भारतीय कृषि पर हमलावर पत्थर

देविंदर शर्मा
एक लोकप्रिय कहावत है- शीशे के घर में रहने वाले दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते. लेकिन विश्व व्यापार संगठन के लिए इस कहावत का कोई अर्थ नहीं है. पिछले कई वर्षों से भारत पर दबाव बनाया जा रहा है कि वह या तो कृषि क्षेत्र को दी जाने वाली रियायतें कम करे या इन्हें तयशुदा एएमएस यानी एग्रीगेट मेज़र ऑफ सपोर्ट के अंदर सीमित करे. एक ओर जहां भारत पर भारी दबाव बनाया जा रहा है कि वह किसानों के लिए घोषित किए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य को कम करे, वहीं इसके उलट दूसरी ओर विश्व व्यापार के बड़े मगरमच्छ यानी अमरीका, यूरोपियन यूनियन और कनाडा इसके नियमों की लगातार और बिना किसी डर के धज्जियां उड़ा रहे हैं.

विश्व व्यापार संगठन द्वारा तय किए नियम के मुताबिक भारत समेत अधिकांश विकासशील देश फसल के कुल उत्पाद मूल्य का 10 फीसदी से अधिक सब्सिडी के रूप में नहीं दे सकते. उदाहरण के लिए यदि हम देश भर में गेहूं उत्पादन का मूल्य 500 करोड़ रुपए आंकें तो उस मामले में किसान को सब्सिडी के रूप में, पता नहीं किस आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य को सब्सिडी के तौर पर गिना जाता है; न्यूनतम समर्थन मूल्य की सीमा 50 करोड़ से ज्यादा नहीं हो सकती. न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी के लिये गेहूं और चावल को बाजार समर्थन उत्पाद-विशिष्ट समर्थन की श्रेणी रखा जाता है.


अमरीका के व्यापार प्रतिनिधि रॉबर्ट लाइटथाइजर ने हाल ही में घोषणा की थी कि वे भारत को विश्व व्यापार संगठन में घसीटने की सोच रहे हैं क्योंकि पेश किए गए आंकड़ों में गेहूं और चावल पर दी जाने वाली न्यूनतम समर्थन मूल्य की रकम अधिकृत 10 प्रतिशत से बहुत ज्यादा क्रमशः 60 और 70 प्रतिशत बनती है. यह व्यापारिक झगड़ा तब और ज्यादा तूल पकड़ेगा, जब हाल ही में भारत में लागू उस कृषि नीति को लेकर विश्व व्यापार संगठन में सवाल उठाए जाएंगे, जिसमें 23 फसलों पर लागत मूल्य का डेढ़ गुणा बतौर न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों को देने का फैसला किया गया है.

विवाद के केंद्र में विश्व व्यापार संगठन द्वारा तय वह एग्रीगेट मेज़र ऑफ सपोर्ट आंकड़ा है, जो 1986-88 में कृषि फसलों के वैश्विक मूल्यों को आधार कीमत बनाकर तय किया गया है और विकासशील देशों के लिए इसकी अधिकतम सीमा 10 फीसदी रखी गई है. तब से लेकर अब तक खेती की लागत में लगभग चार गुणा इजाफा हो चुका है, जिसकी वजह से समय-समय पर न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की गई है. भारत के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का स्थान कृषि नीतियों में काफी महत्वपूर्ण है और यह छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष रूप से मददगार है. भारत की 60 करोड़ लोगों की आजीविका सुरक्षित बनाये रखने के लिये इसके नतीजे बहुत महत्वपूर्ण हैं.

यह बात अपने आप में दिलचस्प है कि जहां विकासशील देशों के लिए एग्रीगेट मेज़र ऑफ सपोर्ट की ऊपरी सीमा 10 प्रतिशत रखी गई है, वहीं विकसित मुल्कों के लिए यह 5 प्रतिशत है. नीतिगत विषमता वाली यह पक्षपातपूर्ण व्यवस्था व्यापारिक भाषा में ‘एम्बर बॉक्स’ वर्ग में कहलाती है, जो मूलतः व्यापार की व्यवस्था को गड़बड़ ही करती है.

विश्व व्यापार संगठन के सामने चीन और भारत द्वारा रखे गए संशोधित आंकड़ों में इन दो बड़े कृषि प्रधान देशों ने जोर देकर कहा है कि अमीर देश 90 प्रतिशत से अधिक वैश्विक एग्रीगेट मेज़र ऑफ सपोर्ट छूट का मजा ले रहे हैं, जिसकी कुल रकम लगभग 160 बिलियन डॉलर होती है. यह सब्सिडी उस 200 बिलियन डॉलर की रियायतों के अतिरिक्त हैं जो उन्हें ‘ग्रीन बॉक्स’ के लिए मिलती हैं. इसके अलावा इस वर्ग में आने के बाद उनसे किसी किस्म के सवाल-जवाब की जरुरत नहीं रहती.

कुछ भी हो, विकसित देशों द्वारा अपने किसानों के लिए घोषित घरेलू समर्थन अधिसूचना के आधार पर यह एकदम साफ हो जाता है कि अमरीका, यूरोपियन यूनियन और कनाडा खुद भी किसानों को विशेष श्रेणी में रख कर न्यूनतम समर्थन मूल्य देते आए हैं.

जो आंकड़े पेश किए गए हैं, उनसे यह बात साफ होती है कि जहां कुछ वस्तुओं, फसलों में विकसित देशों में हुए कुल उत्पाद मूल्य से ज्यादा की सब्सिडी दी जा रही थी, वहीं बहुत से मामलों में तो यह आंकड़ा दुगने से भी अधिक था. उदाहरण के लिए चावल को लेते हैं, जहां भारत से इस बात को लेकर सवाल पूछे जा रहे हैं कि वह क्यों अपने किसानों को कुल उत्पादन मूल्य का 60 फीसदी सब्सिडी के रूप में दे रहा है, वहीं खुद अमरीका में यह सब्सिडी 82 फीसदी है और यूरोपियन यूनियन के किसानों के मामले में यह 66 फीसदी तक है. हां, कुछ सालों में उनके विशेष श्रेणी में न्यूनतम समर्थन मूल्य केवल दूध और चीनी में ही 90 प्रतिशत सब्सिडी देने पर केंद्रित रहे थे. इसी तरह यूरोपियन यूनियन में यह रियायत कुछ सालों में केवल दो विशिष्ठ श्रेणियों यानी मक्खन और गेहूं के मामले में 64 फीसदी से ज्यादा रही है.

अमरीका में कुछ उत्पाद जिनके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 50 प्रतिशत से ज्यादा रहा है, उनमें ऊन (215 प्रतिशत) चिकनी ऊन (141 प्रतिशत), चावल (82 प्रतिशत), कपास (74 प्रतिशत), चीनी (66 प्रतिशत), कैनोला (61 प्रतिशत) और सूखा मटर (57 प्रतिशत) हैं. जिन 20 सालों का आंकड़ा इकट्ठा किया गया है, उसमें केवल 7 साल ही ऐसे थे, जिनमें 50 प्रतिशत से ज्यादा के विशेष श्रेणी वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य केवल दूध तक सीमित रहा था. शेष 13 साल इन सभी फसलों और उत्पादों पर यह न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी था.

यूरोपियन यूनियन के मामले में यह बात समझ में आती है कि कुछ उत्पाद ऐसे हैं, जिन पर सब्सिडी कुल उत्पादक मूल्य की 50 प्रतिशत से अधिक रही थी. इसमें रेशमी वस्त्र (167 प्रतिशत), तंबाकू (155 प्रतिशत), सफेद चीनी (120 प्रतिशत), खीरा (86 प्रतिशत), प्रसंस्करण के लिए नाशपाती (82 प्रतिशत), ऑलिव ऑयल (76 प्रतिशत), मक्खन (71 प्रतिशत), सेब (68 प्रतिशत), मिल्क पाउडर (67 प्रतिशत) और प्रसंस्करण के लिए टमाटर (61 प्रतिशत) थे.

अगर कनाडा की बात करें तो वहां दूध, भेड़ का मांस और मक्का को लगातार भारी न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ सब्सिडी के रूप में मिलता आया है. तंबाकू के मामले में तो यह कुल लागत मूल्य का तीन गुणा था. क्या अब समय नहीं है कि अमरीका, यूरोपियन यूनियन और कनाडा पहले खुद 160 बिलियन डॉलर मूल्य की सब्सिडी अपने किसानों को देना बंद करें? भले ही यह देर से हुआ है लेकिन भारत और चीन का यह संयुक्त प्रस्ताव विश्व व्यापार नीतियों की उन त्रुटियों को हटाने में मदद करेगा, जिसके चलते विकसित देश विकासशील देशों की मंडियों को अपने सस्ते आयातित माल से पाटते आए हैं.

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