रमन्ना काल में कुछ विचार

कनक तिवारी
मौजूदा हालात क्या हैं ? संक्षेप में कहें, पिछले कुछ वर्षों में सुप्रीम कोर्ट की हालत उसके मुख्य न्यायाधीशों ने ही खस्ता कर रखी है. यह होना नहीं चाहिए था. कुछ वर्षों पहले चीफ जटिस भरुचा ने कहा भी था कि मोटे तौर पर ऊंची अदालतों में 20 प्रतिशत काली भेंड़ें आ गई हैं. अब तो यह प्रतिशत बढ़ गया होगा.

प्रशांत भूषण पर मुकदमा चलता रहे लेकिन अपने करम और कतरब के कारण कई सुप्रीम कोर्ट जज तो संदेह के घेरे में होते ही हैं. मौजूदा गृहमंत्री अमित शाह के पुराने मामले में अनुकूल फैसला करिए और रिटायरमेंट के तुरंत बाद केरल के राज्यपाल बनिए. मोदी प्रशासन के पक्ष बल्कि कॉरपोरेटियों के पक्ष में धुआंधार फैसले करिए. राम मंदिर को कानून के बदले आस्था के आधार पर बनाने का हुक्म दीजिए.


राफेल विमान के मामले में कागजात सरकार ने जमा नहीं किए. फिर भी लिख दीजिए. कागजात देखकर राफेल डील में सब कुछ चंगा सी. लगातार जूनियर जज होने के बाद भी बेंचों की अध्यक्षता करिए. रिटायर होकर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष बनिए. सबसे पहले ममता बनर्जी के बंगाल में जाकर हिंसा और हत्याओं की जांच कर लीजिए.

सुप्रीम कोर्ट जज रहते मोदी जी को विश्व विजेता बनाइए और उनसे सीखने की प्रेरणा लीजिए. यही कारण था सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने खुलकर पहली बार प्रेस वार्ता ली कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है. हालांकि उसमें जस्टिस रंजन गोगोई भी थे.

जस्टिस लोया की संदिग्ध हालातों में मौत की जांच नहीं हो सके. इसके लिए भले सारी प्रक्रियाएं गडडमगड्ड कर दी जाएं.

भीमा कोरेगांव जैसे प्रकरण में जमानत देना तो दूर इलाज तक का इंतजाम नहीं हो पाने के कारण एक बूढ़े मानव अधिकार कार्यकर्ता की मौत हो जाए. वह सब कुछ चल रहा है.

इसी साल अप्रेल में जस्टिस रमन्ना सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस बने. उनके आने के पहले ही आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री जगन रेड्डी ने उन पर सोच समझकर ताबड़तोड़ आरोप लगा दिए. ताकि उनका सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस बनना संदेहजनक हो जाए.

चीफ जस्टिस रमन्ना के आने के बाद सुप्रीम कोर्ट के मौसम में बदलाव की खुनकी आ गई. अभी चार महीने हुए हैं और वे करीब एक साल और चीफ जस्टिस रहेंगे लेकिन कार्यपालिका की नींद टूट रही होगी.

फैसले आ रहे हैं. टिप्पणियां हो रही हैं. जजों के व्याख्यान भी हो रहे हैं. सरकारी महकते में बड़ी हलचल है. टालमटोल का युग खत्म हो रहा लगता है. कोई बहुत बड़ी न्यायिक क्रांति नहीं भी हो. तब भी न्याय की नदी गर्मी के बाद बरसात के मौसम में समझदार बारिश होने के कारण बहने तो लगी है.

आते ही जस्टिस रमन्ना ने पत्रकार सिद्दीक कप्पन के प्रकरण में कथित राजद्रोह के आरोप के बावजूद उसे चिकित्सा सुविधा के लिए दिल्ली भेजने का आदेश किया. क्योंकि उत्तरप्रदेश में लापरवाही बरती जा रही थी.

सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र को झिड़का कि सरकार कोविड-19 का इलाज प्रबंधन करने में नाकाम रही है. इस कारण बहुतों की जान चली गई.

राजद्रोह के सड़े अपराध को लेकर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी है कि यह तो एक प्रतिशोध का हथियार है जिसे एक्टिविस्ट्स, वकीलों, विद्यार्थियों और पत्रकारों के खिलाफ ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है, क्योंकि वे ही सरकार के खिलाफ आवाज उठाते हैं. राजद्रोह के अपराध के खात्मे ही को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट विचार करने तैयार हो गया है.

अपने शपथ ग्रहण में ही जस्टिस रमन्ना ने कह दिया था कि कानूनरक्षकों की यह जवाबदारी है कि वे मानव अधिकार को लेकर सरकारों और असामाजिक तत्वों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों के खिलाफ अपनी जिम्मेदारी निभाएं.

चीफ जस्टिस बोबड़े के समय देश में कई हाई कोर्ट्स में याचिकाएं डाली गई थीं कि सरकारें अपने अपने प्रदेशों में कोविड-19 का प्रबंधन करने में फेल हो गई हैं. न दवाएं हैं, न ऑक्सीजन है, न अस्पताल हैं और न डॉक्टर हैं.

अचानक केन्द्र सरकार के हस्तक्षेप के कारण सारी याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में लाकर जस्टिस बोबड़े के अनुसार ‘यूनिफॉर्म आर्डर‘ (समान आदेश) करने की जुगत बिठाई गई.

चीफ जस्टिस रमन्ना के आने के बाद जस्टिस चंद्रचूड़ की बेंच ने साफ कहा कि सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट्स के क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप नहीं करेगा. जहां जरूरत हो, वहीं वह आदेशों को सप्लिमेंट करेगा. जब राष्ट्रीय आपदा हो तो सुप्रीम कोर्ट मूक दर्शक नहीं रहेगा. सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र को आदेश दिया कि वह राज्यों से मिलकर मुनासिक प्रबंध तत्काल करवाए.

यह सुप्रीम कोर्ट ने बहुत महत्वपूर्ण निर्णय किया कि यदि कोई सरकार की असफलताओं को लेकर विरोध या प्रचार करता है और उसे सजा मिलती है, तो कोर्ट कार्यवाही करेगा. सुप्रीम कोर्ट ने सारी जानकारी पब्लिक डोमेन में आती कहनी चाहिए.

केन्द्रीय चुनाव आयोग द्वारा हाईकोर्ट की कुछ टिप्पणियों के खिलाफ याचिका प्रस्तुत करने पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि मद्रास हाई कोर्ट ने जो कुछ कहा है. उसमें हस्ताक्षेप नहीं किया जाएगा क्योंकि चुनाव आयोग के अधिकारियों के स्तर पर गफलत तो उन्हें दिखी है.

चीफ जस्टिस बोबड़े ने सुप्रीम कोर्ट में खाली पड़ी लगभग 10 जगहों को भरने के लिए कुछ नहीं किया. जस्टिस रमन्ना की सक्रियता के कारण सुप्रीम कोर्ट में नो नए जज नियुक्ति हो रहे हैं जिससे सुप्रीम कोर्ट में पूरी संख्या 34 तक पहुंचकर काम करने लगेगा. महिला जजों के नियुक्त होने से 2027 में सुप्रीम कोर्ट को पहली महिला चीफ जस्टिस मिलने की संभावना का दरवाजा खुल गया है.

पेगासस का बदनाम मामला सुप्रीम कोर्ट के विचारण में है. आरोप है कि सरकार ने देश के महत्वपूर्ण व्यक्तियों, राजनेताओं, अधिकारियों, लेखकों, मानव अधिकार कार्यकर्ताओं और सभी तरह के लोगों की इजराइल की किसी जासूसी संस्था का सहयोग लेकर शायद खुफियागिरी की है.

यह सब राज्य की सुरक्षा की आड़ कहते हुआ है. रमन्ना ने इस बात से नाखुशी जाहिर की कि ऐसी चर्चाएं समानांतर रूप से सोशल मीडिया में चलती रहेंगी. तो अदालत को न्याय करने के मामले में सभी पक्षों के लिए ज्यादा गंभीर होना पडे़गा यह मामला अभी विचाराधीन है और सरकार को जवाब देने में कठिनाई हो रही है.

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