कश्मीरियों पर अपनी बात थोपना

सरकार द्वारा कश्मीर में सोशल मीडिया को प्रतिबंधित करना सच्चाई बाहर आने के उसके डर को दिखाता है.

कई मौके ऐसे रहे हैं जब किसी सामग्री या सूचनाओं के संचार के किसी प्लेटफॉर्म को प्रतिबंधित किया गया है ताकि गलत सूचनाओं का प्रसार नहीं हो सके. लेकिन यह एक ऐसा समय नहीं है. यह दिख रहा है कि कश्मीर में सोशल मीडिया पर जो प्रतिबंध लगाया गया है उसका मकसद प्रदर्शनकारियों को आपस में बात करने और एकजुट होने से रोकना है. इसके अलावा सरकार को इस बात का भी डर है कि प्रदर्शन के वीडियो सामने आ सकते हैं. इनमें से कई वीडियो ऐसे हैं जिनमें मानवधिकारों का उल्लंघन होता दिखता है.


कश्मीर की पूरी एक पीढ़ी सरकार समर्थित हिंसा को देखते हुए बड़ी हुई है. ऐसे में सरकार का यह कदम उन्हें यह दोबारा बताता है कि कश्मीर के लोग जिस तरह से भारत सरकार को देखते हैं उसका मुकाबला करने के लिए सरकार किस हद तक जा सकती है. भारी सैन्य बल की तैनाती के साथ-साथ यह एक ऐसा आदेश है जिसे कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर थोपा गया है. इसमें यह कहा गया है कि कश्मीरियों को अपुष्ट और आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिले, इसलिए ऐसा किया जा रहा है. सरकार इस तथ्य को नजरंदाज करने की कोशिश कर रही है कि पत्थरबाजी या विरोध प्रदर्शन के वीडियो समाज विरोधी नहीं बल्कि सरकार विरोधी हैं.

यह भी समझना चाहिए कि कश्मीर में सरकार के लिए ‘अपुष्ट और आपत्तिजनक’ सामग्री क्या है? लोकसभा चुनावों के वक्त 9 अप्रैल को कुछ वीडियो वायरल हुए. इसमें यह दिखा कि गोलियों की आवाजों के बीच लोग चीख रहे हैं. इससे हमें पता चला कि लोगों का सुरक्षा बलों के साथ किस तरह से सामना होता है. इसमें से एक वीडियो 17 साल के एक लड़के ने फेसबुक पर लाइव किया था. वह वीडियो एक एंबुलेंस के अंदर का था. जिसमें वह अपने मृत भाई को लेकर जा रहा था. उसके भाई पुलिस हिरासत में था. दूसरा वीडियो एक 22 साल के लड़के ने डाला था. पत्थरबाजी करते वक्त उसे सुरक्षाबलों की गोली लगी थी.

युवा कश्मीरी इन वीडियो का इस्तेमाल सरकार के खिलाफ सबूत के तौर पर कर रहे हैं. लोगों की सबसे अधिक नजर कश्मीर के उस वीडियो पर गई जिसमें सीआरपीएफ के एक जवान के साथ कुछ कश्मीरियों ने दुव्र्यवहार किया. सोशल मीडिया में भी संख्या बल आम कश्मीरियों पर भारी पड़ रही है. पैसे देकर कई अकाउंट चलाए जा रहे हैं और आईटी सेल की भी मदद ली जा रही है. जिस वीडियो का जिक्र यहां किया गया है उसके बारे में सीआरपीएफ ने तुरंत कह दिया कि हमने जांच में वीडियो को सही पाया है. लेकिन सवाल यह उठता है कि उन वीडियो की सत्यता की जांच इतनी तेजी से क्यों नहीं होती जिसमें सेना ज्यादती करते दिखती है?

कुछ लोगों ने यह भी कहा कि सीआरपीएफ जवान वाले वीडियो में कम से काम चार स्थानीय लोगों की आवाजें आ रही हैं जिनमें वे लड़कों को कह रहे हैं कि जवान को कुछ मत करो. वीडियो की प्रकृति ऐसी है कि इसमें कई परतें रिकॉर्ड होती हैं लेकिन इसके प्रसार और उपभोग की ऐसी संस्कृति विकसित हो गई है जिसमें इसकी विभिन्न परतों की ओर लोगों की नजर ही नहीं जाती.economic and political weekly पुष्टि के काम में भी कई पेंच हैं. दुनिया के कई हिस्सो में मुश्किल परिस्थितियों में सोशल मीडिया पर लाइव करने का इस्तेमाल लोगों ने किया है. वॉटसएप वीडियो लोगों को तुरंत का लगता है. इसलिए वे उस पर यकीन कर लेते हैं. लोगों को वीडियो साझा करने की प्रेरणा इसलिए मिल रही है क्योंकि उन्हें लगता है कि मुख्यधारा की मीडिया में उनका पक्ष नहीं आएगा.

सरकार अग्रिम में किसी सामग्री को गलत मानकर न तो प्रतिबंधित नहीं कर सकती और न ही अपनी विचारधारा के हिसाब से किसी सामग्री की पुष्टि कर सकती है और बाकी को दरकिनार. अगर कोई सरकार वाकई गलत सूचनाओं के प्रसार को लेकर चिंतित है तो उसे एक ऐसा ढांचा विकसित करना होगा जिसके जरिए काम हो. यूरोपीय संघ ने फर्जी खबरों को रोकने के लिए यह काम किया है. अगर सरकार यह कहती है कि कश्मीर में विरोध प्रदर्शन के वीडियो गलत हैं तो उसे बताना चाहिए कि इन वीडियो में क्या गलत है. क्या वीडियो से छेड़छाड़ की गई है, क्या वे कहीं और के हैं या क्या वे पुराने हैं?

कई वाइरल वीडियो की सत्यता की पुष्टि तुरंत मुख्यधारा के समाचार संस्थानों द्वारा भी नहीं हो पाती. इनमें कई बार वीडियो के स्रोत की दूरी और किसी ढांचे का नहीं होना भी जिम्मेदार होता है लेकिन अधिकांश बार ऐसा बेसब्री और गैरजिम्मेदारी की वजह से होता है. हालांकि, फर्जी खबरों की पहचान करने वाले कहते हैं कि फर्जी तस्वीरों को पहचानना तकनीकी तौर पर आसान है. इसे रिवर्स इमेज सर्च कहा जाता है.

पश्चिम के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने अपने यहां ऐसी व्यवस्था बनाई है. लेकिन किसी संदेश को साझा करने से पहले उसकी पुष्टि की व्यवस्था का मतलब यह है कि सरकारी कर्मचारी और नेता भी यही करने की कोशिश करेंगे. लेकिन ऐसा होता नहीं है. उदाहरण के तौर पर भारतीय जनता पार्टी के विधायक संगीत सोम द्वारा 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों को भड़काने वाला फर्जी वीडियो जारी करने को देखा जा सकता है.

सरकार सोशल मीडिया की अस्पष्टता का हवाला देकर अपनी नाकामियों को नहीं छुपा सकती. आईटी सेल और अन्य माध्यमों से कराए जा रहे गैरजिम्मेदाराना प्रोपगेंडा पर वह चुप्पी साधे हुए है. कश्मीरी जिन वीडियो को सच का सबूत बता रहे हैं, उन्हें प्रतिबंधित करके सरकार यह साबित कर रही है कि उसे सच्चाई जानने में कोई दिलचस्पी नहीं है.

1966 से प्रकाशित इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली के नये अंक के संपादकीय का अनुवाद

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