बीमारी को छुपाने से इलाज नहीं हो सकता

हिमांशु पंडया | फेसबुक : “लड़ाई तो होती रहेगी, चलिए पहले थोड़ा इतिहास पर ही चर्चा कर लें.” मैंने ग़ुस्से से तमतमाए शक्ति से कहा.

शक्ति ने इससे पिछला वाक्य बोला था, “मैं गांधी जी की तरह नरम दल का नहीं हूँ, चंद्रशेखर आज़ाद की तरह गरम दल का हूँ.”


“बाई जी, कुर्सियाँ लगा दीजिए, बैठ जाइए सब लोग, बैठकर भी लड़ाई की जा सकती है.”

“नहीं सर, हम आपकी इज़्ज़त करते हैं.”

“फिर ग़लत बात ! आप मेरे सामने बैठ जाएँगे, मेरे साथ चाय पी लेंगे, मुझसे हाथ मिला लेंगे, मुझसे बहस कर लेंगे, इससे मेरी इज़्ज़त घटेगी नहीं बढ़ेगी. इज़्ज़त मेरी तब कम होगी – कम से कम मेरी अपनी नज़रों में, जब आप मुझसे दूरी बरतेंगे, मेरी बातें चुपचाप सर झुकाकर मान लेंगे.”

इस समूह के गुस्से का कारण था कि आई कार्ड देने के लिए आई डी प्रूफ क्यों चेक किया जा रहा है ? एडमिशन प्रक्रिया अभी पूरी हुई है और छात्रसंघ चुनाव के पहले आई कार्ड बांटना मुख्य काम है, जाहिर है संवेदनशील भी.

“क्या आप हमें जानते नहीं हैं?”

“बेशक मैं आप सबको जानता हूँ पर आपकी क्लास के ऐसे पंद्रह बीस महान विद्यार्थी भी तो हैं जिन्हें देखकर मैं ही हैरत से पूछता हूँ कि क्या आप मेरे विद्यार्थी हैं ? अब अगर उनके लिए नियम है तो सबके लिए होगा ना ! यह ठीक वैसा ही है जैसे कल तुम पूछने आये थे कि इरशाद का प्रस्तावक-अनुमोदक कौन है क्योंकि तुम्हारा अनुमोदक में नाम होने पर तुम्हें घर से बुलाना पड़ा. नियम तो नियम है, चाहे इरशाद हो या शक्ति.”

बहरहाल प्रिंसिपल चेंबर में बीस कुर्सियां लगा दी गयीं. “ न तो चंद्रशेखर आज़ाद गरम दल के थे और न गांधी जी नरम दल के थे. और न ही वे एक दूसरे के खिलाफ थे.कौन थे नरम दल के नेता ? कौन थे गरम दल के नेता ? इनका टाइम पीरियड क्या था ? चंद्रशेखर आज़ाद किस दल से थे ? हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपल्बिकन आर्मी का नाम सुना है ? अच्छा पता है भगत सिंह ने पार्लियामेंट में बम क्यों फेंका था ?”

राकेश को ज्यादातर जवाब पता थे. कुछ विद्यार्थियों को कुछ जवाब पता थे, मसलन नाम वगैरह पर कुल मिलाकर हालत बहुत निराशाजनक थी. और सबसे बड़ा मनोरंजक दृश्य तब पैदा हुआ जब शक्ति (जो कि एक जागरूक विद्यार्थी है ) ने मेरे सामने गूगल पेश कर दिया, “देखिये. यहाँ भी यही लिखा है !”

वाकई ! गूगल पर सर्च करो तो वही जवाब आता है जो उसने बताया. मेरी सहकर्मी, मुख्य चुनाव अधिकारी और राजनीति विज्ञान की प्राध्यापक सुमन जी ने भी कुछ जिज्ञासाओं को शांत किया पर आखिर में हम दोनों एक दूसरे को देखकर हँस पड़े. इस गूगल के कचरे को कैसे साफ़ करें ?

थोड़ी बहुत बातचीत के बाद सीधे सवाल आता है (और ये हमेशा होता है )- “सर 370 के बारे में आपकी क्या राय है ? मोदी जी के बारे में आपकी क्या राय है ?”

“वे भारत के प्रधानमंत्री हैं.” जाहिर है, ये जवाब उत्साही विद्यार्थियों को निराश करता है. वे व्हाट्सएप सूचनाओं से लबरेज़ हैं. वे तुरता फुरता बहस चाहते हैं. मुझे समझ नहीं आता, जिनको इतिहास-भूगोल-समाज के सन्दर्भ नहीं पता, उनसे सीधे किसी वर्तमान मुद्दे पर दो राय बांटकर क्या होगा ? बाबू,के पेड़ से आम कैसे मिलेगा ?

और ये कोई मेरे कॉलेज की कहानी नहीं है. चारों ओर यही हाल है. अब मुझे यह बताते हुए कोई शर्मिन्दगी नहीं होती. बीमारी को छुपाने से इलाज नहीं हो सकता.

“तुम कब पैदा हुए थे ?”

“2001 में”

“ तो तुम्हें 2002 कैसे याद हो सकता है ? तुम तो तब एक साल के थे ?”

थोड़ी देर बाद शक्ति फिर आया. “सर कुछ दंगे के बारे में लिखा है.” मैं मुस्कुरा दिया. किसी और दिन और बातें होंगी.

( नाम बदल दिए गए हैं. )

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