मैना के नाम पर उल्लू सीधा करने की तैयारी

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ के राजकीय पक्षी पहाड़ी मैना के प्रजनन के नाम पर फिर भ्रष्टाचार का खेल शुरु हो सकता है. 1992 से पहाड़ी मैना के प्रजनन के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर देने वाला वन विभाग के अमले ने सोनू और मोनू नामक पहाड़ी मैना को पिंजरे में क़ैद कर लिया है. दावा ये है कि इनसे प्रजनन प्रक्रिया को बढ़ाया जायेगा. हालांकि कुछ वन अधिकारियों का कहना है कि आने-जाने वालों को दिखाने के लिये इन मैना को यहां रखा गया है. लेकिन अधिकारी यह नहीं बता पा रहे हैं कि अगर यह सच है तो ऐसी मैना को रायपुर या बिलासपुर के जू में क्यों नहीं रखा गया है?

वन विद्यालय के पिंजरे की अकेली मैना आर्या की मौत के बाद से वन विद्यालय का पिंजरा खाली था. इससे पहले इस पिंजरे में 6 मैना रखी गई थीं. प्रजनन के नाम पर रखी गईं, ये सारी मैना एक-एक कर मरती चली गईं.


बस्तर की पहाड़ी मैना को मनुष्य के आवाज़ की हुबहू नक़ल के लिए जाना जाता है. जिस अंदाज़ में आप बोलेंगे, यह पहाड़ी मैना उसी अंदाज़ में उस वाक्य को दुहरा देगी.

90 के दशक में इस मैना के संवर्धन के लिये सरकार ने कोशिश की और जगदलपुर में विशाल पिंजरा बना कर इसके प्रजनन की दिशा में प्रयास शुरु हुए. लेकिन आज तक राज्य सरकार ने इस राजकीय पक्षी पर एक भी वैज्ञानिक अध्ययन नहीं करवाया है.

हालत ये है कि हर साल अलग-अलग मद से करोड़ों रुपये ख़र्च करने के बाद भी सरकार यह भी नहीं जान पाई कि पिंजरे में क़ैद मैना में से कितने नर और कितने मादा थे. अधिकारियों और मंत्रियों ने मैना की कैप्टिव ब्रीडिंग के लिए इनके डीएनए जांच की घोषणा की लेकिन उस पर अमल नहीं हो सका.

पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि शोर-शराबा में आम तौर पर संवेदनशील वन्यजीव या पंक्षी प्रजनन की प्रक्रिया को अंजाम नहीं दे पाते. वन विद्यालय में कैद मैना के साथ भी ऐसा ही हुआ. लेकिन वन विभाग के अधिकारी इस बात को समझे बिना, अवैज्ञानिक तरीके से मैना को पिंजरे में रख कर बरसों से लाखों रुपये बेवजह खर्च कर रहे हैं.

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