क्यों हो रही है हसदेव अरण्य के विनाश की तैयारी

आलोक शुक्ला
तो क्या छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य के हिस्से गिनती के दिन बचे हुए हैं? पूरी प्रकृति को जल्दी से जल्दी नष्ट कर देने की हमारी कथित विकास की तीव्र गति को देख कर तो यही लगता है कि छत्तीसगढ़ के लाखों लोगों के पास भी, हसदेव अरण्य आने वाले दिनों में स्मृतियों का हिस्सा भर रह जाएगा.

किसी दीवार पर लिखी इबारत की तरह इसे देखा जा सकता है कि सिर्फ कारपोरेट समूह के मुनाफे के लिए मध्य भारत के सबसे समृद्ध वन क्षेत्र, हसदेव अरण्य का विनाश किया जा रहा है.


सरकारें अपने द्वारा ही लिए गए निर्णयों से पलटती जा रही हैं, संरक्षण की प्रतिबद्धता कार्पोरेट मुनाफे के सामने दम तोड़ रही है.

क्यों महत्वपूर्ण है हसदेव अरण्य

मध्य भारत के सबसे समृद्ध, जैव विविधता से परिपूर्ण साल के वृक्षों से आच्छादित, हसदेव नदी और उस पर निर्मित मिनीमाता बैराज का जलागम क्षेत्र “हसदेव अरण्य क्षेत्र” के नाम से जाना जाता है.

उत्तर छत्तीसगढ़ में कोरबा, रायगढ़, सरगुजा और सूरजपुर ज़िले की सीमाओं में लगभग 1700 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह वन क्षेत्र मध्यप्रदेश के कान्हा वन रेंज को झारखण्ड के पलामू वन क्षेत्र से भी जोड़ता है.

यह वन क्षेत्र गोंड, कंवर, बिंझवार आदि आदिवासियों का घर तो है ही जिससे उनकी आजीविका, संस्कृति व अस्तित्व जुडा हुआ है, इसके अलावा विभिन्न वन्य प्राणियों विशेषकर हाथी का भी प्राकृतिक रहवास है.

वर्ष 2009 में केन्द्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय द्वारा इस सम्पूर्ण क्षेत्र को, भारत के ऐसे ही अन्य समृद्ध वन क्षेत्रों को साथ जोड़कर नो गो क्षेत्र की संज्ञा दी गई थी, जिसका मतलब था खनन से मुक्त रखना.

इसके पीछे का कारण यह है कि अपनी समृद्धता के साथ इस जंगल-जमीन के नीचे कोयला है और जहाँ खनिज निकलते हैं, उन क्षेत्रों की पहचान बदल जाती है.

लगभग 5600 मिलियन टन भंडार के साथ इस क्षेत्र में 20 से अधिक कोल ब्लाकों की पहचान हुई है, जिसके कारण इसे ‘हसदेव अरण्य कोल फील्ड’ का नाम दे दिया गया है. लेकिन यह सिर्फ नामकरण नही है बल्कि यह शब्दावली असल में हमारी उस सोच को भी दर्शाती है, जहां उस क्षेत्र में रहने वाले जन, वन, वन्य प्राणी जलागम व उनका सहअस्तित्व सब कुछ गौण हो जाता है.

कुछ क्षेत्रों को खनन से मुक्त रखने हेतु बनाए गए इन ‘नो गो’ प्रावधानों को मोदी सरकार ने पूर्ण रूप से ख़त्म करके वॉयलेट इन वॉयलेट क्षेत्र के रूप में नए स्वरुप में निर्धारण करना शुरू किया. हालाँकि कई बार वॉयलेट इन वॉयलेट क्षेत्र के निर्धारण के पेरामीटर बदलने के वाबजूद आज तक मोदी सरकार के द्वारा इसे नोटिफाई नही किया गया.

इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ कारण है खनन कंपनियों का दवाब में. आज भी हसदेव अरण्य क्षेत्र के कोल ब्लाक इन वॉयलेट होने के वाबजूद आवंटित किए जा रहे हैं और उन्हें पर्यावरणीय एवं वन स्वीकृति प्रदान की जा रही है.

ठेंगे पर ग्रामसभा

वर्ष 2011 में नो गो क्षेत्र होने के वाबजूद इस क्षेत्र में आवंटित सभी कोल ब्लाकों में से परसा ईस्ट केते बासन कोल ब्लाक की सभी स्वीकृति केन्द्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय द्वारा दी गई थी, यह कहते हुए कि यह हसदेव अरण्य के फ्रिंज में स्थित है और इसके बाद अन्य किसी खनन परियोजना को इस क्षेत्र में स्वीकृति नही दी जाएगी.

हालाँकि बाद में वर्ष 2014 में इसकी वन स्वीकृति को भी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा निरस्त कर दिया गया और सुप्रीम कोर्ट के स्टे पर आज भी इसमें खनन जारी है.

यह परियोजना राजस्थान राज्य विद्युत निगम उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित हुई थी, जो पहले संयुक्त उपक्रम और बाद में एम डी ओ (Mines Developer cum Operator) अनुबंध के रूप में अडानी समूह के पास है.

वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर देश के 204 कोल ब्लाक निरस्त हुए थे जिसमे हसदेव अरण्य के सभी 20 कोल ब्लाक शामिल थे. वर्ष 2014 से ही मोदी सरकार ने पुनः कोल ब्लाक की नीलामी /आवंटन शुरू किया, जिसमें हसदेव अरण्य क्षेत्र के 7 कोल ब्लाक (परसा ईस्ट केते बासन, परसा, केते एक्सटेन्सन, मदनपुर साऊथ, पतुरिया गिदमुड़ी एवं चोटिया) नीलाम और आवंटित किए गए.

हालाँकि हसदेव अरण्य की 20 ग्रामसभाओ ने इसका पुरजोर विरोध दर्ज किया और प्रधानमंत्री से कोल ब्लाक आवंटित न करने की अपील ग्रामसभाओं का प्रस्ताव भेजकर की. इसके वाबजूद न सिर्फ कोल ब्लाक आवंटित हुए बल्कि उनकी स्वीकृति प्रक्रिया, वन भूमि का अधिग्रहण आदि यथावत जारी है.

क्या हसदेव से कोयला खनन ज़रुरी है?

लाख टके का सवाल यही है कि क्या हसदेव अरण्य के इलाकों में गांव के आदिवासियों, किसानों के तमाम विरोध के बाद भी कोयला का खनन ज़रुरी है? जब इसकी पड़ताल करते हैं तो जवाब मिलता है नहीं. ज़रुरत और मुनाफ़े की हवस के फर्क को कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है.

हसदेव अरण्य क्षेत्र में विभिन्न राज्य सरकारों को आवंटित कोल ब्लाकों में से मदनपुर साऊथ कोल ब्लाक आंध्रप्रदेश सरकार को कॉमर्सियल माइनिंग अर्थात खुले बाजार में कोयला बेचकर मुनाफा कमाने के लिए दिया गया है.

आंध्र प्रदेश सरकार ने बिरला समूह के साथ खनन के लिए MDO अनुबंध करके कोल ब्लाक उसे सुपुर्द कर दिया. यदि सरकारें चाहती तो सिर्फ राजस्व कमाई के नाम पर हसदेव को उजाड़ने से बचाया जा सकता है.

दूसरा कोल ब्लाक है पतुरिया गिदमुड़ी जिसे छत्तीसगढ़ पॉवर जनरेशन कम्पनी को आवंटित किया गया है. मई 2019 में छत्तीसगढ़ सरकार ने इसका MDO भी अडानी को दे दिया. यह कोल ब्लाक छत्तीसगढ़ सरकार के सूरजपुर जिले में स्थित भैयाथान पॉवर प्लांट के लिए आवंटित हुआ था, जिसकी स्थापना से राज्य सरकार ने लगभग 5 वर्ष पहले ही इंकार कर दिया है.

छत्तीसगढ़ पॉवर जनरेशन कम्पनी ने 4 जून 2018 को कोयला मंत्रालय को पत्र भेजकर निवेदन किया कि इस कोल ब्लॉक का अन्तः उपयोग भैयाथान से बदलकर इफ्को छत्तीसगढ़ पॉवर लिमिटेड प्रेमनगर के कर दिया जाए. यह कंपनी छत्तीसगढ़ सरकार की है.

यह बदलाव इसलिए किया गया क्योंकि पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया में यह बताना आवश्यक है कि कोयले का अन्तः उपयोग अर्थात खपत कहाँ होगी ?

यहाँ दिलचस्प बात यह है कि खनन के लिए अन्तः उपयोग प्रेमनगर स्थित जिस पॉवर प्लांट को दर्शाया गया, पिछले एक दशक से कभी राज्य सरकार ने इस पॉवर प्लांट को लगाने की मंशा भी जाहिर नहीं की. और ना ही इस परियोजना को शुरू करने की दिशा में कोई दस्तावेज प्रस्तुत किए गए. मतलब साफ है कि राज्य सरकार को कोयले की ज़रुरत नहीं है. सिर्फ अडानी कम्पनी के मुनाफे लिए इस खनन परियोजना को शुरू किया जाना है.

3 कोल ब्लाक राजस्थान सरकार को आवंटित हुए हैं, जिसमें पूर्व संचालित परसा ईस्ट केते बासन खनन परियोजना की क्षमता पूर्व निर्धारित 10 मिलियन टन वार्षिक से बढाकर 15 कर दी गई है.

यदि अन्य दो कोल ब्लाक में खनन न भी किया जाये तो राजस्थान सरकार के पास कोयला उपलब्ध है. जरुरत होने पर राजस्थान सरकार द्वारा कोल इण्डिया से कोल लिंकेज के कोयला प्राप्त किया जा सकता है जो वर्तमान में अडानी कम्पनी से ख़रीदे जा रहे प्रति टन कोयले की दर से सस्ता है. इस पूरे मसले को यहां पढ़ा जा सकता है.

छत्तीसगढ़ सरकार जनता के साथ या जनता के ख़िलाफ़?

एक दिन पहले ही राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और केन्द्रीय कोयला मंत्री प्रहलाद जोशी के बीच एक बैठक होती है और मीडिया में खबर आती है कि अगले दो महीने में छत्तीसगढ़ की 16 खदानों की नीलामी की जाएगी. मीडिया की इसी खबर में जिक्र है कि राज्य सरकार ने अपने लिए सूरजपुर जिले की तारा कोल ब्लाक की मांग की है.

ये वही कोल ब्लाक है, जिसके समृद्ध वन क्षेत्र को चंद माह पूर्व ही छत्तीसगढ़ सरकार ने प्रस्तावित लेमरू हाथी रिजर्व में शामिल किया था.

लेमरू हाथी रिजर्व के प्रस्ताव और हसदेव अरण्य क्षेत्र के संरक्षण कारण ही पिछले वर्ष जून 2020 में छत्तीसगढ़ सरकार ने कामर्सियल माइनिंग में इस क्षेत्र के 5 कोल ब्लाक मदनपुर नार्थ, मोरगा ii , मोरगा साऊथ श्यांग एवं फतेहपुर ईस्ट को सूची से बाहर रखने कोयला मंत्री को पत्र लिखा था.

पत्र में दो प्रमुख बिंदु थे, पहला यह क्षेत्र हसदेव और मांड नदी के केचमेंट है, इसलिए खनन नही होना चाहिए. दूसरा, यह क्षेत्र राज्य सरकार द्वारा बनाए जा रहे लेमरू हाथी रिजर्व में शामिल है.


राज्य सरकार की मांग पर कोयला मंत्रालय ने इन कोल ब्लाको की नीलामी नही की थी लेकिन इस क्षेत्र में पूर्व में आवंटित परसा कोल ब्लाक को राज्य सरकार ने मार्च 2021 में स्थापना की स्वीकृति प्रदान कर दी. जबकि यह भी प्रस्तावित लेमरू हाथी रिजर्व का हिस्सा था.

दरअसल लेमरू हाथी रिजर्व वर्ष 2005 से हसदेव अरण्य क्षेत्र में प्रस्तावित योजना है, जिसे लगभग स्वीकृत हो जाने के बाद रमन सरकार ने खनन कम्पनियों के दवाब में वर्ष 2007 में ही वापिस ले लिया था. इसके पीछे प्रमुख कारण था कुछ कोल ब्लाकों का इसकी जद में आ जाना.

वादे से मुकर गई राज्य सरकार

कांग्रेस पार्टी ने सत्ता में आने के बाद अपने जन घोषणा पत्र के वादे अनुरूप 1995 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हाथी रिजर्व के लिए चिन्हित किया लेकिन इसमें हसदेव अरण्य का महत्वपूर्ण वन क्षेत्र को छोड़ दिया था. वन क्षेत्र छोड़ने के पीछे प्रमुख कारण उस जगह पर कोल ब्लाकों की उपस्थिति रही.

तमाम प्रयासों के बाद लेमरू रिजर्व के क्षेत्र को बढाया गया और हसदेव अरण्य के सम्पूर्ण क्षेत्र को इसमें शामिल कर लिया गया. इस बढ़ाये गए क्षेत्र में सिर्फ दो, परसा ईस्ट केते बासन और चोटिया संचालित खनन परियोजना को छोडकर बाकी सभी प्रस्तावित कोल ब्लाक शामिल किए गए थे.


पिछले वर्ष अक्टूबर नवम्बर में लेमरू हाथी रिजर्व के लिए ग्रामसभाओं से प्रस्ताव भी पारित करवाए गए लेकिन कुछ दिनों बाद ही इस योजना को ही लगभग बंद कर दिया गया, जिसके पीछे कहा जा रहा है कि अडानी और बिरला कम्पनी के दवाब में राज्य सरकार पीछे हट गई रही है.

सरकारों द्वारा कार्पोरेट परस्ती में अपने ही निर्णयों से पीछे हटने के वाबजूद हसदेव अरण्य क्षेत्र के ग्रामीण आदिवासी पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से अपने जंगल, जमीन, आजीविका, संस्कृति और पर्यावरण बचाने के लिए संघर्षरत हैं.

यह सम्पूर्ण क्षेत्र संविधान की पांचवी अनुसूची में शामिल होने के कारण पेसा कानून लागू है और ग्रामसभाओ को विशेष अधिकार प्राप्त है. इन्ही संवैधानिक और क़ानूनी अधिकारों के तहत हसदेव की ग्रामसभाएं न सिर्फ एकजुट है बल्कि सम्पूर्ण हसदेव अरण्य को बचाने प्रतिबद्ध हैं.

आदिवासी अपने हिस्से की आख़िरी लड़ाई लड़ रहे हैं और औद्योगिक घरानों के साथ गलबहियां डाले सरकार इन आदिवासियों से लड़ रही है. लेकिन तय मानिए कि अगर हसदेव अरण्य उजड़ा तो सरकारी विकास की अवधारणा के पक्ष में बहस करने वालों की शुद्ध हवा में भी ज़हर घुल जाएगा.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!