने पर बिहार की लालू प्रसाद यादव सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश देने से मना कर दिया था.

जनता दल सरकार में कर्नाटक में राजनीतिक कारणों से राष्ट्रपति शासन लागू करने राज्यपाल भानुप्रताप सिंह का उपयोग किया गया. हरियाणा के गवर्नर जी.डी. तपासे ने देवीलाल को बहुमत सिद्ध करने के लिए विधायकों को लाने का निर्देश दिया. फिर बिना प्रक्रिया के भजनलाल को मुख्यमंत्री बना दिया.

जम्मू कश्मीर के राज्यपाल जगमोहन का अलग अलग समय पर लगातार राजनीतिक इस्तेमाल होता ही रहा है. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल धर्मवीर ने तो अजय मुखर्जी मंत्रिपरिषद द्वारा तैयार राज्यपाल का अभिभाषण पढ़ने से इसलिए इंकार कर दिया था क्योंकि उसमें केन्द्र की आलोचना के अतिरिक्त खुद धर्मवीर की भत्सना थी.

कई राज्यपालों ने कई शिगूफे भी किए हैं. नारायणदत्त तिवारी ने तो स्नेहिल मांसलता का कीर्तिमान स्थापित किया. केन्द्र सरकार के पास जादू की पुड़िया और अदृश्य छड़ी भी होती है. कांग्रेसी हों या भाजपाई मंत्रिपरिषदों को राज्यपालों से भिड़ा दिया जाए.

सत्यनारायण कथा का प्रसाद क्या है?

(1) राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल पद पर नियुक्ति के लिए अनुच्छेद 74 के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह मानना आवश्यक होगा.

(2) राष्ट्रपति संवैधानिक प्रावधानों के अनुकूल राज्यपाल को पदावधि समाप्त होने के पहले इस्तीफा मांग सकते हैं या हटा भी सकते हैं.

(3) राज्यपाल को किसी भी स्थिति में केन्द्र सरकार का प्रतिनिधि, नुमाइंदा एजेन्ट या सेवक नहीं समझा जा सकता.

(4) राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होने के बाद राज्यपाल को खुद राष्ट्रपति का भी प्रतिनिधि, नुमाइंदा, एजेन्ट या सेवक नहीं समझा जा सकता.

(5) राज्यपाल की संवैधानिक जवाबदेही भारत के संविधान के तहत ली गई उनकी प्रतिज्ञा के अनुसार है, राष्ट्रपति या केन्द्रीय मंत्रिपरिषद के प्रति नहीं.

(6) केन्द्र सरकार का राज्यपाल में अविश्वास हो जाए तब भी राज्यपाल को पदावधि के पूर्व नहीं हटाया जा सकता.

(7) राज्यपाल को केवल संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करने के कारण महाभियोग के बदले राष्ट्रपति के विवेक पर हटाया जा सकता है.

(8) पदावधि के पूर्व राज्यपाल को हटाने के लिए राष्ट्रपति राज्यपाल को कारण बताओ सूचना पत्र आदि देने के लिए बाध्य नहीं होंगे.

(9) राष्ट्रपति द्वारा जारी बर्खास्तगी आदेश को संविधान न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है और न्यायालय का यह क्षेत्राधिकार होगा कि वह सभी दस्तावेज, जानकारियां और लिखित उत्तर आदि केन्द्र शासन से आहूत कर सके.

(10) संविधान न्यायालय द्वारा संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन होने की स्थिति में राज्यपाल की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द किया जा सकेगा.

(11) राज्यपाल की केन्द्र शासन की राजनीतिक विचारधारा या आदर्श आदि से सामंजस्य नहीं होने पर भी उसे पद से नहीं हटाया जा सकता.

(12) यदि किसी मुद्दे पर केन्द्र और राज्य शासन की दृष्टियों में भिन्नता हो तो संवैधानिक मीमांसाओं को छोड़कर अन्य विवादास्पद तथ्यपरक मुद्दों पर राज्यपाल के लिए लाज़िमी होगा कि वह राज्य की मंत्रिपरिषद की राय को तरज़ीह दे.

(13) राज्यपाल राज्य का संविधान प्रमुख होता है. उसके द्वारा चलाए जा रहे प्रशासन में सहयोग और सहायता के लिए मंत्रिपरिषद होती है.

(14) राज्यपाल की मंजूरी के बिना विधानसभा कोई विधायन प्रभावशील नहीं कर सकती.

(15) राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता के बिना भी राज्यपाल पर कई आपात संवैधानिक ज़िम्मेदारियों का अनुपालन करने का दायित्व है.

(16) संविधान सभा तथा सरकारिया आयोग में राजनीतिज्ञों को यथासंभव राज्यपाल नहीं बनाए जाने का उल्लेख हुआ है लेकिन संविधान इस संबंध में मनाही नहीं करता है.

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