दवा के नाम पर लूट की कहानी

जेके कर
दवा के नाम पर लूट की कहानी किसी को हैरान कर देगी.लेकिन संकट ये है कि इस लूट से परेशान उपभोक्ता न तो उफ करता है और ना ही इस लूट को जानने-समझने की कोशिश ही करता है. आपको जानकार हैरानी होगी कि आजकल इंफेक्शन में दी जाने वाली आम दवा सिप्रोफ्लॉक्सासिन के 500 मिलीग्राम की 1 गोली का अधिकतम मूल्य 3.86 रुपये तय किया गया है. जबकि इसका बल्क ड्रग 1,175 रुपये का 25 किलोग्राम का मिलता है. इस तरह से इसके 1 किलोग्राम बल्क ड्रग से सिप्रोफ्लॉक्सासिन के 500 मिलीग्राम की 2000 गोलियां बनाई जा सकती है. इस तरह से 25 किलोग्राम के बल्क ड्रग से 50,000 हजार गोलियां बनाई जा सकती हैं. जिसका मतलब है कि सिप्रोफ्लॉक्सासिन के 500 मिलीग्राम की 1 गोली में 0.023 रुपये का बल्क ड्रग उपयोग में लाया जाता है.

जाहिर है कि जिस गोली में वास्तविक दवा की लागत 0.023 रुपये रहती है, उसका अधिकतम मूल्य 3.86 रुपये केन्द्र सरकार के नेशनल फार्मास्युटिकल्स प्राइसिंग अथारिटी ने 167 गुना तय कर दी है. दोनों आंकड़े हालिया हैं तथा मरीजों के ‘अच्छे दिन’ के सपने को चकनाचूर करने के लिये काफी हैं. यह सच है कि बल्क ड्रग से दवा बनाने के लिये उसे एक तयशुदा प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. जिसके तहत उसमें फिलर्स मिलाये जाते हैं, उसे मशीन से गोली के रूप में ढाला जाता है, स्ट्रिप में पैक किया जाता है, स्ट्रिप को डिब्बे में पैक किया जाता है, इस तरह के कई डिब्बों को बड़े बक्से में रखा जाता है. स्ट्रिप तथा डिब्बे में लेबल छापना पड़ता है. उसके बाद यह दवा, दवा कंपनी के फैक्ट्री से राज्यों के सी एण्ड एफ एजेंट, उसके बाद थोक दवा विक्रेता के पास से होती हुई खुदरा दवा दुकान तक पहुंचती है. तब जाकर वह दवा मरीज को मिल पाती है.


इस पूरी प्रक्रिया में दवा का परिवहन तीन बार होता है. दवा कंपनी के गोदाम, राज्यों के सी एण्ड एफ एजेंट, जिलों के थोक दवा विक्रेता तथा खुदरा दवा दुकान में उसे तय तापमान तथा नमी में रखना पड़ता है. इन सब में खर्च आता है. लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि आखिर 0.023 रुपये के दवा में ऐसी कौन सी चीज मिला दी गई या ऐसा क्या किया गया, जिससे उसका मूल्य 3.86 रुपये का हो गया?

आप की जानकारी के लिये हम यहां पर बता देते हैं कि हमारे देश में 1979 से पहली बार दवाओं पर मूल्य नियंत्रण लागू किया गया. उस समय दवा बनाने के लागत मूल्य पर ‘मार्कअप’ या मुनाफे की इजाजत दी जाती थी. 1979 के दवा मूल्य नियंत्रण आदेश के तहत दवाओं की 3 कैटेगरी बना दी गई थी, जिन पर क्रमशः 40%, 55% और 100% मार्कअप की इजाजत दी गई थी. इसमें एक्साइज ड्यूटी तथा खुदरा दवा व्यापारी के लिये 16% मार्जिन जोड़कर किसी भी दवा का अधिकतम मूल्य तय किया जाता था.

दवा के नाम पर लूट
दवा के नाम पर लूट

इसके बाद आये दो दवा मूल्य नियंत्रण आदेश क्रमशः 1987 तथा 1995 में नियंत्रण के तहत आने वाले दवाओँ की संख्या को कम किया गया तथा ‘मार्कअप’ को बढ़ाया गया. हद तो तब हो गई जब यूपीए-2 के शासनकाल में 2013 में नया दवा मूल्य नियंत्रण आदेश लाया गया. जिसमें दवाओं के अधिकतम मूल्य उसके लागत के बजाये बाजार की स्थिति के अनुसार तय करने का निर्देश जारी कर दिया गया. जिसके तहत केवल वे ही दवायें मूल्य नियंत्रण के दायरे में आयेंगी जिनकी बिक्री देश के कुल दवा बाजार के मूल्य के 1 फीसदी या उससे ज्यादा की होगी.

दूसरा, मूल्य नियंत्रण के तहत आने वाली दवाओं का अधिकतम मूल्य उनके बाजार भाव के औसत के अनुसार होते लगा. मसलन सिप्रोफ्लॉक्सासिन के जितने भी ब्रांड बाजार में उपलब्ध हैं उन सब के मूल्यों को जोड़कर उसका औसत निकाला जाने लगा जिसमें खुदरा दवा दुकानदारों का 16% मार्जिन जोड़कर उसका अधिकतम मूल्य तय किया जाने लगा.

इसी का नतीजा है कि जिस सिप्रोफ्लॉक्सासिन के 500 मिलीग्राम के 1 गोली में 0.023 रुपये का बल्क ड्रग है उसका अधिकतम मूल्य 3.86 रुपये तय होने लगा. ऐसा केवल सिप्रोफ्लॉक्सासिन के साथ नहीं हो रहा है बल्कि अन्य दवाओँ के साथ भी हो रहा है. मिसाल के तौर पर उच्च रक्तचाप की दवा एमलोडिपीन के 5 मिलीग्राम की 1 गोली का अधिकतम मूल्य 3.06 रुपये तय किया गया है. इसके 5 किलो बल्क ड्रग का मूल्य 3,100 रुपये है. इस तरह से 5 मिलीग्राम के एमलोडिपीन की 1 गोली में महज 0.0012 रुपये का बल्क ड्रग होता है.

जाहिर है कि मनमोहन सिंह की यूपीए-2 की सरकार ने देश के मरीजों के बजाये दवा कंपनियों के मुनाफे को तरहीज दी तथा उन्हें दवाओं पर अनाप-शनाप मुनाफा कमाने की पूरी छूट दे दी. जिसे छूट के बजाये लूट कहना ज्यादा बेहतर होगा. यह मामला साल 2013 का है.

उसके बाद ‘अच्छे दिन’ लाने के वादे के साथ मोदी जी की सरकार केन्द्र में अपने बहुमत के बल पर सत्तासीन हुई. उस सरकार को 3 साल पूरे हो चुके हैं, अब तक मरीजों के लिये ‘अच्छे दिन’ नहीं आये. यह सच है कि विदेशों से भारतीयों का काला धन वापस लाना आसान काम नहीं है, हर एक के खात में 15-15 लाख रुपये आने की बात भी चुनावी जुमला थी. परन्तु सर्वाधिकार प्राप्त मोदी सरकार को जिसने योजना आयोग को खत्म करके नीति आयोग बनाने जैसा बड़ा काम किया उसे दवाओं के मूल्य उसके लागत के आधार पर तय करने से कौन रोक सकता है? उसी के साथ दवाओं के लागत के आधार पर उस पर ‘मार्कअप’ तय करने की. इस तरह से जनता को राहत दी जा सकती है. जरूरत है केवल सोच की, जनता के लिये, मजबूर मरीजों के लिये कुछ कर गुजरने की मंशा की.

फिलहाल जेनेरिक का जोर-शोर से प्रचार किया जा रहा है. दावा किया जा रहा है कि जेनेरिक दवा आने से मरीजों को राहत मिलेगी जबकि सच यह है कि मरीजों को तभी राहत मिलेगी जब दवा के दाम वाकई में कम हो तथा आम आदमी की पहुंच के भीतर हो.

कहा जाता है कि हमारे देश में जो लोग दवाओं के दाम तय करते हैं उन्हें खुद कभी दवा खरीदकर नहीं खाना पड़ता है, लगता है कि यह सच्चाई के काफी करीब है.

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