मासिक धर्म पर मानसिकता बदलने की जरूरत

बिकास के शर्मा
मासिक धर्म पर बातचीत निषेध क्यों है? इस सवाल का जवाब असल में हमारी मानसिकता से जुड़ा हुआ है और यह मानसिकता लाखों-करोड़ों महिलाओं को कई तरह की बीमारियों की तरफ धकेल रही है. संकट ये है कि इन मुद्दों पर बात करने की कोई जगह समाज में आज भी नहीं बन पाई है. इस मुद्दे पर खुल कर बातचीत नहीं होने के कारण महिलाओं के बीच भी भ्रांतियां इस हद तक घर कर गई हैं कि उन्हें दूर करना आसान नहीं है. अब जैसे सिलारपुर को ही लें.

मध्यप्रदेश राज्य के सागर जिले से पश्चिम में 53 किलोमीटर जाने पर सिलारपुर गांव आता है, जो कि खुरई विकासखण्ड के अंतर्गत 966 की आबादी का एक बड़ा गांव है. गांव पहुंचते ही हम पाते हैं कि आंगनबाड़ी केंद्र में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता एवं उसकी सहायिका मौजूद है और दोनों इस बात को लेकर चिंतित हैं कि बढ़ती हुई गर्मी में महिलाओं को होने वाले विभिन्न चर्म रोगों एवं अन्य शारीरिक दिक्कतों से कैसे निपटा जाए या फिर कैसे उनकी रोकथाम हो सके.


इसी क्रम में जब हम आंगनबाड़ी केंद्र में दाखिल होते हैं तो थोड़ी सी औपचारिक बात के पश्चात बातचीत गांव में महिलाओं द्वारा मासिक धर्म के दौरान बरती जाने वाली स्वच्छता पर होती है और तुरंत ही हमें यह जानकारी प्राप्त होती है कि जहां एक ओर किशोरी बालिकाओं में सेनिटरी पैड को लेकर जागरुकता बढ़ी है, वहीं महिलाएं इन पैड्स का कम ही इस्तेमाल कर रही हैं. कारण साफ है, एक तो गांव में 200 की आबादी वाली एक टुकड़ी हरिजनों की है, जहाँ निवासरत महिलाएं इतनी सक्षम नहीं हैं कि सेनिटरी पैड्स को हर माह खरीद सकें, दूसरा गाँव की ज्यादातर महिलाएं पैड्स के इस्तेमाल के फायदों से अभी पूर्णतः आश्वस्त नहीं हो पाई हैं और उन्हें लगता है कि कपड़े का इस्तेमाल सुरक्षित ही है.

सिलारपुर में शासकीय योजना के तहत आंगनबाड़ी केंद्र में सेनेटरी पैड महिलाओं को वितरित करने हेतु दिए गए हैं जिन्हें आंगनबाड़ी कार्यकर्ता प्रीति लोधी निर्धारित शुल्क-10 रूपये में 4 पैड्स- लेकर इच्छुक महिलाओं एवं किशोरियों को देती है, साथ ही जो महिलाएं नहीं प्रयोग करती उन्हें इस्तेमाल के फायदे बताकर प्रोत्साहित करती है.

“सर कितनी कोशिश करते हैं हमलोग फिर भी महिलाओं को समझाना कठिन होता है, वे सीधे कहती हैं कि इतने वर्षों से कपड़ा इस्तेमाल करते आ रहे हैं, कुछ नहीं हुआ, अब क्या होगा,” निराशा भरे स्वर में प्रीति बतलाती हैं.

दरअसल, सरकारी योजना के तहत दिए जाने वाले पैड्स में एक और दिक्कत यह है कि महिलाएं इनका आकर छोटा बताती हैं और उन्हें मासिक धर्म के दौरान ज्यादा पैड्स इस्तेमाल करने पड़ते हैं.

इसी गाँव की ऐसी ही एक महिला ने जानकारी दी कि उसकी लड़की को इन पैड्स से कोई असुविधा नहीं होती किन्तु उसे बाहर बाजार से ही निजी कंपनियों के सेनेटरी नैपकिन प्रयोग करना किफायती लगता है. वो आगे बताती है कि कपड़ा प्रयोग करना उसने दो वर्ष पहले छोड़ दिया है क्योंकि उससे खुजली एवं फुंसी जैसी विकृति शरीर के निचले हिस्से में होती थी.

सिलारपुर की ही तरह भ्रमण किये गए करीब दो दर्जन गाँव में भी कुछ इसी तरह की बात सामने आई, हालाँकि कुछ गावों में सेनेटरी नैपकिन ख़त्म हो चुके हैं, एवं इस वर्ष नैपकिन आंगनबाड़ी केन्दों में नहीं पहुंचे हैं.

विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस विशेष

ऐसा ही एक गाँव है निर्तला, जहाँ 800 पैड्स भेजे गए थे एवं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता गीता त्रिपाठी ने सभी की खपत करवा दी थी और अब वह अगली खेप के लिए प्रतीक्षारत है. गीता ने बताया कि उनकी आंगनबाड़ी क्योंकि सागर-बीना मार्ग पर स्थित है तो अधिकारीयों से लेकर कई सामाजिक संस्थाओं ने जागरूकता अभियान चलाया था, आज भी चलता है किन्तु किशोरियों के मुकाबले महिलाएं पैड्स का कम ही प्रयोग करती हैं.

“महिलाएं इस नए बदलाव के साथ जुड़ने में असहज होती हैं. वो कितनी भी बैठकों में आजाएं और हमारी बात सुन लें, कपड़ा ही इस्तेमाल करती हैं,” गीता ने जानकारी दी. निर्तला गाँव में 14-18 आयुवर्ग की 50 किशोरी बालिकाएं हैं एवं वे सभी आंगनबाड़ी या फिर बाहर बाजार से खरीदकर सेनेटरी पैड्स का ही प्रयोग कर रही हैं.

मध्य भारत में पिछले दो दशकों से ग्रामीण विकास के क्षेत्र में कार्य कर रही संस्था ‘डिबेट लोक न्यास’ के समन्वयक बृजमोहन दुबगे का मानना है कि समुदाय की सोच को बदलना एक चुनौतीपूर्ण किन्तु संभव प्रक्रिया है और आने वाले कुछ सालों में महिलाओं के अन्दर यह सकारात्मक बदलाव भी निश्चित रूप से आएगा किन्तु शासन लक्ष्य आधारित दबाव बनाकर इसे और कमजोर कर रहा है.

दुबगे कहते हैं, “ग्रामीण इलाकों में दिक्कत यह भी है कि महिलाएं खुलकर माहवारी सहित अन्य स्वास्थ्य के मुद्दों पर खुलकर बात नहीं कर पातीं क्योंकि मध्यप्रदेश के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में पुरुष सत्ता हावी है. हमलोग भी महिलाओं से बात करने हेतु महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता के साथ ही उनके घर जाते हैं.”

दरअसल, पूरा मसला सामाजिक एवं व्यव्हार परिवर्तन संचार (एसबीसीसी) से जुड़ा हुआ है, जो कई चरणों के कार्य उपरांत परिणाम देता है. महिलओं को जागरूक करने में उन किशोरी बालिकाओं का भी योगदान लिया जाना चाहिए, जो पैड्स का प्रयोग कर लाभान्वित हो रही हैं. साथ ही शासन को गाँव की मूलभूत समस्या, जिनमें पीने और निकासी के लिए पर्याप्त पानी, आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ समुदाय में, विशेषकर पुरुषों में, महिला स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता फैलाने की आवश्यकता परिलक्षित हो रही है, अन्यथा स्वच्छता एवं स्वास्थ्य महज एक सपना ही बनकर रह जायेगा. यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि ज्यादातर ग्रामीण घरों में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को अभी भी अछूत मन जाता है.

आंकड़ों की मानें तो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (2015-16) अनुसार मध्यप्रदेश में जहाँ 37.6 प्रतिशत महिलाएं माहवारी के दौरान स्वच्छ एवं सुरक्षित साधनों का उपयोग करती हैं, वहीँ ग्रामीण इलाकों में केवल 26.4 ही ऐसी महिलाएं सामने आई हैं.

* लेखक युवा पत्रकार हैं और इन दिनों स्वास्थ्य विषयों पर काम कर रहे हैं.

3 thoughts on “मासिक धर्म पर मानसिकता बदलने की जरूरत

  • May 29, 2017 at 11:52
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    आपके दुवारा लिखित कहानी वास्तविकता को बताती और आपके दुवारा किये जा रहे कार्य की भी सराहना करते है, कुछ समस्याएं जरूर होंगी पर सफलता का सही मज़ा तो तभी हैं

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  • May 30, 2017 at 20:14
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    बेहतरीन सारगर्भित जानकारी.

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